
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। महाकाल वन में स्थित चौरासी महादेव के मंदिरों में यह पटनी बाजार स्थित भगवान श्री नागचंद्रेश्वर का मंदिर है। प्रतिवर्ष वैशाख कृष्ण दशमी पर यात्री इसी मंदिर में भगवान नागचंद्रेश्वर से बल लेकर पंचकोसी यात्रा की शुरुआत करते हैं। शहर के मध्य इस मंदिर का जितना धार्मिक महत्व है, मूर्ति शिल्प की दृष्टि से भी यह उतना ही बेजोड़ है। मंदिर का प्रवेश द्वार पार्वती पट से आच्छादित है। इसमें माता पार्वती के विभिन्न स्वरूपों का अंकन किया गया है। मंदिर में एक हजार साल पुरानी मूर्तियों का संसार समाया है।

विक्रम विश्व विद्यालय के पुराविद डा.रमण सोलंकी ने बताया नागचंद्रेश्वर मंदिर भारतीय मूर्ति शिल्प के गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए है। यह सभी मूर्तिया मालवा बेसाल्ट पर उंकेरी गई एक हजार साल पुरानी है। इस मंदिर की आधार शिला परमार काल में रखी गई थी। उस समय शिल्पियों ने भरे बलवा प्रस्तर (मालवा बेसाल्ट) पर मूर्तियों का अंकन किया। परमार काल में शिव मंदिरों के प्रवेश द्वार को पार्वती पट से सुसज्जित करने की परंपरा रही है, जो इस मंदिर में दिखाई देती है। इसके अलावा मंदिर परिसर में भैरव व उमा महेश्वर की मूर्तियां भी स्थापित है। यह मूर्तियां शिल्प कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

गर्भगृह में केदारेश्वर महादेव के दर्शन
नागचंद्रेश्वर मंदिर के गर्भगृह में मुख्य शिवलिंग के समीप एक छोटा शिवलिंग भी प्रतिष्ठित है। यह केदारनाथ के शिवलिंग की तरह दृष्टि गोचर होता है। पुजारियों के अनुसार भगवान नागचंद्रेश्वर शेषनाग अवतार बलदाऊ का रूप है। इनसे बल लेकर यात्रा शुरू करने पर थकान नहीं होती है। यात्रा पूर्ण होने पर भगवान को मिट्टी के घोड़े अर्पित कर बल लौटाना अनिवार्य है। इसके बाद ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है।