ज्ञान भारतम् मिशन में मिली 130 साल पुरानी दुर्लभ लघु श्रीमद्भगवद्गीता: माचिस से भी छोटे आकार में 350 पन्ने, प्राचीन मुद्रण कला देखकर विशेषज्ञ हैरान
यह श्रीमद्भगवद्गीता हस्तलिखित प्रति न होकर पूरी तरह से मुद्रित है। ऐसे में, सवा सौ वर्ष पहले फिक्स फांट का प्रयोग कर इतने छोटे आकार में साढ़े तीन सौ प...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 06 Oct 2026 08:10:51 PM (IST)Updated Date: Tue, 06 Oct 2026 08:11:31 PM (IST)
दुर्लभ लघु श्रीमद्भगवद्गीता में गीता माहात्म्य के बाद वुडकट शैली के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथ का उकेरा गया अत्यंत बारीक चित्र। नईदुनियाHighLights
- माचिस से भी छोटा आकार, अद्भुत छपाई
- जेब और ताबीज में रखने के लिए होती थी उपयोगी
- बुंदेलखंड के इतिहास में पहली ऐसी खोज
मनीष असाटी, नईदुनिया, टीकमगढ़। ज्ञान भारतम् अभियान में टीकमगढ़ जिले के खरगापुर से भारतीय धार्मिक और मुद्रण इतिहास से जुड़ी एक बेहद असाधारण धरोहर सामने आई है। पूर्व विधायक एवं भाजपा नेता सुरेंद्र प्रताप सिंह (बेबी राजा) के पास लगभग 130 वर्ष पूर्व मुद्रित श्रीमद्भगवद्गीता की लघु आकार की एक प्रति मिली है। महज 4×4.4 सेंटीमीटर आकार और करीब 350 पृष्ठों वाली इस गीता का स्वरूप एक सामान्य माचिस से भी छोटा है।
उस दौर में ऐसी लघु पुस्तकें श्रद्धालुओं के लिए विशेष उपयोगी होती थीं
यह श्रीमद्भगवद्गीता हस्तलिखित प्रति न होकर पूरी तरह से मुद्रित है। ऐसे में, सवा सौ वर्ष पहले फिक्स फांट का प्रयोग कर इतने छोटे आकार में साढ़े तीन सौ पन्नों की पुस्तक प्रकाशित करना प्राचीन मुद्रण शिल्प का बेजोड़ नमूना है।
इसमें शुरुआती पृष्ठों पर गीता माहात्म्य के बाद वुडकट शैली के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथ का अत्यंत बारीक चित्र उकेरा गया है।
इतिहासकारों के अनुसार, उस दौर में ऐसी लघु पुस्तकें श्रद्धालुओं के लिए विशेष उपयोगी होती थीं, जिन्हें आसानी से जेब में रखा जा सकता था या आस्था के चलते ताबीज में भरकर आध्यात्मिक सुरक्षा कवच के रूप में धारण किया जाता था।
अब तक इस प्रकार की अन्य कोई दुर्लभ लघु श्रीमद्भगवद्गीता सामने नहीं आई है: कलेक्टर
ज्ञान भारतम अभियान के अंतर्गत टीकमगढ़ में पांडुलिपियों को एकत्र करने में विशेष रुचि ले रहे कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय का कहना है कि विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक इस प्रकार की अन्य कोई दुर्लभ लघु श्रीमद्भगवद्गीता सामने नहीं आई है। ऐसे में, यह बुंदेलखंड के प्राचीन मुद्रण इतिहास, पुस्तक संस्कृति और धार्मिक साहित्यों के प्रसार पर नए ऐतिहासिक तथ्य सामने ला सकती है।