उज्जैन को मंदिरों का शहर कहा जाता है। महाकाल के मंदिर के साथ ही यहां कई सौ मंदिर हैं। महाकाल मंदिर के ठीक पास में बड़ा गणेश मंदिर हैं। इससे आगे हरसिद्धि माता का मंदिर है। देवी का यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। उज्जैन साहित्य, संस्कृति, धर्म, भाषा तथा ज्योतिष का भी केंद्र रहा है। आज के उज्जैन को उज्जयिनी तथा अवंती कहा जाता था। विद्या के केंद्र उज्जैन में योगाभ्यास तथा आध्यात्मिक आराधना भी वर्षों तक की गई। यह महान कवियों की कर्मभूमि रहा।
हरसिद्धि मंदिर
देश में स्थित 52 शक्तिपीठों में से एक उज्जैन में मां हरसिद्धि का स्थान है। यह मंदिर देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है जो गहरे सिंदूरी रंग में रंगी है। देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति देवी महालक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्तियों के बीच विराजमान है।हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में श्रीयंत्र निर्मित है। कहा जाता है कि यह सिद्ध श्रीयंत्र है और इस महान यंत्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है। मंदिर के प्रांगण में कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो उज्जैन के चौरासी महादेव में से एक है। मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित सबके आकर्षण का केंद्र है। देवी हरसिद्धि राजा विक्रमादित्य की कुल देवी हैं।
मंगलनाथ मंदिर
शिप्रा नदी तट के किनारे भगवान मंगलनाथ का मंदिर है। उज्जैन को मंगल ग्रह की जन्मभूमि माना जाता है। मंदिर के अंदर माता भूमि की मूर्ति भी स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि मंगनाथ के ठीक ऊपर ही आसमान में मंगल ग्रह स्थित है। जन्मकुंडली में मंगलदोष निवारण के लिए यहां विशेष भात पूजा की जाती है।
चिंतामण गणेश मंदिर
स्वयंभू भगवान गणेश की प्रतिमा शिप्रा नदी के पास इंदौर-फतेहाबाद रेल लाइन पर स्थित है। मान्यता है कि गणेश जी के दर्शन से सारी सांसारिक चिंताओं से मुक्ति मिल जाती है। इसलिए इन्हें चिंताहरण गणेश कहा जाता है। परमार काल के दौरान इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था।
श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा की विद्यास्थली सांदीपनि आश्रम
शिक्षा के क्षेत्र में उज्जैन का नाम सबसे ऊपर रहा। यहीं कारण था कि कृष्ण और बलराम उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उज्जैनी में गुरु सांदीपनी के आश्रम आए थे। सारी विधाओं के ज्ञाता कृष्ण-बलराम के गुरु सांदीपनि, संदीपन के पुत्र थे। जो उज्ज्वल है, वह सांदीपन कहलाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार वसुदेव ने अपने पुत्रों का यज्ञोपवीत कराया। उसके बाद दोनों को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से अवंती (उज्जैन) के सांदीपनि आचार्य के पास भेजा। आचार्य ने कृष्ण तथा बलराम को छहों अंग-उपनिषदों, धनुर्वेद, धर्मशा मीमांसा, न्याय शास्त्र के साथ राजनीति का भी अध्ययन कराया। केवल चौंसठ दिन-रात में दोनों भाइयों ने चौंसठ कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
कालभैरव मंदिर
भगवान काल भैरव को उज्जैन नगर का सेनापति भी कहा जाता है। इन्हें प्रसाद के रूप में मदिरा का भोग लगाया जाता है। आठ भैरव की पूजा शैव परंपरा का एक हिस्सा है और इनमें से काल भैरव को प्रधान माना जाता है। कहते हैं कि क्षिप्रा के तट पर काल भैरव के मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने करावाया था। मराठा सरदारों की पगड़ी भगवान कालभैरव के शीश पर पहनाई जाती है।
बड़े गणेशजी मंदिर
मंदिर में गणेश जी की विशाल प्रतिमा स्थित हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन कर मांग गई कामना जल्द ही पूरी हो जाती है। मंदिर महाकालेश्वर मंदिर के पास हरसिद्धी मंदिर जाने वाले मार्ग पर ही स्थित है।
नगरकोट की रानी
अवंति खंड में वर्णित नौ मातृकाओं में से सातवीं कोटरी देवी हैं। जो नगरकोर्ट के परकोटे की रक्षिका देवी हैं। इनका मंदिर परमार काल में बनाया गया था। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
चौबीस खंबा माता
महाकाल मंदिर से कुछ दूर पटनी बाजार की ओर जाने वाली मार्ग पर बने द्वार को चौबीस खंबा कहते हैं। द्वार के दोनों पार्श्व भागों में चौबीस खम्बे लगे हैं और इसलिए इसे चौबीस खम्बा दरवाजा कहते हैं। इस दरवाजे को महामाया देवी मानते हैं, यहां महालया एवं महामाया की मूर्तियां हैं और नवरात्रि की अष्टमी को पूर्व परंपरानुसार प्रशासन द्वारा मंदिर में पूजा करवाई जाती है।
त्रिवेणी घाट पर शनि मंदिर
इंदौर-उज्जैन मार्ग पर शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर बना शनि और नवग्रह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस घाट पर शिप्रा नदी पर तुंगभद्रा(खान नदी) से संगम होता है। इस स्थान से अदृश्य सरस्वती नदी की पौराणिक मान्यता भी जुड़ी है। शनि अमानवस्या और शनि जयंती पर यहां विशेष मेला लगता है।
गढ़कालिका मंदिर
कवि काली दास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। माना जाता है कि इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद ही उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। परमार काल में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। सिधिंया शासन के दौरान भी मंदिर का पुननिर्माण करवाया गया।
गोपाल मंदिर
गोपाल कृष्ण का यह मंदिर 19वीं सदी में महाराजा दौलतराव शिंदे की पत्नी बायजाबाई शिंदे ने बनवाया था। मंदिर के गर्भगृह में गोपाल कृष्ण के अलावा शिव-पार्वती और बायजाबाई की प्रतिमाएं हैं। इस मंदिर का द्वार चांदी की नक्काशी से सुसज्जित है। कहा जाता है कि इस द्वार को सोमनाथ के मंदिर से गजनी ले जाया गया, जिसके बाद महादजी सिंधिया ने इसे प्राप्त कर मंदिर में दरवाजे को लगाया।
सिद्धवट मंदिर
स्कंद पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। सिध्दवट प्रयाग के अक्षयवट, वृन्दावन के वंशीवट तथा नासिक के पंचवट के समान ही प्रसिद्ध है। सिध्दवट घाट पर अन्त्येष्टि-संस्कार सम्पन्न किया जाता है। स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है।
पीर मत्स्येन्द्रनाथ
नवनाथों के प्रमुख ‘मत्स्येन्द्रनाथ’ थे। नाथ सम्प्रदाय के संतों को पीर कहा जाता है इसलिए ‘मत्स्येन्द्रनाथ’ को ‘पीर’ कहा जाता है। भर्तृहरि गुफा के पास ही इनकी समाधि है।
वेधशाला के पांच प्रमुख यंत्र
सम्राट यंत्र : यह यहां का सबसे बड़ा यंत्र है। यह दक्षिण में उत्तर धरातल से 23"-10" का कोण बनाता हुआ बनाया गया है। मध्य से 48 फीट लंबी व 22 फीट ऊंची दीवार है। यह दीवार त्रिकोणाकार है। ग्रहों के वेध हेतु उत्तरोमुख एक जीना है। इस जीने पर रेखाएं उत्कीर्ण है। यंत्र की दीवार पूर्व व पश्चिम की ओर दो वृत्त चतुर्थांश विषुवतवृत्त के धरातल में निर्मित किए गए हैं। इन पर घंटे, चौथाई घंटे, 5 मिनट व 20 सेकंड के चिन्ह बनाती हुई लकीरें उत्कीर्ण हैं।
मध्य की दीवार पर सूर्य का प्रकाश पड़ने पर दीवार की छाया इन रेखाओं पर पड़ती है, जिससे समय का ज्ञान होता है। दीवारों पर विवक्षित मिनट संख्या की सारिणी अंकित है। इन मिनटों को सम्राट यंत्र द्वारा प्रदर्शित समय में जोड़ने पर भारतीय स्टैंडर्ड समय ज्ञात किया जा सकता है। इस यंत्र द्वारा सूर्य, चंद्रमा व ग्रहों का नतकाल और क्रांति का ज्ञान भी होता है।
नाड़ीवलय यंत्र : इस यंत्र का पूरा नाम 'दक्षिणगोल-उत्तरगोल व नाड़ीवलय यंत्र" है। ग्रह दक्षिण गोलार्द्ध में है अथवा उत्तर गोलार्द्ध में यह इस यंत्र द्वारा ज्ञात हो जाता है। इस यंत्र के दक्षिण व उत्तर के सिरों के बीच पृथ्वी की धरातल के समानांतर कील है। इस कील की छाया नाड़ीवलय की घंटा-मिनट अंकन वाली घटिका पर पड़ती है, जिससे सम्राट यंत्र की भांति समय ज्ञात किया जा सकता है।
दिगंश यंत्र : यह यंत्र नाड़ीवलय के पूर्व में स्थित है। इसमें 8 फीट ऊंची दीवारों के दो घेरे बने हुए हैं। ये दीवारों समकेंद्र चक्राकार हैं तथा इनके व्यास क्रमश: 10 एवं 16 फीट है। यंत्र के केंद्र में 4 फीट व्यास वाले एवं 4 फीट ऊंचे एक चबूतरे पर इसकी ऊंचाई की एक कील गड़ी है। दीवारों पर दिग्बिन्दु खुदे हुए हैं, जिनसे ग्रहादि के दिगंश का ज्ञान होता है। मकर संक्रांति को यहां वेध कार्य का विशिष्ट महत्व है।
भित्ति यंत्र : यह यंत्र दिगंश यंत्र के नैऋत्य में है। 22 फीट ऊंची और इतनी ही लंबी एक दक्षिणोत्तर दीवार पर 20 फीट की त्रिज्या वाले दो वर्तुलपाद उत्कीर्ण हैं। साथ ही इन पर 90 अंश तक कलाओं की रेखाएं भी खींची हुई हैं। इस यंत्र द्वारा मध्यकालीन सूर्य का नतांश तथा ग्रहों की गति का ज्ञान होता है। इस यंत्र पर पवन की दिशा एवं गतिसूचक यंत्र भी लगा है।
शंकु यंत्र : इसकी स्थापना बाद में की गई थी। एक 11 फीट त्रिज्यामित गोल चबूतरे पर 4 फीट ऊंचा शंकु लगाया गया है। चबूतरे पर दिगंश के शुद्ध अंक उत्कीर्ण हैं। इस यंत्र द्वारा सूर्य एवं चंद्र के दिगंश, क्रांति एवं उन्नतांश का ज्ञान हो जाता है।
उज्जयिनी की प्रदक्षिणा-पंचक्रोशी यात्रा
अवंती क्षेत्र की पुराणोक्त परंपराओं में प्रमुख पंचक्रोशी यात्रा उज्जैन की विहंगम परिक्रमा यात्रा है, जो कि वैशाख मास (मई-जून) में संपन्न होती है। उज्जैन के 84 महादेवों में से 4 महादेव उज्जैन के क्षेत्रपाल या द्वारपाल माने जाते हैं, जबकि महाकाल उनके क्षेत्राधिपति। पंचक्रोशी यात्रा में इन सभी मंदिरों के क्रमवार दर्शन होते हैं। सिंहस्थ पर्व के दौरान यह अत्यंत भव्य होती है, जिसमें मालवा की लोक संस्कृति के दर्शन होते हैं।