
राजेश वर्मा, नईदुनिया, उज्जैन। शारदीय नवरात्र में उज्जैन के प्रसिद्ध गढ़कालिका मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालु जिस टीले पर प्राचीन देवी के दर्शन करते हैं, उसके नीचे 2500 साल पुरानी नगरीय सभ्यता का रहस्य दबा है। यह कहानी है उस उज्जयिनी की, जहां करीब ढाई हजार साल पहले लोग मिट्टी के घरों में रहते थे, लोहे के औजारों का उपयोग करते थे और अपनी बस्ती की रक्षा के लिए विशाल मिट्टी का दुर्ग बनाते थे।
दुर्ग के बाहर खाई थी और उसके आसपास ऐसे आवास थे, जो किलेबंद क्षेत्र से बाहर बसे थे। शिप्रा के किनारे बसे इस नगर को बाढ़ से बचाने के लिए भी बड़े स्तर पर निर्माण किया गया था।
भारतीय पुरातत्व विभाग की 1955-56, 1956-57 और 1957-58 की वार्षिक रिपोर्टों में गढ़कालिका के टीले पर हुए उत्खनन के जो विवरण दर्ज हैं, वे प्राचीन उज्जयिनी की एक तस्वीर बनाने में मदद करते हैं। मिट्टी की दीवारों, घरों, औजारों, बर्तनों और बाढ़ से क्षतिग्रस्त संरचनाओं के अवशेषों से नगर के जीवन की कई झलकियां मिलती हैं।
पुराविद डॉ. रमण सोलंकी ने बताया कि गढ़कालिका के आसपास का संपूर्ण परिक्षेत्र प्राचीन उज्जैन है। यहां नगरी सभ्यता, विदेशों से व्यापार, दस्तकारी,साहित्य और संस्कृति के प्रमाण मिलते रहे हैं और आज भी यह सिलसिला रुका नहीं है। माता गढ़कालिका का मंदिर अपने आप में अलभ्य है। यह सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक महाकवि कालिदास की आराध्य देवी हैं।
1957-58 की पुरातत्व रिपोर्ट के अनुसार, गढ़कालिका के प्राचीन दुर्ग की रक्षा-दीवार आधार पर करीब 245 फीट चौड़ी थी। इसके बाहर बनी खाई लगभग 152 फीट चौड़ी थी। इस निर्माण का सबसे पुराना कालखंड 700 से 500 ईसा पूर्व माना गया है।
1956-57 की रिपोर्ट में दुर्ग से घिरे क्षेत्र का विस्तार करीब एक मील लंबा और तीन-चौथाई मील चौड़ा बताया गया है। दीवार की बची हुई अधिकतम ऊंचाई लगभग 42 फीट थी। दुर्ग का भीतरी हिस्सा सुरक्षित था, जबकि साधारण आवास बाहर खुले क्षेत्र में थे।
उत्खनन में मिट्टी के घरों के साथ लोहे के भाले, तीर के फल, चाकू, मिट्टी के मनके, तकली के चक्र और विभिन्न प्रकार के बर्तन मिले। पकी ईंटों और तराशे हुए पत्थरों की संरचनाएं भी सामने आईं। ये अवशेष तत्कालीन जीवन की झलक देते हैं।
तकली के चक्र कताई जैसे काम और लोहे के औजार धातु के उपयोग की ओर संकेत करते हैं। बर्तन और घरेलू संरचनाएं उस समय की दिनचर्या और आजीविका के बारे में जानकारी देते हैं।
1955-56 की पुरातत्व रिपोर्ट के अनुसार, दुर्ग की रक्षा-दीवार सफेद और गहरी चिपचिपी मिट्टी की परतों से बनाई गई थी। इनमें कोयले के अंश भी मिले। नीचे बड़ी पकी ईंटों की एक परत थी। रिपोर्ट में उल्लेख है कि शिप्रा की बार-बार आने वाली बाढ़ से दीवार को काफी नुकसान पहुंचा था।
इसी कारण उसके कुछ हिस्से ही उत्खनन में मिल सके। ये अवशेष बताते हैं कि प्राचीन उज्जयिनी का यह दुर्ग विशाल रक्षा संरचना होने के साथ प्राकृतिक चुनौतियों का भी सामना करता था।
1955-56 की पुरातत्व रिपोर्ट के अनुसार, गढ़कालिका के टीले का विस्तार इतना बड़ा है कि सीमित उत्खनन से प्राचीन उज्जयिनी की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ सकती। भविष्य में यहां पुरातात्विक अध्ययन और उत्खनन से इस विरासत की अनखुली परतों को समझने का अवसर मिल सकता है।
नवरात्र में मां गढ़कालिका के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह जानना भी रोचक है कि मंदिर के आसपास की धरती में प्राचीन नगर के इतिहास के कई रहस्य छिपे हो सकते हैं।
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