सिवनी से संजय अग्रवाल। जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर बरघाट तहसील में 13वीं सदी का हिमांदपंथी स्थापत्य शैली में बना आष्टा मंदिर अपनी अनूठी शैली के लिए विख्यात है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित यह मंदिर आस्था का भी बड़ा केंद्र है और नवरात्र में देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। जनश्रुति के मुताबिक मंदिर का निर्माण एक रात में हुआ था। कहा जाता है कि देवी मां की कृपा से बड़े-बड़े पत्थरों से विशाल मंदिर रात में स्वत: तैयार हो रहा था लेकिन इसी दौरान बन रहे मंदिर पर लोगों की नजर पड़ गई। इसके बाद मंदिर का काम अधूरा रह गया। बड़े-बड़े पत्थरों की शिलाएं आज भी मंदिर के आसपास बिखरी पड़ी हैं। वर्तमान में नजर आने वाला मंदिर विध्वंस के बाद बचने वाले अवशेष के रूप में है।

इतिहासकारों के मुताबिक 13वीं सदी में विदर्भ के देवगिरी यादव राजाओं का राज्य यहां तक फैला हुआ था। यादव राजा महादेव व रामचंद्र के मंत्री हिमांद्रि ने यहां आठ मंदिरों का निर्माण वास्तुकला की एक विशेष शैली से कराया था। आठ स्थानों पर मंदिर का निर्माण होने के कारण इसका नाम बाद में आष्टा पड़ गया। इनमें से अधिकांश मंदिर ध्वस्त हो गए हैं। पुरातत्व विभाग के प्रभारी आरके सोनी, के मुताबिक बचे मंदिरों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है। हिमांद्रि ने सैकड़ों मंदिरों का निर्माण इसी अनूठी शैली में करवाया था।

नवरात्र पर लगता है मेला : चैत्र व शारदीय नवरात्र के दौरान यहां मेला आयोजित किया जाता है। जंवारे व मनोकामना ज्योति कलश की स्थापना के साथ ही नौ दिनों तक आराधना और पूजन करने लोग देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। हजारों की संख्या में स्थापित ज्योति कलश जब एक साथ विसर्जन के लिए निकलते हैं तो यह नजारा अनूठा होता है। उत्तरमुखी मां काली की 10 भुजाओं वाली पाषाण प्रतिमा के दर्शन करने लोग यहां दूर-दूर से आते हैं। इसका जीर्णोद्धार भी दो साल से जारी है।

पत्थरों से तैयार मंदिर बेजोड़ स्थापत्य कला का नमूना

पुरातत्व अधिकारियों के मुताबिक आष्टा में दो मंदिर और एक मंडप मौजूद हैं। मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति नहीं है। मंदिर की पिछली दीवार से सटी हुई उत्तरमुखी मां काली की पाषाण मूर्ति स्थापित है। मंदिर के चौकोर पत्थरों की जुड़ाई लोहे व शीशे की छड़ों से हुई है। पत्थरों को एक के ऊपर दूसरा रखकर लोहे के शिकंजे से कसा गया है जिससे उनका भार संतुलित बना रहे। मंदिर के गर्भगृह की दीवार चारों ओर से ऊपर उठते हुए संकरी होती गई हैं जिससे इसका शिखर अत्यंत भव्य और दर्शनीय हो गया है। मंदिर के शीर्ष पर आमलक (गोलाकार आकृति) भी है।