उज्जैन (नईदुनिया प्रतिनिधि)। पुरातात्विक स्मारक के रूप में संरक्षित खाकचौक स्थित श्रीराम जनार्दन मंदिर के गर्भगृह में 300 साल पुराने मालव मराठा शैली के भित्ति चित्र मिले हैं। इन चित्रों में भगवान श्रीराम की जन्म कुंडली का अंकन करते गुरु वशिष्ठ का चित्र भी है। विक्रम विश्व विद्यालय के ज्योतिष विभागाचार्य डा.सर्वेश्वर शर्मा ने भित्ति चित्र में दृश्य हो रही भगवान श्री राम की जन्म कुंडली का अवलोकन किया।
उन्होंने पाया कि जन्म कुंडली त्रेतायुग में हुए श्रीराम के जन्म समय को दर्शाती है। इसमें केवल अंक दिए गए है, ग्रहों का उल्लेख नहीं है। कुंडली पर शोध करने पर ज्ञात हुआ कि किन ग्रहों के कारण भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बने।
डा.सर्वेश्वर शर्मा ने बताया बीते दिनों विक्रम विश्व विद्यालय के शोधार्थी तिलकराजसिंह सोलंकी ने इन भित्ति चित्रों को खोजा था। उनके साथ जाकर मैंने भित्ति चित्र में अंकित जन्म कुंडली का अवलोकन किया।
चित्रित जन्म कुंडली लग्न कुंडली है। इसमें अंक दिए गए हैं, लेकिन ग्रहों का उल्लेख नहीं है। मैंने इस संबंध में शोध प्रारंभ किया और तुलसीकृत श्री रामचरित मानस तथा वाल्मीकि रामायण के आधार पर उस कुंडली में अंकों के आधार पर ग्रहों की स्थापना कर अनुंसधन प्रारंभ किया।
आश्चर्य इस बात का है कि चित्रित कुंडली के अंक प्रभु श्रीराम के जीवन चरित्र से शतप्रतिशत मेल खाते हैं। बतादें नईदुनिया ने 27 दिसंबर को "श्री रामजनार्दन मंदिर में 300 साल पुराना मालव मराठा शैली के चित्रों का संसार" शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। इसके बाद इस पर शोध की शुरुआत हुई और शुक्रवार को महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए।
1. शंख योग -लग्नेश, पंचमेश, षष्ठेश चंद्र, गुरु और मंगल परस्पर केंद्र में होने से शंख योग है। यह योग श्रीराम को उच्च आदर्शवादी, दयालु, पुण्यकर्मा बनाता है।
2. लक्ष्मी योग- नवमेश उच्च का होकर बलवान लग्नेश के साथ होने से लक्ष्मी योग बनता है जो श्रीराम को सुंदर, गुणी, अखंड भूमंडल का स्वामी तथा दसों दिशाओं के राजाओं से पूजित बनाता है।
3. दुर्वार शत्रुमारक योग -लग्नेश लग्न में मित्र ग्रह मंगल से दृष्ट है तथा लग्न में शुभ ग्रह होने से यह योग बनता है। जो श्रीराम को अजेय शत्रु रावण और अन्य राक्षसों को मारने वाला बनता है।
4. चामर योग -चंद्र गुरु होने पर चामर योग बन रहा है। जो श्रीराम को राजाओं द्वारा पूजित, वेदादि का ज्ञाता, सर्वज्ञ विद्वान बनाता है।
5. चंद्र के साथ लग्नस्थ गुरु राजयोग कारक होकर श्रीराम को राजकुलोत्पन्न राजा बनाता है। इसके साथ ही गुरु शुक्र उच्च के होकर लग्न और नवम भाव में है। यह भी राजयोग कारक है।
6. मृग योग - लग्नेश चंद्र के साथ नवमेश गुरु लग्न में तथा चतुर्थेश शुक्र उच्च का होकर नवम में होने से मृग योग बनता है जो श्रीराम को अखंड भूमि का स्वामी, धार्मिक और भाग्यवान बनता है।
7. हंस योग -गुरु उच्च का होकर लग्न में है जो हंस योग बनाता है। जो श्रीराम को गुरुभक्त, ज्ञानी औऱ पुण्यकर्मा बनता है।
8. शश योग - शनि चतुर्थ में उच्च का होने पर शश योग बन रहा है। जो श्रीराम को न्याय प्रिय, त्यागी, तपस्वी बनाता है।
9. रूचक योग - मंगल सप्तम में उच्च राशि का होकर रूचक योग बनाता है जो श्रीराम को अत्यंत दुःसाहसी, परमवीर, शत्रुमारक और आक्रामक बनाता है।
10. गजकेसरी योग -चंद्र गुरु की युति गजकेसरी योग बना रही है जो श्रीराम को प्रजारंजक राजा, दयालु, मर्यादा का पालन करने वाला बनाती है।
11. सम्राट योग - सूर्य, मंगल, शनि, शुक्र और मंगल ये पांच ग्रह उच्च राशि के होकर सम्राट योग बना रहे हैं जो श्रीराम को सार्वभौमिक सम्राट बनाते हैं।