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पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर में बने रिसॉर्ट पर अब हाई कोर्ट ने दिया छतरपुर कलेक्टर को यह निर्देश

कहा कि याचिकाकर्ता सात दिन के भीतर सभी दस्तावेजों के साथ कलेक्टर के समक्ष नया विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करें। कलेक्टर याचिकाकर्ता और वन अधिकारियों को...और पढ़ें

By SanjayKumar SharmaEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Thu, 03 Sep 2026 04:13:44 PM (IST)Updated Date: Thu, 03 Sep 2026 04:13:44 PM (IST)
पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर में बने रिसॉर्ट पर अब हाई कोर्ट ने दिया छतरपुर कलेक्टर को यह निर्देश
वन भूमि पर बना विवादित रिसॉर्ट।

HighLights

  1. विवादित रिसॉर्ट का स्वामित्व याचिकाकर्ता के पास है
  2. खसरा नंबर 1841 की करीब पांच एकड़ भूमि पर बना है
  3. वन अधिकारियों के समक्ष संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए थे

संजय कुमार शर्मा, नईदुनिया, उमरिया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राजस्व भूमि और वन भूमि से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए छतरपुर कलेक्टर को संबंधित भूमि की वास्तविक स्थिति निर्धारित करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने बी श्रीनिवास कुमार एवं अन्य की रिट याचिका का निराकरण किया।

अभ्यावेदन प्राप्त होने की तारीख से 60 दिन के भीतर पूरी करें

कहा कि यह प्रक्रिया अभ्यावेदन प्राप्त होने की तारीख से 60 दिन के भीतर पूरी करनी होगी। यह मामला पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर जोन में छतरपुर जिले के राजगढ़ गांव की खसरा नंबर 1841 की करीब पांच एकड़ भूमि पर बने विवादित रिसॉर्ट का है।


वन भूमि को बताया राजस्व भूमि

मामला वन अधिकारियों द्वारा जारी 2 मई और 5 मई 2026 के नोटिस और 31 जुलाई 2026 को पारित उस आदेश से संबंधित था, जिसमें याचिकाकर्ता को संबंधित संपत्ति से बेदखल करने का निर्देश दिया गया था। यह कार्रवाई वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 34-ए के तहत की गई थी।

उसका स्वामित्व याचिकाकर्ता के पास

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने हाई कोर्ट को बताया कि जिस भूमि पर निर्माण किया गया है, वह वन भूमि नहीं बल्कि राजस्व भूमि है और उसका स्वामित्व याचिकाकर्ता के पास है।

वन विभाग पर आरोप

याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्होंने कारण बताओ नोटिस के जवाब में वन अधिकारियों के समक्ष संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए थे, लेकिन 31 जुलाई के आदेश में उनके जवाब और दस्तावेजों पर विचार किए जाने का उल्लेख नहीं है। साथ ही उन्हें सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया। इसी आधार पर उन्होंने आदेश को चुनौती दी थी।

राज्य की तरफ से विरोध नहीं

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने भूमि को राजस्व भूमि बताते हुए 5 अक्टूबर 2025 को ई-मेल के माध्यम से छतरपुर कलेक्टर के समक्ष अभ्यावेदन दिया था, जिस पर अभी तक निर्णय नहीं हुआ था।

अनुरोध पर कोई आपत्ति नहीं की गई

हाईकोर्ट ने माना कि भूमि की स्थिति का निर्धारण राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। कलेक्टर वन अधिकारियों को भी बुलाकर संपत्ति की वास्तविक स्थिति की जांच कर सकते हैं। राज्य की ओर से याचिकाकर्ता के इस अनुरोध पर कोई आपत्ति नहीं की गई।

तब तक राहत

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कलेक्टर द्वारा अभ्यावेदन पर निर्णय लिए जाने तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई बलपूर्वक कार्रवाई नहीं की जाएगी। यदि सात दिन के भीतर नया अभ्यावेदन प्रस्तुत नहीं किया गया तो 31 जुलाई 2026 का आदेश प्रभावी हो जाएगा। कलेक्टर को भूमि की सही स्थिति निर्धारित करने के लिए कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

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