
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : 51 शक्तिपीठों की आस्था को एक परिसर में समेटकर देश को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के सूत्र में पिरोने की परिकल्पना अब बड़वाह के शक्तिधाम से साकार होगी। उज्जैन में दो दिन तक चले राष्ट्रीय मंथन के समापन पर यही संदेश उभरा कि शक्तिधाम केवल मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, चरित्र निर्माण और समाजसेवा का ऐसा केंद्र बने, जो भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्वकल्याण से जोड़े।
शुक्रवार को झालरिया मठ में आयोजित समापन समारोह में उपमुख्यमंत्री डॉ. राजेन्द्र शुक्ल और विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने इस प्रकल्प को देश की आध्यात्मिक शक्ति और राष्ट्रीय एकात्मता से जोड़ा।
उप मुख्यमंत्री डॉ. शुक्ल ने कहा कि भारत आध्यात्मिक देश है और धर्म-अध्यात्म उसकी ताकत हैं। शक्तिधाम प्रकल्प के आने से देश का अध्यात्म और बढ़ेगा। विधानसभा अध्यक्ष तोमर ने कहा कि यह पूरे देश को एकात्मता के सूत्र में जोड़ने वाला तीर्थ बनेगा। इसके माध्यम से आध्यात्मिक ऊर्जा को जन-जन तक पहुंचाना है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश भैयाजी जोशी ने शक्तिधाम की अवधारणा को आस्था, चरित्र और सेवा का त्रिवेणी संगम बताया। उन्होंने कहा कि 51 शक्तिपीठों की ऊर्जा को एक स्थान पर केंद्रित करने का उद्देश्य समाज को जीवन के तीन महत्वपूर्ण संदेश देना है।
मां दुर्गा का शौर्य, मां अन्नपूर्णा का त्याग, मां सरस्वती का ज्ञान और मां लक्ष्मी का संयम जीवन में उतरेगा, तभी समाज सशक्त बनेगा। शक्ति का अर्थ केवल पूजा करना नहीं, बल्कि निर्बल की रक्षा करना भी है। शक्तिधाम में गुरुकुल, चिकित्सालय, गोसेवा और संस्कार केंद्र के माध्यम से समाजसेवा की परिकल्पना की गई है।
शक्तिधाम न्यास के अध्यक्ष प्रशांत हड़तालकर ने बताया कि मध्यप्रदेश की 46 जनजातियां किसी न किसी देवी परंपरा से जुड़ी हैं। इन परंपराओं को एक मंच पर लाकर 51 शक्तिपीठों से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। बड़वाह में प्रस्तावित शक्तिधाम का मंदिर परिसर स्वस्तिक आधारित स्थापत्य पर निर्मित होगा।
यहां भारत माता की प्रतिमा, उद्यान और ध्यान-साधना क्षेत्र विकसित करने की योजना है। इसे धार्मिक स्थल के साथ वैज्ञानिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक अनुसंधान केंद्र के रूप में भी विकसित किया जाएगा।
संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने शक्ति उपासना की प्राचीन परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के संबंधों पर भी विचार रखे। ओंकारेश्वर ट्रस्ट के ट्रस्टी राव पुष्पेन्द्र सिंह ने भील समाज की परंपराओं का उल्लेख करते हुए बताया कि छोटे गांवों को ‘फला’, बड़े गांवों को ‘पाल’ और गांव के मुखिया को ‘गमेती’ कहा जाता है। जनजातीय समाज में शक्ति की अवधारणा जल, जंगल, जमीन और जीवन से गहराई से जुड़ी है।
छिंदवाड़ा के महापौर विक्रम अहाके और वन राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार ने भी विचार रखे। संगोष्ठी में मार्कण्डेय ऋषि पर आधारित लघु फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। समापन समारोह में संत रितेश दास महाराज सहित जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। संचालन दीपमाला रावत ने किया । शक्तिधाम न्यास के सचिव राकेश शर्मा ने आभार माना।
यह भी पढ़ें- भारतीय संस्कृति में परिवार की अवधारणा व्यापक : राज्यपाल मंगुभाई पटेल