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कोयला खदान पर सियासी संग्राम, टाइगर कॉरिडोर को लेकर जीतू पटवारी ने MP सरकार से मांगा जवाब

बांधवगढ़ से अचानकमार तक फैले बाघों के प्राकृतिक गलियारे के आसपास कोयला खनन परियोजनाओं को मिल रही मंजूरियों ने अब सियासी बहस को तेज कर दिया है। इस कड़ी...और पढ़ें

By SanjayKumar SharmaEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Thu, 24 Sep 2026 01:03:50 PM (IST)Updated Date: Thu, 24 Sep 2026 01:03:50 PM (IST)
कोयला खदान पर सियासी संग्राम, टाइगर कॉरिडोर को लेकर जीतू पटवारी ने MP सरकार से मांगा जवाब
टाइगर कॉरिडोर को लेकर जीतू पटवारी ने MP सरकार से मांगा जवाब

HighLights

  1. बांधवगढ़-अचानकमार कॉरिडोर में कोयला खनन को मंजूरी
  2. इस पर जीतू पटवारी ने मोहन सरकार से पूछे तीखे सवाल
  3. पटवारी ने NTCA की चेतावनियों को दरकिनार करने का लगाया आरोप

नईदुनिया प्रतिनिधि, उमरिया। बांधवगढ़ से अचानकमार तक फैले बाघों के प्राकृतिक गलियारे के आसपास कोयला खनन परियोजनाओं को मिल रही मंजूरियों ने अब सियासी बहस को तेज कर दिया है। उमरिया जिले में प्रस्तावित वेस्ट ऑफ शहडोल (साउथ) अंडरग्राउंड कोल माइन को लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार पर सवाल उठाए हैं।

ताजा परियोजना बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कॉरिडोर से करीब 6 किलोमीटर दूर बताई गई है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने 8 और 9 सितंबर को हुई बैठकों में परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की सिफारिश की है। यह जुलाई के बाद इस कॉरिडोर के आसपास ऐसी चौथी कोयला परियोजना है, जिसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय स्वीकृति की दिशा में आगे बढ़ाया गया है।


53 मीटर से 6 किलोमीटर तक खनन परियोजनाएं

पटवारी ने अपने पोस्ट में सवाल उठाया कि बाघों की आवाजाही वाले इस महत्वपूर्ण कॉरिडोर के आसपास लगातार खनन परियोजनाओं को मंजूरी क्यों मिल रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पहले पाथोरा ईस्ट परियोजना करीब 1.5 किलोमीटर, मरवाटोला VII महज 53 मीटर और अर्जुनी वेस्ट करीब 3.9 किलोमीटर की दूरी पर बताई गई हैं। अब वेस्ट ऑफ शहडोल (साउथ) परियोजना करीब 6 किलोमीटर दूर है।

पटवारी ने इसे केवल एक खदान का मामला नहीं बताते हुए सरकार से पूछा कि जब वन्यजीवों की आवाजाही के लिए कॉरिडोर महत्वपूर्ण है, तो इसके आसपास खनन गतिविधियों को अनुमति देने का आधार क्या है।

1,400 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में परियोजना

रिपोर्टों के मुताबिक वेस्ट ऑफ (साउथ) अंडरग्राउंड कोल माइन का खनन लीज क्षेत्र 1,400 हेक्टेयर से अधिक है, जिसमें 960 हेक्टेयर से ज्यादा वनभूमि शामिल है। परियोजना भूमिगत खनन पर आधारित है और पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया में वन एवं वन्यजीव संबंधी शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं।

एनटीसीए की चेतावनी पर भी उठाए सवाल

जीतू पटवारी ने अपने एक्स पोस्ट में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए का हवाला देते हुए सरकार से पूछा कि यदि बाघ कॉरिडोर की कनेक्टिविटी को लेकर संरक्षण संबंधी चिंताएं पहले से सामने आती रही हैं, तो उसके आसपास खनन की अनुमति कैसे दी जा रही है।

एनटीसीए और भारतीय वन्यजीव संस्थान से जुड़े दस्तावेजों में बांधवगढ़-अचानकमार कॉरिडोर को महत्वपूर्ण बाघ आबादी क्षेत्रों को जोड़ने वाला मार्ग बताया गया है। ऐसे कॉरिडोर बाघों की आवाजाही और आबादी के बीच आनुवंशिक संपर्क बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।

यह भी पढ़ें- मप्र में बाघ काॅरिडोर के पास तीसरे कोल ब्लाॅक को खनन की स्वीकृति

हालांकि, परियोजनाओं की मंजूरी में संबंधित पर्यावरणीय और वन्यजीव शर्तें भी निर्धारित की जाती हैं। ऐसे में अब बहस इस बात पर है कि उमरिया में कोयला खनन और बाघों के प्राकृतिक आवागमन के बीच संतुलन कैसे कायम होगा।

पटवारी ने मुख्यमंत्री से एनटीसीए से संबंधित रिपोर्ट और सरकार की स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है। उनके सवालों के बाद अब निगाहें सरकार और संबंधित विभागों के जवाब पर हैं कि कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर जमीन पर क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।