शिवपुरी भदावरी ब्रीडिंग सेंटर बना संजीवनी: 3 साल में दोगुनी हुई संख्या, देसी नस्ल के संरक्षण को मिली नई उम्मीद
इसकी बड़ी विशेषता इसके दूध में अपेक्षाकृत अधिक वसा (8% से 14% तक) होना है। इसी वजह से घी-खोवा बनाने वालों में सबसे ज्यादा मांग रहती है।
Publish Date: Fri, 18 Sep 2026 10:20:32 PM (IST)Updated Date: Fri, 18 Sep 2026 10:21:07 PM (IST)
शिवपुरी के भदावरी ब्रीडिंग सेंटर पर भदावरी नस्ल की पड़िया के साथ सेंटर के अधिकारी। नईदुनियाHighLights
- दूध में वसा की अधिकता पहचान
- संरक्षण का उद्देश्य और प्रोजेक्ट
- घटती संख्या और भदावर इतिहास
भरत शर्मा, नईदुनिया, शिवपुरी। ग्वालियर-चंबल और उत्तर प्रदेश के इटावा क्षेत्र की पहचान रही भदावरी भैंस की घटती संख्या के बीच शिवपुरी का भदावरी ब्रीडिंग सेंटर इस देसी नस्ल के संरक्षण की उम्मीद बनकर उभरा है। मध्य प्रदेश पशुधन एवं कुक्कुट विकास बोर्ड के सहयोग से शुरू किए गए इस केंद्र में 2023 में उत्तर प्रदेश के इटावा से 21 भदावरी पड़ियां और एक पाड़ा लाया गया था। तीन साल के भीतर यहां इनकी संख्या बढ़कर करीब 40 तक पहुंच गई है।
देशी भैंस नस्लों में शामिल है भदावरी
भदावरी को देश की विशिष्ट देसी भैंस नस्लों में शामिल किया गया है। इसकी बड़ी विशेषता इसके दूध में अपेक्षाकृत अधिक वसा (8% से 14% तक) होना है। इसी वजह से घी-खोवा बनाने वालों में सबसे ज्यादा मांग रहती है। भदावरी की पहचान इसके विशिष्ट भूरे रंग, सफेद निशानों, गले पर सफेद कंठी (दो सफेद धारियां) से भी होती है।
शिवपुरी में इसके संरक्षण का उद्देश्य केवल पशुओं की संख्या बढ़ाने के अलावा नहीं, बल्कि शुद्ध नस्ल को सुरक्षित रखते हुए उसके आनुवंशिक गुणों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी है।
शिवपुरी में मार्च 2009 में लाया गया था भदावरी प्रोजेक्ट
विभागीय अधिकारियों के अनुसार भदावरी का संरक्षण करने के उद्देश्य से मार्च 2009 में भदावरी प्रोजेक्ट शिवपुरी में लाया गया था। इसके बाद 2023 में पशु एवं कुक्कुट विकास बोर्ड ने शिवपुरी के भदावरी प्रोजेक्ट पर फोकस किया।
पशु प्रजनन प्रक्षेत्र के उपसंचालक डा एसकेएस धाकड़ ने बताया कि शिवपुरी के भदावरी ब्रीडिंग सेंटर पर भदावरी का कुनबा बढ़ने से इस देसी नस्ल के संरक्षण की उम्मीद बढ़ गई है।
भदावर क्षेत्र के कारण पड़ा नाम भदावरी
उत्तर प्रदेश के इटावा, आगरा, बाह के अलावा मध्य प्रदेश के भिंड, मुरैना में यह नस्ल पाई जाती है। पुराने भदावर रियासत के नाम पर इसका नाम भदावरी पड़ा है। 1977 में जहां देश में इनकी संख्या ∼1.30 लाख थी, जबकि वर्तमान में कुछ हजार ही शुद्ध भदावरी बची हैं। मुर्रा भैस के साथ अंधाधुंध क्रास ब्रीडिंग, शुद्ध भदावरी पाड़ा (सांड) नहीं मिलने के चलते इनकी संख्या लगातार घटती गई।