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कूनो की ‘मुखी’ ने रचा इतिहास: मौत से जंग जीतकर बनी मां, अब भारत में चीतों की वापसी की सबसे बड़ी उम्मीद बनी जंगल की नई रानी

कूनो नेशनल पार्क की मादा चीता ‘मुखी’ ने तीन साल पूरे कर लिए हैं।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Sun, 29 Mar 2026 12:00:57 PM (IST)Updated Date: Sun, 29 Mar 2026 12:13:15 PM (IST)
कूनो की ‘मुखी’ ने रचा इतिहास: मौत से जंग जीतकर बनी मां, अब भारत में चीतों की वापसी की सबसे बड़ी उम्मीद बनी जंगल की नई रानी
कूनो में ‘मुखी’ की कहानी ने बढ़ाई उम्मीदें, पांच शावकों के साथ चीता प्रोजेक्ट को नई मजबूती

HighLights

  1. मुखी ने तीन साल में संघर्ष से सफलता हासिल की
  2. भारत में जन्मी पहली मादा चीता बनी पहचान
  3. पांच शावकों को जन्म देकर रचा नया इतिहास

नीरज शर्मा, नईदुनिया प्रतिनिधि श्योपुर: कूनो नेशनल पार्क में एक बार फिर मादा चीता ‘मुखी’ चर्चा में है। 29 मार्च 2026 को उसने अपने जीवन के तीन साल पूरे कर लिए। यह केवल एक जन्मदिन नहीं, बल्कि संघर्ष, जीवटता और सफलता की मिसाल बन चुकी कहानी है, जिसने भारत में चीतों की वापसी को नई उम्मीद दी है।

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भारत में जन्मी पहली मादा चीता

मार्च 2023 में जन्मी ‘मुखी’ भारत में पैदा होने वाली पहली मादा चीता है, जो अब पूरी तरह वयस्क हो चुकी है। उस समय कूनो में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों को बसाने की प्रक्रिया जारी थी। शुरुआती दौर में मौसम, नई परिस्थितियों और स्वास्थ्य से जुड़ी कई चुनौतियां सामने आई थीं।


जन्म के बाद संघर्ष भरी शुरुआत

मुखी की शुरुआत बेहद कठिन रही। जन्म के बाद उसकी मां ‘ज्वाला’ ने उसे छोड़ दिया था, जबकि उसके भाई-बहन तेज गर्मी के कारण जीवित नहीं रह सके। ऐसे में वन विभाग की टीम ने हस्तक्षेप कर उसकी जान बचाई और लगातार निगरानी में उसकी देखभाल की। यही कारण है कि आज मुखी को कूनो की सबसे मजबूत और जीवट चीता माना जाता है।

जंगल के माहौल में शानदार अनुकूलन

समय के साथ मुखी ने खुद को पूरी तरह जंगल के माहौल में ढाल लिया। अब वह न केवल स्वस्थ वयस्क है, बल्कि शिकार करने में भी माहिर हो चुकी है। वन अधिकारियों का कहना है कि उसका व्यवहार और अनुकूलन यह साबित करता है कि कूनो का पर्यावरण चीतों के लिए अनुकूल बन रहा है।

पांच शावकों को जन्म, बड़ी उपलब्धि

मुखी की सबसे बड़ी उपलब्धि नवंबर 2025 में सामने आई, जब उसने 33 महीने की उम्र में पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया। यह भारत में चीतों की दूसरी पीढ़ी है, जो इस प्रोजेक्ट की निरंतरता का संकेत है। खास बात यह है कि मुखी अपने शावकों की देखभाल खुद कर रही है, जो किसी भी प्रजाति के स्थायित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

अधिकारियों ने बताया मील का पत्थर

प्रोजेक्ट चीता के डायरेक्टर उत्तम कुमार शर्मा के अनुसार, मुखी की कहानी पूरे प्रोजेक्ट के लिए मील का पत्थर है। कठिन परिस्थितियों में उसका जीवित रहना और मां बनना यह दिखाता है कि कूनो का इकोसिस्टम चीतों के लिए अनुकूल है।

वहीं, डीएफओ आर थिरुकुरल ने कहा कि मुखी का व्यवहार, शिकार क्षमता और शावकों की देखभाल इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। यह संकेत है कि चीतों ने यहां खुद को स्थापित करना शुरू कर दिया है।

टीम के लिए गर्व का क्षण

हालांकि मुखी का जन्मदिन औपचारिक रूप से नहीं मनाया गया, लेकिन कूनो के वन अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच संतोष और गर्व की भावना स्पष्ट नजर आई। आज मुखी केवल एक चीता नहीं, बल्कि कूनो की पहचान बन चुकी है।

नई उम्मीद की शुरुआत

मुखी की कहानी पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए प्रेरणा है। यह संकेत है कि भारत में चीतों की आत्मनिर्भर आबादी स्थापित करने का लक्ष्य धीरे-धीरे साकार हो रहा है और जंगलों में फिर से चीतों की रफ्तार लौट रही है।