
राजेश वर्मा, नईदुनिया, उज्जैन : उज्जैन की मिट्टी में श्री कृष्ण की कथा केवल सांदीपनि आश्रम तक सीमित नहीं है। हजारों वर्षों से चली आ रही कृष्ण-स्मृति यहां के मंदिर, तीर्थ और पुरातात्त्विक अवशेषों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
कृष्ण कुल परंपरा का एक ऐसा ही अद्भुत अध्याय गढ़कालिका मंदिर के समीप स्थित श्री विष्णु चतुष्टिका में एक पाषाण पर उकेरा गया है। 11 वीं शताब्दी की इस मूर्ति में कृष्णवंश के चार प्रमुख पुरुषों के दर्शन एक ही शिलाखंड पर होते हैं। बलुआ पत्थर से निर्मित इस मूर्ति की खासियत यह है कि इसके अंगों या अस्त्रों, शस्त्रों को थपथपाने पर अलग-अलग प्रकार की मधुर ध्वनि निकलती है।

बाहर से पारदर्शी द्वार से इस प्रकार दिखाई देती है विलक्षण मूर्ति। (नईदुनिया)
मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के शोध अधिकारी डा. ध्रुवेंद्र जोधा ने बताया विष्णु चतुष्टिका की मूर्ति शिल्प शास्त्र की दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ व महत्वपूर्ण है। 15 सेंटी मीटर चौड़ी तथा 96 सेंटी मीटर ऊंची पद्मासन मूर्ति में भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु रूप में प्रदर्शित किया गया है। शेष तीन मूर्तियां कृष्ण वंश के प्रमुख पुरुषों की है।
चारों मूर्तियां किरीट मुकुट, श्रीवत्स, कर्ण कुण्डल, कटख, बलय, यज्ञोपवीत आदि से सुसज्जित हैं। खास बात यह है कि मूर्तिकार की कल्पना ने पत्थर को ऐसा रूप दिया कि उसका गुण धर्म ही बदल गया, जो पत्थर सदियों से मौन था वह छूते ही बोलने लगता है, अर्थात मूर्ति से मधुर ध्वनि निकलने लगती है।
प्राचीन उज्जैन के गढ़ कालिका क्षेत्र में स्थित विष्णु चतुष्टिका की मूर्ति मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग की भूमि पर एक आयातकार कक्ष में संरक्षित है। इस कक्ष के पारदर्शी चार द्वार हैं। भक्त कक्ष की परिक्रमा करते हुए चार द्वार से मूर्ति की चारों मुखाकृति के दर्शन करते हैं। कोई भी व्यक्ति इस दुर्लभ प्रतिमा का स्पर्श अथवा नुकसान पहुंचाने की चेष्टा ना कर सके, इसलिए चार द्वार पर 10 से 12 ताले लगाए गए हैं। कक्षा की सुरक्षा के लिए चौबीस घंटे सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं।
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