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मोक्षदायिनी शिप्रा नदी का पानी साफ करने को ‘आधुनिक तकनीक’ तलाश रहा है उज्जैन

उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड (यूएससीएल) ने ऐसी तकनीक के लिए एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है, जो शिप्रा के पानी में घुलित ऑक्सीजन बढ़ाने के स...और पढ़ें

By Dheeraj GomeEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Thu, 13 Aug 2026 01:18:51 PM (IST)Updated Date: Thu, 13 Aug 2026 01:18:51 PM (IST)
मोक्षदायिनी शिप्रा नदी का पानी साफ करने को ‘आधुनिक तकनीक’ तलाश रहा है उज्जैन
उज्जैन में प्रवाहित मोक्षदायिनी शिप्रा नदी का किनारा, रामघाट। (नईदुनिया प्रतिनिधि)

HighLights

  1. पहले 3 से 5 किमी में होगा परीक्षण, सफलता मिली तो 12 से 15 किमी दायरे में होगा सुधार
  2. परिणाम संतोषजनक रहे तो नगर निगम सीमा में करीब 12 से 15 किमी शिप्रा क्षेत्र में इसे लागू किया जा सकेगा
  3. इस पहल की खास बात यह है कि यूएससीएल ने किसी एक तकनीक को तय नहीं किया है

धीरज गोमे, नईदुनिया, उज्जैन। सिंहस्थ-2028 से पहले शिप्रा को पूर्ण स्नान योग्य बनाने के लिए उज्जैन अब दुनिया में आजमाई जा चुकी आधुनिक तकनीकों की तलाश कर रहा है।

उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड (यूएससीएल) ने ऐसी तकनीक के लिए एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है, जो शिप्रा के पानी में घुलित ऑक्सीजन बढ़ाने के साथ बीओडी, सीओडी, अमोनिया, दुर्गंध और प्रदूषक तत्वों को कम कर सके। पहले 3 से 5 किलोमीटर के हिस्से में इसका पायलट परीक्षण होगा।

परिणाम संतोषजनक रहे तो नगर निगम सीमा में करीब 12 से 15 किलोमीटर शिप्रा क्षेत्र में इसे लागू किया जा सकेगा। इस पहल की खास बात यह है कि यूएससीएल ने किसी एक तकनीक को तय नहीं किया है। तकनीकी कंपनियां, मूल उपकरण निर्माता, शोध संस्थान और विशेषज्ञ संस्थाएं अपने समाधान के साथ सामने आ सकती हैं।


उद्देश्य ऐसी तकनीक चुनना है, जिसका असर सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि नदी के पानी की गुणवत्ता में मापा जा सके। इसके लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी अपेक्षित है।

पहले समझेंगे शिप्रा में प्रदूषण कहां और कितना

तकनीक लगाने से पहले नदी की मौजूदा स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा। बेसलाइन सर्वे, नदी सर्वे, जल प्रवाह, प्रदूषण भार और पानी की गुणवत्ता की जांच के साथ गणितीय मॉडलिंग और हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशन होंगे। प्रदूषण के हॉटस्पॉट भी चिह्नित किए जाएंगे। यानी पहले बीमारी और उसके स्रोत की पहचान होगी, फिर उसके उपचार की तकनीक तय होगी।

नैनोबबल से जैविक उपचार तक विकल्प

प्रस्ताव में एडवांस्ड ऑक्सीनेशन, नैनोबबल, इन-सिटू बायोरिमेडिएशन, फ्लोटिंग ट्रीटमेंट सिस्टम, एडवांस्ड ऑक्सीडेशन, इलेक्ट्रोकेमिकल ट्रीटमेंट तथा जैविक या प्राकृतिक आधारित समाधान दिए जा सकते हैं। जरूरत होने पर एक से अधिक तकनीकों को मिलाकर समाधान देने की भी छूट है।

सिंहस्थ के चरम दबाव में भी देनी होगी परीक्षा

तकनीक को कम जल प्रवाह, बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं, पीक स्नान दिवस, अधिक जैविक प्रदूषण और गर्मी, सर्दी व मानसून में भी प्रभावी रहना होगा। कम ऊर्जा खपत, कम रखरखाव, तेजी से तैनाती, डिजिटल मॉनिटरिंग और भविष्य में विस्तार की क्षमता को प्राथमिकता दी जाएगी।

पहले टेस्ट, फिर बड़े स्तर पर फैसला

पहले चरण में 3 से 5 किमी क्षेत्र में पायलट होगा। इसके परिणाम स्वतंत्र थर्ड पार्टी से सत्यापित कराए जाएंगे। सफलता मिलने पर पूरे प्रस्तावित क्षेत्र में विस्तार की दिशा में कदम बढ़ेगा। डिजाइन, पायलट, कमीशनिंग, मॉनिटरिंग, संचालन-रखरखाव और ज्ञान हस्तांतरण भी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

अभी तय नहीं कितना खर्च होगा

यह प्रक्रिया फिलहाल तकनीक तलाशने और शॉर्टलिस्ट करने के लिए है। किसी कंपनी को काम देने या निश्चित बजट तय करने की बात इसमें नहीं है। आगे पायलट के प्रदर्शन के आधार पर अलग खरीद प्रक्रिया हो सकती है। कंपनियां कैपेक्स, डीबीओ, बूट, किराये, ट्रीटमेंट-एज-ए-सर्विस, पीपीपी या परिणाम आधारित मॉडल सुझा सकती हैं।

यूएससीएल का कहना है कि आवेदक के पास पिछले पांच साल में इसी प्रकृति का कम से कम एक सफल प्रोजेक्ट होना चाहिए। तकनीक को एनजीटी और सीपीएचईईओ मानकों के अनुरूप साबित करना होगा। पिछले तीन वर्षों का औसत वार्षिक टर्नओवर कम से कम पांच करोड़ रुपये होना जरूरी है। प्री-ईओआई बैठक और साइट विजिट 19 अगस्त को होगी तथा प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त है।

शिप्रा को साफ रखने पर समानांतर काम

शिप्रा की जल शुद्धि के लिए प्रदेश सरकार प्रदूषण के स्रोतों को रोकने पर भी काम कर रही है। 1133 करोड़ रुपये की कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट परियोजना से कान्ह का प्रदूषित पानी शिप्रा में मिलने से रोकने की योजना है। नमामि गंगे मिशन के तहत 81 करोड़ रुपये से पीलियाखाल नाले पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और भैरवगढ़ नाले पर ईटीपी प्लांट लगाए जा रहे हैं।

अमृत मिशन में 912 करोड़ रुपये से भूमिगत सीवरेज पाइपलाइन बिछाई जा रही है। शिप्रा में पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने के लिए 445 करोड़ रुपये की सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी बांध परियोजना भी धरातल पर उतारी जा रही है। इन परियोजनाओं के साथ नई तकनीक का प्रयोग नदी की सफाई और जल गुणवत्ता सुधार की व्यापक योजना का हिस्सा बनेगा।

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