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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 12, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

World Elephant Day: छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगली हाथियों को भाया बांधवगढ़

बांधवगढ़ प्रदेश में एकमात्र नेशनल पार्क है, जहां जंगली हाथी हैं। इसके पीछे यहां के वातावरण को मुख्य कारक माना गया है। इन दिनों बांधवगढ़ में वे सभी वन्...और पढ़ें

By Paras PandeyEdited By: Paras Pandey
Publish Date: Mon, 12 Aug 2024 05:00:00 AM (IST)Updated Date: Mon, 12 Aug 2024 05:00:00 AM (IST)
World Elephant Day: छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगली हाथियों को भाया बांधवगढ़

HighLights

  1. बांधवगढ़ के जंगल में अपने को ढाल वंशवृद्धि कर साबित की जैव विविधता
  2. अन्य वन्य प्राणी रह रहे हैं, जो यहां की जैव विविधता को सार्थक करते हैं
  3. बांधवगढ़ में साठ से ज्यादा जंगली हाथी हैं जो अलग-अलग झुंड में बंटे हुए हैं

संजय कुमार शर्मा, नईदुनिया, उमरिया। दुनिया भर में जैव विविधता (विभिन्न जीव रूपों में पाई जाने वाली विविधता) के लिए अपनी पहचान रखने वाला बांधवगढ़ नेशनल पार्क छत्तीसगढ़ और झारखंड के हाथियों के यहां आकर बसने से समृद्ध हो गया। पिछले छह सालों से 60 से ज्यादा जंगली हाथियों की यहां मौजूदगी है। जंगली हाथियों ने ही यहां आकर वास्तव में बांधवगढ़ को जैव विविधता की पहचान भी दिलाई है।

बांधवगढ़ प्रदेश में एकमात्र नेशनल पार्क है, जहां जंगली हाथी हैं। इसके पीछे यहां के वातावरण को मुख्य कारक माना गया है। इन दिनों बांधवगढ़ में वे सभी वन्य प्राणी मौजूद हैं, जिनके एक साथ होने से जैव विविधता की सार्थकता मानी जाती है। बांधवगढ़ के जंगल में बाघ, तेंदुआ, सुस्त भालू, जंगली बिल्लियां, चित्तीदार हिरण, सांभर हिरण, नीलगाय, चिंकारा, भारतीय मृग, चौसिंघा, चार सींग वाला मृग, भारतीय बाइसन गौर, लंगूर, जंगली सूअर, साही, लाल और भारतीय ग्रे नेवला, पाम सिवेट, रस्टी-स्पॉटेड बिल्ली, जंगली बिल्लियां, जंगली कुत्ता, सैंकड़ों प्रजाति के पक्षी और सांप सहित कई अन्य वन्य प्राणी रह रहे हैं, जो यहां की जैव विविधता को सार्थक करते हैं।


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जरूरी है हाथी परियोजना

अब बांधवगढ़ में हाथियों की सुरक्षा और उनके विस्तार को संरक्षित करने के लिए प्रोजेक्ट एलिफेंट शुरू किए जाने की जरूरत विशेषज्ञ जता रहे हैं। इससे हाथी संरक्षित होंगे और हाथी-मानव द्वंद्व भी समाप्त होगा। जंगली हाथी और मानव द्वंद रोकने की दिशा में लंबे समय से काम करने वाले पुष्पेन्द्रनाथ द्विवेदी का कहना है कि जिस तरह से छत्तीसगढ़ में हाथी परियोजना (प्रोजेक्ट एलीफैंट) चलायी गई, उसी तरह से मध्यप्रदेश में भी चलाया जाना चाहिए। इसी साल फरवरी माह में प्रोजेक्ट टाइगर की तरह मध्यप्रदेश में प्रोजेक्ट एलिफेंट शुरू करने की बात कही गई थी। श्योपुर के सेसई पूरा के जंगल रिसोर्ट में चीता पुनर्स्थापन की समीक्षा बैठक में यह बातें हुईं थीं। इस बैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव और अपर मुख्य सचिव वन जेएन कंसोटिया, आयुक्त दीपक सिंह, दिल्ली से आए डीजीएफ जितेंद्र कुमार मौजूद थे।

यह होगा फायदा

हाथी और मानव द्वंद्व जैसी कई बाधाओं को प्रोजेक्ट एलिफैंट के माध्यम से दूर किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ में लेमरू (हाथी) प्रोजेक्ट के तहत धरमजयगढ़ वन मंडल में हाथी कारिडोर में आने वाले कापू, बोरो और धरमजयगढ़ रेंज के जंगलों में बांस उगाए गए। ताकि हाथी अपने पसंदीदा भोजन खाने में ही व्यस्त रहे और किसानों की फसलों की ओर रुख न करें। मध्यप्रदेश में एलिफैंट प्रोजेक्ट चलाया जाए तो हाथियों से बचाव के लिए स्थानीय लोगों को शिक्षित किया जाना आसान हो जाएगा।

प्रोजेक्ट एलिफैंट के अंतर्गत केंद्रीय दल मध्य प्रदेश आएगा जो असम और केरल के राज्यों के अनुभवों के साथ यहां के हाथियों के झुंड के व्यवहारों का अध्ययन करेगा और उसके संबंध में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा। इससे हाथियों के संरक्षण पर काम किया जा सकेगा। अर्थ-व्यवस्था आधारित गतिविधियों से लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होगा और वन्य जीवों के साथ जंगल का भी संरक्षण होगा।

इस तरह आए जंगली हाथी

सन 2018 में जंगली हाथियों ने छत्तीसगढ़ से मध्यप्रदेश में आना शुरू किया। छत्तीसगढ़ के जनकपुर से मध्यप्रदेश के शहडोल और अनूपपुर के रास्ते ये हाथी यहां पहुंचे। एक वर्ष में इनकी संख्या 80 हो गई थी। आज बांधवगढ़ में साठ से ज्यादा जंगली हाथी हैं जो अलग-अलग झुंड में बंटे हुए हैं।