
उज्जैन (ब्यूरो)। सिंहस्थ के दौरान राहु-गुरु की युति को चांडाल योग निर्मित करने का कारण माना जा रहा है। मान्यता है कि ऐसे योग अनिष्टकारी होते हैं। इससे हिंसा, रक्तपात, प्राकृतिक आपदा आदि से जान-माल की हानि होती है।
ज्योतिषाचार्य पं.अमर डब्बावाला के अनुसार ग्रहों की दृष्टि तथा युति संबंध के गणितीय पक्ष को देखें तो जो ग्रह युवा अवस्था में होता है, उसका प्रभाव अधिक रहता है। राहु-गुरु की युति संबंध को देखें तो सिंहस्थ के दौरान गुरु अर्थात ब्रहस्पति राहु से ज्यादा प्रबल रहेगा। राहु यहां वृद्धावस्था में नजर आता है। ऐसे में गुरु का प्रबल प्रभाव चांडाल योग को काफी हद तक कम कर देगा।
सिंहस्थ में 400 साल बाद ग्रहों का दिव्य संयोग
सिंहस्थ 2016 में ग्रहों का ऐसा दिव्य संयोग बन रहा है, जो करीब 400 साल पहले 16वीं शताब्दी के महाकुंभ में बना था। ज्योतिष के अनुसार कुंभ के दौरान सात ग्रहों की स्थितियां एक समान रहेगी। उच्च ग्रहों के प्रभाव से चांडाल योग कमजोर होगा तथा महापर्व के निर्विघ्न संपन्न होने की स्थिति बनेगी। धर्म-आध्यात्म में वृद्धि होगी तथा संत समाज तथा जनमानस में समरसता का प्रभाव नजर आएगा।
पं.अमर डब्बावाला के अनुसार नक्षत्र मेखला की गणना तथा ग्रह गोचर में नवग्रहों के गतिक्रम के साथ उनके वक्री व मार्गीय होने की स्थिति तथा पंचाग के पांच अंगों के आधार पर दुर्लभ संयोगों का गणित लगाया जाता है। इस दृष्टि से देखें तो सिंहस्थ 2016 में 427 साल बाद विशिष्ट दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसमें 7 ग्रह अपनी उन्हीं राशियों में गोचर करेंगे।
गणना के अनुसार सूर्य-बुध मेष राशि में (बुधादित्य योग ), राहु-गुरु सिंह राशि में, शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में, केतु कुंभ रशि में तथा चंद्रमा तुला राशि में रहेंगे। ग्रहों की यह स्थिति 16वीं शताब्दी अर्थात 1589 में बनी थी।