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उज्जैन में स्वच्छता का दिखावा: नदी किनारे साफ जगह से निकाली मिट्टी, फिर फोटो के लिए उसी को झाडू़ से समेटा

हकीकत में यह पूरी कवायद सिर्फ कैमरे के शटर तक सीमित रही। शिप्रा के कई अन्य घाट कचरे से पटे पड़े हैं, तब त्रिवेणी जैसे शांत घाट पर यह तामझाम समझ से परे ...और पढ़ें

By Dheeraj GomeEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Thu, 07 May 2026 10:13:33 AM (IST)Updated Date: Thu, 07 May 2026 10:13:33 AM (IST)
उज्जैन में स्वच्छता का दिखावा: नदी किनारे साफ जगह से निकाली मिट्टी, फिर फोटो के लिए उसी को झाडू़ से समेटा
शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट की सफाई के नाम पर नदी क्षेत्र से निकाली मिट्टी उठाते सफाई में सहयोग देने आए युवा। दूसरे चित्र में घाट पर शिप्रा नदी क्षेत्र से निकाली मिट्टी घाट पर गिरी तो उसी को झाड़ू निकालकर समेटा गया। (नईदुनिया प्रतिनिधि)

HighLights

  1. शिप्रा के त्रिवेणी घाट पर सफाई कम फोटो-वीडियोग्राफी का उत्साह ज्यादा दिखा, पर्यटक भी हैरान
  2. अमला झाडू़ लेकर उन जगहों पर जा पहुंचा जहां पहले से ही सन्नाटा और सफाई थी
  3. उज्जैन इस समय स्वच्छ सर्वेक्षण की तैयारी में है, लेकिन जमीनी हक़ीक़त कागज़ी आंकड़ों से कोसों दूर है

नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। स्वच्छ सर्वेक्षण की परीक्षा नजदीक है, तो साहबों को ‘नंबर’ की फिक्र सताने लगी है। कलेक्टर रौशन कुमार सिंह ने निर्देश क्या दिए, अमला झाड़ू लेकर उन जगहों पर जा पहुंचा जहां पहले से ही सन्नाटा और सफाई थी। बुधवार को त्रिवेणी घाट पर जो ‘सफाई अभियान’ चला, वह स्वच्छता कम और ‘फोटो शूट’ ज़्यादा नजर आया।

इंटरनेट मीडिया और सरकारी रिकार्ड के लिए जारी इन तस्वीरों को जरा गौर से देखिए। घाट पर कचरा ढूंढे नहीं मिल रहा, तो नदी किनारे से गीली मिट्टी निकाली गई, उसे सूखे घाट पर फैलाया गया और फिर ‘साहबों’ ने झाड़ू थामकर पोज दिए। सफाई ऐसे हुई कि आधे उपकरण तो मानो उपयोग भी न लाए गए हो। तमाशा देख रहे पर्यटकों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई कि ‘भैया, सफाई हो रही है या घाट गंदा किया जा रहा है।"


दावा किया गया कि जनपद उज्जैन समेत डेंडिया, राघोपिपलिया और सिंकदरी ग्राम पंचायतों के सरपंच-सचिव ट्रैक्टर और जेसीबी लेकर पहुंचे थे। मकसद था घाटों को ‘पर्यावरण अनुकूल’ बनाना। हकीकत में यह पूरी कवायद सिर्फ कैमरे के शटर तक सीमित रही। शिप्रा के कई अन्य घाट कचरे से पटे पड़े हैं, तब त्रिवेणी जैसे शांत घाट पर यह तामझाम समझ से परे है। उज्जैन इस समय स्वच्छ सर्वेक्षण की तैयारी में है, लेकिन जमीनी हक़ीक़त कागज़ी आंकड़ों से कोसों दूर है।

जनता का सवाल: नंबर चाहिए या सफाई

स्थानीय लोगों का साफ़ कहना है कि स्वच्छता महसूस करने का विषय है, अंकों की प्रतियोगिता का नहीं। अगर प्रशासन इसी तरह ‘साफ़ जगहों को साफ’ करने का ढोंग करता रहा, तो जनता की नजरों में वह कभी अव्वल नहीं आ पाएगा। ‘साहब’ को चाहिए कि वे फाइलों में दर्ज तस्वीरों के बजाय उन इलाकों का दौरा करें, जहां लोग गंदगी के बीच जीने को मजबूर हैं।

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