
Naidunia Sting शिवपुरी (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जमीन संबंधित कामों के लिए हर व्यक्ति को तहसील कार्यालय का रुख करना ही पड़ता है। जैसे ही कोई व्यक्ति तहसील में प्रवेश करता है तो कर्मचारियों और दलालों का भ्रष्टाचार का खेल शुरू हो जाता है। सरकारी कार्यालय में हर काम के लिए रेट निर्धारित की हुई है। फिर चाहे नामांतरण करना हो या फिर किसी दस्तावेज की नकल निकलवाना हो। तहसील कार्यालय में बाबूओं की ऐसी ही रिश्वतखोरी कैमरे में कैद हुई है। नामांतरण के आदेश की नकल निकलवाने और उसकी प्रति को सत्यापित करने के एवज में अलग से रिश्तव ली। तहसील के कर्मचारियों द्वारा रिश्वत भी चोरी-छिपे नहीं मांगी जाती है, बल्कि खुलेआम यहां आने वाले हर व्यक्ति से मांगी जाती है। यदि कोई व्यक्ति इन्हें खर्चा-पानी (रिश्वत) नहीं दे तो फिर उसे अपने काम के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाने पड़ते हैं। एक ओर कर्मचारियों का रिश्वत का खेल चलता रहाता है तो दूसरी ओर अधिकारी अपने कक्षों में बैठे रहते हैं। यहां सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, बल्कि दलालों के फेर से बचना भी आम आदमी के लिए मुश्किल होता है। जिन कार्याें के लिए शासन ने मामूली दरें निर्धारित की हैं, उसके लिए हजारों रुपये चुकाने पड़ते हैं।
जब तहसील के अन्य कार्यों के बारे में पता किया तो दलाल ने बताया कि नामांतरण के लिए तीन हजार रुपये लगेंगे। जबकि नामांतरण के लिए आवेदन करने के साथ सिर्फ लोक सेवा केंद्र पर 150 रुपये से भी कम शुल्क अदा करके रसीद कटवाना होती है। जब दलाल से पहचान बदलकर बात की तो उसने पहले पूछा कि नामांतरण किस तरह का है। यदि वसीयत के ऊपर होना है तो फिर जितने साल पुराना होगा उसके हिसाब से रुपये लगेंगे। उसने बताया कि कई लोगों को रुपये देने पड़ते हैं। आदेश हो भी जाता है तो फिर अमल के लिए भी राशि देना पड़ती है।
इस तरह के भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए प्रदेश में साइबर तहसील की व्यवस्था लागू कर दी गई है। इसमें रजिस्ट्री होने के बाद आनलाइन ही नामांतरण की प्रक्रिया हो जाती है। लेकिन, यह व्यवस्था फिलहाल तब ही लागू है जब जमीन का पूरा रकबा बिकता है। यदि किसी ने एक प्लाट या रकबे का एक हिस्सा खरीदा है तो फिर उसे नामांतरण की पुरानी प्रक्रिया से ही गुजरना पड़ता है। जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में व्यवस्था सभी तरह के नामांतरण के लिए लागू हो सकती है। ऐसा होने पर ही भ्रष्टाचार रुक पाएगा। हालांकि एक मुश्त पूरा रकबा बेचने-खरीदने वालों को जरूरत इस झंझट से मुक्ति मिल गई है।
तहसील में भ्रष्टाचार का क्रम यहीं नहीं रुकता है। कैमरे में नकल शाखा का बाबू महेश राठौर भी कैद हुआ। नकल को टिकट लगाकर बाबू द्वारा प्रमाणित किया जाता है। इसमें 10 रुपये का टिकट लगता है। इसके एवज में भी यहां आने वाले लोगों से 100 से 200 रुपये वसूल लिए जाते हैं। जब आवक जावक के बाबू ने रुपये लेकर नकल प्रदान कर दीं तो महेश राठौर ने उन्हें सत्यापित करने के एवज में खर्चा पानी की मांग की। उससे बात 200 रुपये में तय हुई और उसने 200 रुपये लेकर प्रतियां प्रमाणित कर दीं। महेश राठौर भी वीडियो में स्पष्ट रूप से रुपये लेते हुए दिखाई दे रहा है।