रामराजा दरबार ओरछा से बुंदेलखंड में मोनिया नृत्य का आगाज, जानिए इस अनोखी दीवाली परंपरा की मान्यता
यहां दीवाली के साथ ही बुंदेली लोक नृत्य और संगीत का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है जो इस पर्व को अद्वितीय बना देता है।
Publish Date: Fri, 06 Nov 2026 08:11:45 AM (IST)Updated Date: Fri, 06 Nov 2026 08:12:24 AM (IST)
श्री रामराजा सरकार मंदिर परिसर में मोनिया नृत्य करते हुए। फाइल फोटोHighLights
- ओरछा से शुरुआत और 11 दिनों की यात्रा
- मोरपंख, रंग-बिरंगी वेशभूषा और लाठियों का आकर्षण
- दौसा युग की पौराणिक मान्यता और मौन साधना
मनीष असाटी, नईदुनिया, टीकमगढ़। यूं तो दीपावली का पावन पर्व पूरे देश में दीपों और प्रकाश के त्योहार के रूप में मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड अंचल में इसका एक अलग ही अनोखा और जीवंत सांस्कृतिक रूप देखने को मिलता है।
इस पर्व को बना देता है अद्वितीय
यहां दीपावली के साथ ही बुंदेली लोक नृत्य और संगीत का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है जो इस पर्व को अद्वितीय बना देता है। बुंदेले हरबोलों की सुरीली स्वर लहरियों और मनमोहक राई-मोनिया नृत्यों की गूंज से दीपावली के बाद कई दिनों तक पूरा क्षेत्र प्रकाश, संगीत और रंगों के उत्सव में सराबोर रहता है।
मोनिया नृतकों की टोलियां हजारों की संख्या में होती हैं एकत्र
गौरतलब है कि बुंदेलखंड की पूर्व राजधानी रही श्री रामराजा सरकार की नगरी ओरछा से इस अनूठी नृत्य परंपरा का आगाज होता है। बुंदेला शासकों के समय से शुरू हुई यह सांस्कृतिक परंपरा अब पूरी तरह से धार्मिक आस्था से जुड़ चुकी है। दीपावली के अवसर पर बुंदेलखंड की अयोध्या कहे जाने वाले ओरछा धाम में मोनिया नृतकों की टोलियां हजारों की संख्या में एकत्र होती हैं। दीपावली के दूसरे दिन श्रद्धालु और कलाकार सबसे पहले रामराजा सरकार के दरबार में माथा टेककर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और फिर यहां से लोक संगीत की थाप पर थिरकते हुए गांव-गांव के लिए रवाना होते हैं। जो एकादशी तक गांव-गांव घूमने के बाद अपने घरों तक पहुंचते हैं।
वेशभूषा में लगे रहते हैं छोटे-छोटे कांच
हाथों में सजी बांस की लाठियां, सिर से पांव तक रंग-बिरंगी पारंपारिक वेशभूषा और ढोल-मंजीरों की झंकार के साथ जब ये टोलियां बस्तियों में पहुंचती हैं तो माहौल पूरी तरह से उत्सवधर्मी हो जाता है। इस लोक नृत्य का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व भी गहरा है। मोनिया बिना चप्पल-जूता पहने निकलते हैं और उनकी वेशभूषा में छोटे-छोटे कांच के फ्रेम समेत टुकड़े लगे रहते हैं। इसमें ढोलक, नगड़िया, बांसुरी, मजीरा और एक-दूसरे से लाठियों को लड़ाने की आवाज मधुर होती है।
इसलिए है मोनिया नृत्य विशेष
मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था, उसके बाद ग्वालों के साथ मिलकर यही खुशी का नृत्य किया था। मोनिया नृत्यों के राग के उतार-चढ़ाव इतने मनमोहक होते हैं कि इसे देखने और सुनने वाले सम्मोहित हो जाते हैं। खास बात यह है कि मोनिया नर्तकों को मोनिया इसलिए कहा जाता है कि यह नृत्य के दौरान पूर्णतः मौन भी रहते है। ऐसे में पुरानी यह पौराणिक परंपरा आज भी बुंदेलखंड की धरती पर उसी उमंग, आस्था और मूल स्वरूप में जीवंत बनी हुई है।