
राजेश वर्मा नईदुनिया , उज्जैन : वैश्य टेकरी का उत्खनन-अनुसंधान प्राचीन अवंतिका के उस गौरवशाली इतिहास को सामने ला सकता है, जब छठी शताब्दी ईसा पूर्व में अवंती महाजनपद विश्व के व्यापार, धर्म और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र था।
शिप्रा के तट पर बसी उज्जयिनी और नर्मदा तट की महिष्मती इसकी प्रमुख राजधानियां थीं। इनके माध्यम से अवंती का व्यापारिक संपर्क देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर समुद्र पार के क्षेत्रों तक था। अब वैश्य टेकरी का उत्खनन इसी प्राचीन वैभव को फिर से दुनिया के सामने लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विक्रम विश्व विद्यालय के पुराविद डा.रमण सोलंकी के अनुसार उज्जयिनी की भौगोलिक और धार्मिक स्थिति ने उसे प्राचीन काल में विशेष महत्व दिया। कर्क रेखा से गुजरने वाली उज्जयिनी शिप्रा के तट पर स्थित थी। शिप्रा का जलमार्ग चंबल के माध्यम से यमुना और आगे गंगा क्षेत्र से जुड़ता था।
यही कारण रहा कि प्राचीन व्यापारिक मार्गों में अवंती की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दूर-दूर से व्यापारी उज्जयिनी आते और व्यापार के साथ यहां के धार्मिक स्थलों के दर्शन भी करते थे। वैश्य टेकरी के उन्नयन के बाद चीन, जापान, श्रीलंका, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यामार, भूटान सहित विभिन्न देशों से बौद्ध अनुयायियों के उज्जैन आने की संभावनाएं बढ़ेंगी और शहर के पर्यटन के साथ विदेशी मुद्रा आय के नए अवसर भी बन सकते हैं।
प्राचीन उज्जयिनी के दूरस्थ व्यापारिक संबंधों के संकेत यहां से प्राप्त मुद्राओं में भी मिलते रहे हैं। रोमन सिक्कों सहित विभिन्न क्षेत्रों की मुद्राएं उज्जैन के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इनके आधार पर प्राचीन उज्जयिनी के पश्चिमी देशों और समुद्री व्यापार मार्गों से संपर्क का अध्ययन किया जा सकता है। व्यापारी उज्जैन से दशपुर होते हुए भरुकच्छ (वर्तमान में गुजरात का कच्छ) जैसे प्राचीन बंदरगाहों तक पहुंचते और वहां से अरब सागर के पार के क्षेत्रों से व्यापार करते थे।
अवंती की पहचान केवल शिव और वैष्णव परंपरा तक सीमित नहीं रही। बौद्ध और जैन धर्म के विकास में भी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्राचीन पाली साहित्य में वर्णित स्तूप परंपरा और वैश्य टेकरी का विशाल बौद्ध स्तूप इसी इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वैश्य टेकरी के उत्खनन से इस पूरे इतिहास को समझने के लिए नए प्रमाण सामने आ सकते हैं।
ग्वालियर राज्य के पुराविद् एमबी गरदे ने 1937-39 के मध्य वैश्य टेकरी और कुमार टेकरी क्षेत्र में पुरातात्विक उत्खनन किया था। इसका संदर्भ विक्रम संवत 2001 में पद्म विभूषण पं.सूर्यनारायण द्वारा संपदित ‘विक्रम स्मृति ग्रंथ’ में भी मिलते हैं। इस महत्वपूर्ण सामग्री का पुनर्प्रकाशन वर्ष 2022 में मध्य प्रदेश शासन के महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ द्वारा किया गया।
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