
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : महाकाल की नगरी में फूलों की बढ़ती मांग अब खेतों तक पहुंच रही है। मंदिरों में चढ़ावे से लेकर धार्मिक आयोजनों तक फूलों की खपत बढ़ने के बीच उज्जैन जिले के 65 गांवों में करीब 3000 एकड़ में फूलों का क्लस्टर विकसित किया जा रहा है।
कायथा, झारड़ा, इंगोरिया, कासमपुर और कालियादेह सहित चयनित गांवों में कटफ्लावर और अन्य फूलों की खेती को विस्तार देने की प्रक्रिया चल रही है। लक्ष्य किसानों को परंपरागत फसलों के साथ अधिक आय की संभावना वाली उद्यानिकी खेती से जोड़ना है। इसके लिए फूल उगाने के साथ उन्हें सुरक्षित रखने, बाजार तक पहुंचाने और बेहतर मूल्य दिलाने की व्यवस्था विकसित करने पर जोर है।
भंडारण, पैकिंग, परिवहन और बिक्री तक का प्लानकृषि उत्पादन आयुक्त केसी गुप्ता ने संभागीय समीक्षा बैठक में उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ाने, किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देने तथा क्लस्टर के साथ कॉमन मार्केटिंग और कोल्ड चेन विकसित करने के निर्देश दिए थे।
फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर भी जोर दिया गया। इसका उद्देश्य फूलों की खेती को केवल उत्पादन तक सीमित न रखकर भंडारण, पैकिंग, परिवहन और बिक्री की सुविधाओं से जोड़ना है। फूलों की गुणवत्ता कटाई के बाद उन्हें संभालने और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था पर निर्भर करती है।
साझा संग्रहण, पैकिंग और परिवहन सुविधाएं किसानों को उपज बेचने में मदद कर सकती हैं। स्थानीय मांग के साथ इंदौर, भोपाल और अन्य शहरों के बाजारों को ध्यान में रखकर विपणन व्यवस्था विकसित करने से बिक्री के अवसर बढ़ सकते हैं।
उज्जैन में महाकाल सहित सभी बड़े मंदिरों से अर्पित फूलों का उपयोग अगरबत्ती और खाद बनाने में करीब 10 वर्षों से किया जा रहा है। पूजा के बाद अनुपयोगी समझे जाने वाले फूलों को उपयोगी उत्पादों में बदलने से कचरे के प्रबंधन में मदद मिल रही है। धार्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ मंदिरों में फूलों की खपत और चढ़ावे के बाद निकलने वाले पुष्प अपशिष्ट का प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। फूलों से अगरबत्ती और खाद बनाने जैसी गतिविधियों का विस्तार स्थानीय प्रसंस्करण, रोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ा सकता है।
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