शिवपुरी के धौलागढ़ में 500 साल पुरानी परंपरा... रक्षाबंधन के दूसरे दिन खनकती है लहंगी; महानगरों से भी खिंचे चले आते हैं लोग
शिवपुरी समाचार: खास बात यह है कि भले ही गांव से निकलकर लोग मेट्रो और महानगरों तक पहुंच गए हो लेकिन लहंगी जैसे पारंपरिक महोत्सव में शामिल होने के लिए अ...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 30 Aug 2026 04:10:32 PM (IST)Updated Date: Sun, 30 Aug 2026 04:11:30 PM (IST)
पारंपरिक लहंगी महोत्सव में उत्साह से भाग लेते ग्रामीण। वीडियोग्रैबHighLights
- 500 वर्षों का अटूट इतिहास
- रोमांच, नृत्य और छड़ियों की खनक
- सामाजिक समरसता और खुशहाली का प्रतीक
नईदुनिया प्रतिनिधि, शिवपुरी। शिवपुरी जिला मुख्यालय से महज 40 किलोमीटर दूर स्थित धोलागढ़ गांव में आज भी 500 साल पुरानी लहंगी खेलने की परंपरा निभाई जा रही है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन यानी भुजरिया को यह विशेष लहंगी उत्सव मनाया जाता है। जहां लहंगी की खनक और पारंपरिक गीत गूंजते रहते हैं।
लहंगी खेलना किसी रोमांचक दृश्य से कम नहीं
इस बार भी यह लहंगी महोत्सव गांव में उत्साह के साथ मनाया गया। आज के दौर की पीढ़ी को यह जानने की जरूरत भी है कि लहंगी खेलना किसी रोमांचक दृश्य से कम नहीं है। लहंगी में शामिल की गई छड़ी और छड़ियों का आपस में खनकना इसी बीच में ग्रामीणों का समाजस्य भरा नृत्य और पारंपरिक गीत महोत्सव को यादगार बनाते रहे। करीब 500 साल से रक्षाबंधन पर यह परंपरा ग्रामीणों के द्वारा निभाई जा रही है। जिसमें हर वर्ग के लोग शामिल होते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि भले ही गांव से निकलकर लोग मेट्रो और महानगरों तक पहुंच गए हो लेकिन लहंगी जैसे पारंपरिक महोत्सव में शामिल होने के लिए अपने गांव भुजरिया पर चले आते हैं।
खुशहाली का प्रतीक है लहंगी
गांव के बुजुर्गो का कहना है कि लहंगी महोत्सव खुशहाली का प्रतीक है। जात पांत से दूर होकर हर वर्ग के लोग इसमें शामिल होते हैं। पूरा गांव इस महोत्सव में शामिल होता है। बाद में गांव के सरपंच और अन्य लोगों के द्वारा लहंगी खेलने वालों को इनाम देकर प्रोत्साहित किया जाता है।