
धीरज गोमे, नईदुनिया, उज्जैन। एआई के दौर में इंसान अपने विवेक, संवेदना और जिम्मेदारी को कैसे बचाए रखे? उज्जैन में 17 सितंबर से शुरू होने वाली तीन दिवसीय युवा धर्म संसद में इस सवाल पर महामंथन होगा। धर्म और संस्कृति के साथ एआइ, तकनीक, शिक्षा, रोजगार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक दायित्व और मानवीय मूल्यों पर चर्चा होगी। 24 राज्यों से 1700 से ज्यादा युवा इसमें शामिल होंगे।
सेवाज्ञ संस्थानम् के छठे संस्करण में छात्र, शोधार्थी, शिक्षक, संत, शिक्षाविद और सामाजिक चिंतक एक मंच पर होंगे, लेकिन संवाद का केंद्र युवाओं के सवाल रहेंगे। धर्म को पूजा-पद्धति और आस्था तक सीमित न रखकर कर्तव्य, आचरण, नैतिकता और लोकमंगल के संदर्भ में समझने का प्रयास होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान-तकनीक के बीच संवाद पर भी विचार किया जाएगा।
एआई शिक्षा, रोजगार, कारोबार और रोजमर्रा के जीवन को बदल रहा है। सवाल उठेंगे कि तकनीक रोजगार बढ़ाएगी या पारंपरिक कामों का स्वरूप बदलेगी। शिक्षा में एआई शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध को कैसे प्रभावित करेगी? जब मशीनें जानकारी और विश्लेषण दे सकती हैं, तब इंसानी विवेक की भूमिका क्या होगी? सूचना की बाढ़ में सही-गलत की पहचान कैसे होगी? तकनीक के मानवीय और नैतिक प्रभावों पर भी चर्चा होगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के साथ परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का सवाल भी उठेगा। पर्यावरण, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सरोकारों पर युवाओं के दृष्टिकोण सामने आएंगे। उद्देश्य किसी एक निष्कर्ष तक पहुंचाना नहीं, बल्कि विचार, तर्क और संवाद का अवसर देना है।
18 सितंबर को ‘धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व’ और 19 सितंबर को ‘ऋषि एवं कृषि संस्कृति के मध्य भारत का आजीविका विचार’ विषय पर मुख्य सत्र होंगे। पहले दिन सूचना एवं विचार के संघर्ष तथा मनुष्य निर्माण में आस्था और धर्मस्थलों की भूमिका पर प्रश्नोत्तरी होगी। युवा वक्ताओं से सीधे सवाल भी कर सकेंगे।