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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 07, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Shipra River Pollution Ujjain: मोक्षदायिनी शिप्रा, आचमन छोड़ स्नान के लायक भी नहीं है जल

Shipra River Pollution Ujjain: डेढ़ दशक में शिप्रा नदी का जल स्वच्छ होने की बजाय और अधिक प्रदूषित हुआ है।

By Nai Dunia News NetworkEdited By: Nai Dunia News Network
Publish Date: Sun, 07 Nov 2021 10:30:15 PM (IST)Updated Date: Mon, 08 Nov 2021 02:16:15 PM (IST)
Shipra River Pollution Ujjain: मोक्षदायिनी शिप्रा, आचमन छोड़ स्नान के लायक भी नहीं है जल

Shipra River Pollution Ujjain: उज्जैन (नईदुनिया प्रतिनिधि)। वर्षाकाल समाप्त हुए महीना गुजर गया है, बावजूद मोक्षदायिनी शिप्रा नदी में देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर और उज्जैन के नालों का पानी सीधे मिलना बदस्तूर जारी है। ये सारा नजारा देख श्रद्धालुओं की आस्था आहत हो रही है। उनका कहना है कि शिप्रा का पानी आचमन छोड़ स्नान लायक भी नहीं है। शिप्रा का जल स्वच्छ बनाए रखने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए। आखिर मोक्षदा को कब मोक्ष मिलेगा। मालूम हो कि डेढ़ दशक में शिप्रा नदी का जल स्वच्छ होने की बजाय और अधिक प्रदूषित हुआ है। जबकि शिप्रा की शुद्धि के लिए सरकार 700 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तकनीकी रूप से शिप्रा का पानी डी-ग्रेड का करार दे चुका है। इसका मतलब है कि शिप्रा का पानी पीना छोड़, नहाने लायक भी नहीं है। सुधार के लिए बोर्ड कई बार सरकार को आगाह कर चुका है, लेकिन बेहतर उपाय अब तक नहीं किए गए हैं।

परिणाम स्वरूप जलीय जीव और जनस्वास्थ्य पर इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। सवाल यह है कि करोड़ों खर्च करने पर भी शिप्रा की शुद्धि क्यों नहीं हो पाई। जबकि इसकी शुद्धि का विषय, कांग्रेस के वचन पत्र से लेकर भाजपा के संकल्प पत्र में शामिल है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार शिप्रा के प्रदूषित होने का मुख्य कारण शहरीकरण, उसकी अनियंत्रित दर और बिना उपचारित सीवरेज का पानी नदी में मिलना है। खासतौर से सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के गंदे नालों का सीवरेज, कान्ह नदी के रूप में उज्जैन आकर शिप्रा नदी में मिलना है।


Shipra River Ujjain: शिप्रा नदी में गंदा पानी रोकने को करोड़ों के प्रोजेक्ट, सभी असफल

शिप्रा में सीधे गंदा पानी न मिले, इसके लिए सरकार ने पांच साल पहले इंदौर में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ाई थीं। उज्जैन में श्रद्धालुओं को पर्व स्नान दूषित जल में ना करना पड़े, इसके लिए 95 करोड़ रुपये खर्च कर राघौपिपल्ल्‌या गांव से कालियादेह पैलेस तक भूमिगत पाइपलाइन बिछवाई थी। मगर ये प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल नहीं हो सका। क्योंकि तब मंत्री, अफसरों ने कहा था कि वर्षाकाल (जून से सितंबर) को छोड़कर शेष 8 माह में कभी भी नहान क्षेत्र (त्रिवेणी से कालियादेह महल) के बीच शिप्रा में कान्ह नदी का पानी नहीं मिलेगा। मगर हकीकत में ऐसा कभी नहीं हुआ। हर साल अक्टूबर के बाद भी ग्रीष्मकाल प्रारंभ होने तक कान्ह का पानी शिप्रा में मिलता रहा। कारण, कभी पाइपलाइन लीकेज होना तो कभी इंदौर से सीवरेज का पानी अधिक मात्रा में आना रहा।

Sacred River Shipra: विधायक ने कहा था- शिप्रा मैली क्यों, शुद्धिकरण के लिए योजना बनाएं

पिछले महीने 26 अक्टूबर को हुई जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति की बैठक में विधायक पारस जैन ने आते ही कहा था कि 700 करोड़ रुपये खर्च करने पर भी शिप्रा मैली क्यों है। ये लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा सवाल है। शिप्रा की शुद्धि के लिए अफसर कार्य योजना बनाएं। उज्जैन को पानी के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने सेवरखेड़ी में शिप्रा नदी पर बांध बनाने पर पर भी जोर दिया था। बैठक में सांसद अनिल फिरोजिया ने भी इस बात का समर्थन किया था। कहा था कि शिप्रा की शुद्धि बहुत जरूरी है। मगर ये सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं। समाज को भी जागरूक होना होगा। इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम सतत चलाए जाने की जरूरत है।

Shipra River News: शिप्रा नदी के बारे में वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं

18 साल पहले प्रदेश में जब भाजपा की सरकार बनी थी, तब शिप्रा को शुद्ध और सदानीरा बनाने का संकल्प लिया गया था। सबसे बड़ा कदम नर्मदा को शिप्रा से लिंक करने का उठाया था। इस पर 432 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। पहली बार साल 2016 में सिंहस्थ का स्नान लोगों ने नर्मदा-शिप्रा के संगम जल में किया था। बाद में हालात यह बने कि नर्मदा का जल शिप्रा में दो ही वजह से छोड़ा गया। एक, जब शिप्रा अत्यधकि प्रदूषित हो गई हो और दूसरा जब शिप्रा में पानी सूख गया हो। सिंहस्थ के दरमियान ही शिप्रा की शुद्धि के लिए सरकार ने एक ओर कदम उठाया था। वो था इंदौर के नालों के पानी से बनी कान्ह नदी के गंदे पानी को नहान क्षेत्र, त्रिवेणी से केडी पैलेस तक न मिलाकर राघौपिपल्या से डायवर्ट कर केडी पैलेस के आगे मिलाना।

ये प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल न होने से हमेशा विवादों में रहा। इसके बाद नवंबर-2017 में सरकार ने 402 करोड़ रुपये का भूमिगत सीवरेज पाइपलाइन प्रोजेक्ट शुरू कराया, जो अनुबंध अनुसार साल 2019 में पूरा हो जाना था, पर मौजूदा कार्य की गति देखकर लगता है कि ये प्रोजेक्ट साल 2023 तक भी पूरा नहीं हो पाएगा। क्योंकि नगर निगम से अनुबंधित टाटा प्रोजेक्ट्स कंपनी चार साल में सिर्फ 200 किलोमीटर सीवरेज पाइपलाइन ही बिछा पाई है। 239 किलोमीटर पाइपलाइन बिछाना अब भी बाकी है। पाइपलाइन बिछाने के साथ कंपनी को 80 हजार घरों में कनेक्शन भी जोड़ना है।