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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 01, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जो सुख की कामना करता है, वह दुख से अछूता नहीं रह सकता : साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी

शिवपुरी। हम जीवन में केवल सुख ही सुख पाना चाहते हैं दुख नहीं, लेकिन फिर भी देख जीवन में आता है, क्योंकि सुख और दुख दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग हैं। जो...और पढ़ें

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Publish Date: Sun, 01 Mar 2015 10:30:34 PM (IST)Updated Date: Sun, 01 Mar 2015 10:30:34 PM (IST)
जो सुख की कामना करता है, वह दुख से अछूता नहीं रह सकता : साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी

शिवपुरी। हम जीवन में केवल सुख ही सुख पाना चाहते हैं दुख नहीं, लेकिन फिर भी देख जीवन में आता है, क्योंकि सुख और दुख दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग हैं। जो सुख की कामना करता है, वह दुख से भी अछूता नहीं रह सकता। श्री रामकथा में अयोध्या वासियों को भी सुख के बाद दुख का भोग अपेक्षित था, जिससे मंथरा और कैकेई के माध्यम से भगवान श्रीराम के वनगमन की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

यह प्रवचन साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी ने गांधी पार्क में आयोजित रामकथा के दौरान सुख-दुख की महिमा से अवगत कराते हुए भक्तों के बीच दिए। गांधी पार्क में रामकथा के शुभारंभ से पूर्व यजमान रामशरण अग्रवाल और कपिल सहगल ने पूजन-अर्चना की। साध्वी ने कहा कि महाराज दशरथ ने सत्य का पालन करते हुए कैकेई को दो वरदान दिए थे। जब भगवान राम को इसका ज्ञान हुआ तो वह सीताजी व लक्ष्मण सहित वन के लिए प्रस्थान करने को उद्दत हुए। यहां उन्होंने माता-पिता के वचन निभाने के लिए समस्त वैभव का त्याग कर दिया, साथ ही अनुज भरत के लिए भ्रात प्रेम का दर्शन कराते हुए वन को गए। वन में उन्होंने वनवासी, कोल भील आदि को समाज की मुख्यधारा में शामिल कर वनवास स्वीकार किया। कथा में साध्वी ने कहा कि भगवान ने अनेक भूखंडों को एकजुट कर अखंड राष्ट्र बनाने के लिए वनवास, धर्मविरोधी एवं राष्ट्र विरोधी राक्षस का वध करने वानर, भालुओं से मित्रता कर सनातन धर्म से जा़ेडने के लिए घर, वैभव सब त्याग दिया, जिससे ही संसार का कल्याण हुआ है।