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अश्विन से मार्गशीर्ष तक छह बार नगर भ्रमण पर निकलेंगे भगवान महाकाल, विजयादशमी पर शमी पूजन के लिए दशहरा मैदान पहुंचेंगे

ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर की समृद्ध पूजन परंपरा में आने वाले तीन माह विशेष होंगे। अश्विन से मार्गशीर्ष तक भगवान महाकाल छह बार चांदी की पालकी में सवार ...और पढ़ें

By Rajesh VermaEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sun, 04 Oct 2026 07:17:44 PM (IST)Updated Date: Sun, 04 Oct 2026 07:17:44 PM (IST)
अश्विन से मार्गशीर्ष तक छह बार नगर भ्रमण पर निकलेंगे भगवान महाकाल, विजयादशमी पर शमी पूजन के लिए दशहरा मैदान पहुंचेंगे
पालकी में विराजित भगवान महाकाल। फाइल फोटो

HighLights

  1. वैकुंठ चतुर्दशी पर गोपाल मंदिर में होगा हरि-हर मिलन
  2. कार्तिक-अगहन में तीर्थपूजन की परंपरा
  3. छह बार चांदी की पालकी में सवार होकर भ्रमण पर निकलेंगे

राजेश वर्मा, नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर की समृद्ध पूजन परंपरा में आने वाले तीन माह विशेष होंगे। अश्विन से मार्गशीर्ष तक भगवान महाकाल छह बार चांदी की पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलेंगे।

विजयादशमी पर अवंतिकानाथ राजा के रूप में दशहरा मैदान पहुंचकर शमी वृक्ष का पूजन करेंगे, जबकि वैकुंठ चतुर्दशी पर श्रीहरि विष्णु से मिलने गोपाल मंदिर जाएंगे। कार्तिक-अगहन मास में निकलने वाली सवारियों में भगवान महाकाल शिप्रा तट पर तीर्थपूजन की परंपरा भी निभाएंगे।

20 अक्टूबर की दशहरा की सवारी विशेष होगी

महाकाल मंदिर की पूजन परंपरा में श्रावण-भाद्रपद की सवारियां सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, लेकिन भगवान महाकाल का नगर भ्रमण केवल इन दो महीनों तक सीमित नहीं है। विजयादशमी, कार्तिक और अगहन मास में भी विशेष पर्वों के अवसर पर सवारी निकलती है। इस बार अश्विन से मार्गशीर्ष तक इन परंपराओं के छह अवसर आएंगे। इनमें 20 अक्टूबर की दशहरा की सवारी विशेष होगी, क्योंकि इसी दिन भगवान महाकाल साल में एक बार फ्रीगंज क्षेत्र में प्रवेश कर दशहरा मैदान पहुंचेंगे।


महाकाल उज्जैन के राजा, इसलिए निभाते हैं विजय की परंपरा

विजयादशमी पर भगवान महाकाल की सवारी राजसी परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। दशहरा मैदान पहुंचकर अवंतिकानाथ शमी वृक्ष का पूजन करेंगे। भारतीय परंपरा में शमी को विजय, शक्ति और मंगल का प्रतीक माना गया है। महाकाल को उज्जैन का अधिपति और राजा मानने की परंपरा में विजयादशमी का यह पूजन राजधर्म और लोकमंगल की भावना से जुड़ा है।

वैकुंठ चतुर्दशी पर होगा हरि-हर मिलन

कार्तिक मास की सवारी का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग वैकुंठ चतुर्दशी का होगा। 23 नवंबर की रात भगवान महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर पहुंचेगी, जहां रात 12 बजे हरि-हर मिलन की परंपरा निभाई जाएगी। मान्यता है देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु शिव को सृष्टि का भार सौंपकर राजा बलि के यहां पाताल लोक चले जाते हैं। देवप्रबोधिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने और वैकुंठ आगमन के बाद वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान महाकाल श्रीहरि विष्णु को सृष्टि का भार सौंपने जाते हैं। गोपाल मंदिर में हरि हर मिलन इसी धर्म प्रसंग को जीवंत करता है।

कार्तिक-अगहन में शिप्रा तट पर तीर्थपूजन

सनातन धर्म परंपरा में कार्तिक-अगहन मास को स्नान, दान और तीर्थपूजन के लिए विशेष मास माना गया है। कार्तिक और अगहन मास में भगवान महाकाल की सवारियां तीर्थपूजन की इसी परंपरा से भी जुड़ी हैं। भगवान महाकाल उज्जैन के राजा हैं, इसलिए वें स्वयं तीर्थ पूजन के लिए शिप्रा तट पहुंचते हैं और प्रजाजनों के साथ तीर्थ का पूजन करते हैं।

कार्तिक-अगहन में सवारी कब-कब

  • कार्तिक मास की पहली सवारी : 16 नवंबर 2026
  • कार्तिक मास की दूसरी सवारी : 23 नवंबर 2026
  • वैकुंठ चतुर्दशी : 23 नवंबर की रात 11 बजे हरि-हर मिलन की सवारी
  • मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पहली सवारी : 30 नवंबर 2026
  • मार्गशीर्ष (अगहन) मास की दूसरी सवारी : 7 दिसंबर 2026

12 अक्टूबर : उमा संग सांझी विसर्जित करने जाएंगे महेश

भगवान महाकाल की सवारियों से पहले 12 अक्टूबर को अश्विन शुक्ल द्वितीया पर उमा माता की सवारी निकलेगी। उमा माता चांदी की पालकी में सवार होकर रामघाट पहुंचेंगी और उमा सांझी उत्सव के समापन पर शिप्रा में सांझी का विसर्जन होगा। मंदिर की परंपरा में माता पार्वती की यह सवारी वर्ष में केवल एक बार निकलती है। इस सवारी में भी भगवान नंदी पर मनमहेश रूप में सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं।

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