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भगवान महाकाल को ठंडक प्रदान करने के लिए प्रवाहित करेंगे शीतल जलधारा

ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से ज्येष्ठ पूर्णिमा तक पूरे दो माह गलंतिका बांधी जाती है।

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Mon, 30 Mar 2026 11:49:23 AM (IST)Updated Date: Mon, 30 Mar 2026 11:58:21 AM (IST)
भगवान महाकाल को ठंडक प्रदान करने के लिए प्रवाहित करेंगे शीतल जलधारा
भगवान महाकाल के शीश बंधी गलंतिका। फाइल फोटो

HighLights

  1. भगवान महाकाल को मटकियों से जल अर्पण करने की परंपरा
  2. गलंतिका बांधने का क्रम 3 अप्रैल से 30 मई तक दो माह चलेगा
  3. वैशाख व ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में चढ़ाया जाएगा जल

नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। वैशाख व ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में भगवान महाकाल को ठंडक प्रदान करने के लिए उनके शीश मिट्टी की मटिकयों में जल भरकर शीतल जलधारा प्रवाहित की जाएगी। मटकियों के माध्यम से जल अर्पण की इस परंपरा को गलंतिका बंधन कहा जाता है। महाकाल मंदिर में गलंतिका बांधने का क्रम 3 अप्रैल से 30 मई तक दो माह चलेगा।

ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से ज्येष्ठ पूर्णिमा तक पूरे दो माह गलंतिका बांधी जाती है। इस बार गलंतिका बांधने की शुरुआत वैशाख कृष्ण प्रतिपदा पर 3 अप्रैल से होगी। पुजारी पवित्र नदियों के नाम से उनका आह्वान पूजन कर भगवान के शीश गलंतिका बांधेंगे। इसके बाद शाम 4 बजे तक शीतल जल अर्पण होगा। मटकियों के माध्यम से जल अर्पण का क्रम निर्धारित समय पर पूरे दो माह तक चलेगा।


इसलिए बांधी जाती है गलंतिका

पं. महेश पुजारी ने बताया समुद्र मंथन के समय 14 रत्न प्राप्त हुए थे। उसमें कालकूट विष भी शामिल था। यह विष अत्यंत भयंकर था, इसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि पर खतरा मंडराने लगा था। देवता, दानव किसी में इसे प्राप्त करने का सामर्थ्य नही था, तब भगवान शिव ने विषपान किया और इसे अपने कंठ में स्थान दिया।

विष की गर्मी से भगवान को राहत प्रदान करने के लिए ही शिव को जलार्पण का महत्व है। मान्यता है वैशाख और ज्येष्ठ मास में गर्मी अधिक होने से विष की उष्णता भी बढ़ जाती है। इसलिए इन दो माह भगवान पर मिट्टी की मटकियों से एक दम ठंडे पानी की जलधारा प्रवाहित करने की परंपरा है।

वैशाख में स्नान दान का महत्व

ज्योतिर्विद पं.हरिहर पंडया ने बताया वैशाख मास में स्नान, दान का विशेष महत्व है। 3 अप्रैल से वैशाख स्नान प्रारंभ होगा। श्रद्धालु शिप्रा स्नान के बाद दान पुण्य करेंगे। वैशाख में प्याऊ लगाना, पशु और पक्षियों के लिए क्रमश: पानी की ठेल व जल पात्र रखना, चारे व दाना पानी का प्रबंध करना आदि कार्य पुण्यप्रद माने गए हैं। वैशाख में भगवान विष्णु के मंदिरों में चावल, सत्तु, चंदन आदि का दान भी भक्त को जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्त करता है।

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