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2100 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को हराने के बाद किया था राज्योत्सव, उज्जैन में 8 मार्च को निभाई जाएगी परंपरा

लोक कथानक व किवदंतियों में मिले प्रमाण बताते हैं कि उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त करने के बाद पृथ्वी के अवतरण दिवस चैत्र शुक्ल प्र...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Fri, 06 Mar 2026 10:56:19 AM (IST)Updated Date: Fri, 06 Mar 2026 11:06:12 AM (IST)
2100 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को हराने के बाद किया था राज्योत्सव, उज्जैन में 8 मार्च को निभाई जाएगी परंपरा
श्री महाकालेश्वर मंदिर के कोटितीर्थ कुंड पर आरोहित चल समारोह में निकलने वाले ध्वज।

HighLights

  1. शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद राजसी ध्वज के साथ निकाली गई थी गैर
  2. महाकाल, सिंहपुरी, कार्तिकचौक, भागसीपुरा की गैर उसी विजय परंपरा का प्रतीक
  3. महाकाल मंदिर में 2 मार्च को भगवान वीरभद्र तथा ध्वज का पूजन किया गया था

नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर से 8 मार्च को रंगपंचमी पर श्री महाकालेश्वर वीरभद्र चल समारोह निकलेगा। मालवा की लोक परंपरा में इसे गैर कहा जाता है। वस्तुत: यह शौर्य व पराक्रम का प्रतीक है। इसमें राजसी परंपरा के प्रतीक ध्वज निकाले जाते हैं। 2100 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त करने के बाद राज्योत्सव की परंपरा शुरू की थी। कालांतार में राजा महाराजाओं ने इस परंपरा का निर्वहन किया।

मराठाकाल में यह परंपरा और समृद्ध हुई, महाकाल, सिंहपुरी, कार्तिकचौक, भागसीपुरा आदि मोहल्लों की गैर उसी शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। इतिहासकार व पुराविद डॉ. रमण सोलंकी ने बताया लोक कथानक व किवदंतियों में मिले प्रमाण बताते हैं कि उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त करने के बाद पृथ्वी के अवतरण दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर राज्योत्सव मनाने की परंपरा शुरू की। शंख, ढोल, नगाड़े की मंगल ध्वनि के साथ विजय ध्वजों का आरोहण किया।


देश के शूरवीरों का सम्मान किया तथा टेसू के फूलों से बना गुलाल उड़ाकर रंगोत्सव मनाया और मालवा नाम गणराज्य की मुद्रा जारी की। राज्योत्सव में जिन वीरों का सम्मान हुआ वे विजय ध्वजों के साथ जुलूस के रूप में अपने नगर को लौटे, होली से धुलेंडी तक निकलने वाले गैर चल समारोह उसी का प्रतीक हैं। जिन समाजों के पास राजा महाराजाओं द्वारा प्रदान किए गए विजय के प्रमाण हैं, वे आज भी शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए गैर निकालते हैं।

गुर्जर गौड़ ब्राह्मण समाज ने जीता था हिंगोट युद्ध

ज्योतिर्विद पं. अमर डब्बावाला ने बताय ग्वालियर नरेश महादजी सिंधिया वीरता व पराक्रम के प्रशंसक थे। करीब 350 साल पहले उन्होंने शिप्रा नदी के पास मैदान में जरीतास का एक कीमती ध्वज आरोहित किया और शहर में एलान कराया कि जो समाज इस झंडे को हासिल करेगा उसे श्रेष्ठ एवं वीरता का पुरस्कार दिया जाएगा।

सिंहपुरी के गुर्जर गौड़ ब्राह्मण समाज ने ध्वज को प्राप्त करने के लिए अद्भुत साहस का परिचय देते हुए हिंगोट युद्ध में अन्यों को परास्त किया। प्रतिवर्ष रंगपंचमी व गुड़ी पड़वा पर विजय उत्सव के रूप में गैर निकाली जाती है।

महाकाल में भगवान वीरभद्र व ध्वज का पूजन

महाकाल मंदिर के पुजारी, पुरोहित परिवार तथा जिन समाजों द्वारा गैर के रूप में ध्वज चल समारोह निकाले जाते हैं, उनके द्वारा होली पर ध्वज पूजन किया जाता है। महाकाल मंदिर में 2 मार्च को संध्या काल में सभा मंडप स्थित भगवान वीरभद्र तथा ध्वज का पूजन किया गया। इसके बाद कोटितीर्थ कुंड पर ध्वजा रोहण किया गया। 8 मार्च को रंगपंचमी पर निकलने वाले चल समारोह में सबसे आगे विजय के प्रतीक यह ध्वज रहेंगे।