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शहडोल में सात माह में जन्मी 70 ग्राम की बच्ची को मिला नया जीवन, सीपेप से बची जान

जयसिंह नगर तहसील के ग्राम बाराछ निवासी स्वरूपा सेन को 15 जुलाई को ब्यौहारी सिविल अस्पताल से जिला अस्पताल रेफर किया गया था। गर्भावस्था सात माह की थी।

By Vinod ShuklaEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Tue, 13 Oct 2026 06:52:45 PM (IST)Updated Date: Tue, 13 Oct 2026 06:52:45 PM (IST)
शहडोल में सात माह में जन्मी 70 ग्राम की बच्ची को मिला नया जीवन, सीपेप से बची जान
उपचार में शामिल इकाई प्रभारी डाॅ. सुनील कुमार हथगेल, डाॅ. सुप्रिया, डाॅ. कृष्णनेंद्र, डाॅ. बृजेश पटेल, नर्सिंग प्रभारी अपर्णा सिंह सहित नर्सिंग अधिकारी व सहायक कर्मचारी। सौजन्‍य अस्‍पताल

HighLights

  1. 58 दिन तक चले उपचार के बाद अब वजन 1.7 किलो
  2. मां को कंगारू देखभाल की विधि भी सिखाई गई
  3. केवल श्वास सहायता यंत्र से उसकी जान बचाई गई

नईदुनिया प्रतिनिधि, शहडोल। जिला चिकित्सालय की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई में सात माह में जन्मी 870 ग्राम की बच्ची को 58 दिनों के उपचार के बाद नया जीवन मिला। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डाॅ. राजेश मिश्रा और सिविल सर्जन डाॅक्टर शिल्पी सराफ के नेतृत्व में यह उपचार किया गया।

एक घंटे के भीतर उन्होंने बच्ची को जन्म दिया

जयसिंह नगर तहसील के ग्राम बाराछ निवासी स्वरूपा सेन को 15 जुलाई को ब्यौहारी सिविल अस्पताल से जिला अस्पताल रेफर किया गया था। गर्भावस्था सात माह की थी। अस्पताल पहुंचने के एक घंटे के भीतर उन्होंने बच्ची को जन्म दिया।


स्थिति नाजुक व सांस लेने में कठिनाई थी

जन्म के समय बच्ची का वजन 870 ग्राम था और उसकी स्थिति नाजुक थी। उसे सांस लेने में कठिनाई थी और दिल की धड़कन कमजोर थी।बच्ची को तत्काल विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई में भर्ती कर श्वास सहायता यंत्र पर रखा गया। फेफड़े अपरिपक्व होने के कारण उन्हें मजबूत करने के लिए सर्फेक्टेंट दवा दी गई और जीवनरक्षक दवाएं शुरू की गईं।

डाॅक्टरों और नर्सों की तत्परता ने संभाला

58 दिन के उपचार के दौरान बच्ची की हालत चार बार बेहद गंभीर हुई, लेकिन डाॅक्टरों और नर्सों की तत्परता से उसे संभाला गया। उसे चार बार रक्त चढ़ाया गया और 30 दिनों तक श्वास सहायता यंत्र पर रखा गया।

संक्रमण से बचाव पर विशेष ध्यान दिया

सांस रुकने, गले में दूध फंसने और संक्रमण से बचाव पर विशेष ध्यान दिया गया। बिना कृत्रिम श्वसन यंत्र के, केवल श्वास सहायता यंत्र से उसकी जान बचाई गई। तीसरे दिन से कंगारू मदर केयर भी शुरू कर दी गई।

कर्मचारियों की अहम भूमिका रही

उपचार में इकाई प्रभारी डाॅ. सुनील कुमार हथगेल, डाॅ. सुप्रिया, डाॅ. कृष्णनेंद्र, डाॅ. बृजेश पटेल, नर्सिंग प्रभारी अपर्णा सिंह सहित नर्सिंग अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों की अहम भूमिका रही। मां को कंगारू देखभाल की विधि भी सिखाई गई।

यह ऐसे काम करती है सीपैप

सीपैप का पूरा नाम Continuous Positive Airway Pressure (कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) है। यह एक चिकित्सा उपकरण या मशीन है जो सोते समय सांस से जुड़ी समस्याओं, मुख्य रूप से स्लीप एपनिया (Sleep Apnea), के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती है।

बिना रुकावट के बना रहता है ऑक्सीजन का प्रवाह

जब आप सोते हैं, तो यह मशीन एक मास्क के जरिए लगातार और स्थिर हवा का दबाव आपके श्वसन मार्ग (नाक या मुंह) में भेजती है। यह हल्का वायु दाब गले की मांसपेशियों को सिकुड़ने से रोकता है, जिससे सांस की नली खुली रहती है और ऑक्सीजन का प्रवाह बिना किसी रुकावट के बना रहता है।

हवा का दबाव

सीपैप मशीन कमरे की सामान्य हवा को फिल्टर करके एक निश्चित दबाव पर कंप्रेस करती है।

ट्यूब और मास्क

यह दबाव वाली हवा एक पतली नली (ट्यूब) के माध्यम से आपके चेहरे पर लगे मास्क तक पहुंचती है।

वायुमार्ग खुला रखना

सोते समय जब आपकी सांस नली बंद होने लगती है (जिससे तेज खर्राटे आते हैं या सांस रुकती है), तो यह हवा का दबाव उस नली को अंदर से सहारा देकर खुला रखता है।

ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया

यह इस गंभीर बीमारी का सबसे मुख्य इलाज है, जिसमें नींद के दौरान सांस बार-बार कुछ सेकंड के लिए रुक जाती है।

खर्राटों से राहत

यह ऊपरी वायुमार्ग के अवरोध को खत्म करती है, जिससे भारी खर्राटे आना बंद हो जाते हैं।

नींद की गुणवत्ता में सुधार

इसके उपयोग से रात में बार-बार नींद नहीं टूटती, जिससे दिन में थकान, सुस्ती और सिरदर्द की समस्या दूर होती है।

शिशुओं के लिए

समय से पहले (प्रीमेच्योर) पैदा हुए ऐसे नवजात शिशुओं के इलाज में भी इसका उपयोग किया जाता है, जिनके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं।

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