
धीरज गोमे, नईदुनिया, उज्जैन। उज्जैन से करीब 40 किलोमीटर दूर सामानेरा और टुकराल गांवों में मिले पुरातात्विक साक्ष्य महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं और प्रवेश द्वारों के इतिहास को समझने की नई संभावना खोल रहे हैं। अवंती-मालवा क्षेत्र विरासत अनुसंधान एवं संरक्षण यात्रा के दौरान इन स्थलों पर प्राचीन मृद्भांड, टेराकोटा के खिलौने, शिवलिंग, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और स्थापत्य के अवशेष चिह्नित किए गए। हाल ही में उज्जैन जिले की तराना, माकड़ौन, उज्जैन और महिदपुर तहसीलों के विभिन्न स्थलों का सर्वेक्षण किया गया।
यात्रा के समन्वयक एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा और अश्विनी शोध संस्थान के निदेशक तथा पुरातत्वविद् डा. रामचंद्र ठाकुर के अनुसार इन स्थलों पर शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए हैं।
छोटी कालीसिंध नदी के तट पर स्थित सामानेरा में ब्रह्माणी माता मंदिर की दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त मूर्ति विशेष महत्व रखती है। इसे गुप्तकालीन माना जाता है। यहां करीब दो हजार वर्ष पुराना माना जाने वाला शिवलिंग, टेराकोटा के खिलौने, प्राचीन मृद्भांड तथा गुप्तकाल और परमारकाल की शिव प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। ये अवशेष प्राचीन उज्जयिनी और महाकाल वन से इस क्षेत्र के संबंधों की पड़ताल का आधार बन सकते हैं।
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टुकराल के माता खेड़ा यानी नागदेव मंदिर परिसर में बेसाल्ट पत्थरों के बड़े खंड, प्राचीन स्तंभ और बिना गारे के पत्थरों से बनी परकोटे जैसी संरचना मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार, जिस टीले पर वर्तमान मंदिर स्थित है, उसके नीचे प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे होने की संभावना है।
सामानेरा और टुकराल के पुरावशेष महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं और मालवा की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन स्थलों का अध्ययन और संरक्षण जरूरी है, ताकि ऐतिहासिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचे। - प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, कुलानुशासक, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन।