
अजय जैन, नईदुनिया विदिशा। उज्जैन के खड़े हनुमान की मूर्ति हटाने के दौरान उसके अडिग रहने की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। आधुनिक तकनीक से पता चला है कि मूर्ति का आधार इतनी गहराई में था कि उसे सुरक्षित निकालना मुश्किल हो गया।
विदिशा जिले के मुरादपुर धाम में भी बजरंगबली की एक ऐसी मूर्ति है, जिनके पांवों की थाह नहीं मिल पाई है। गंजबासौदा की सीमा से लगे ग्राम मुरादपुर धाम में हनुमान जी की स्वयंभू प्रतिमा विश्राम मुद्रा में विराजमान है।
स्थानीय जानकार इसे करीब सवा नौ सौ साल पुराना मानते हैं, जबकि इससे जुड़ी लोक मान्यताएं इसे द्वापर युग तक ले जाती हैं। मूर्ति का बड़ा हिस्सा जमीन में धंसा हुआ है। पुरातत्व के जानकार प्रवीण शर्मा बताते हैं कि वर्षों पहले मूर्ति की गहराई जानने के लिए खोदाई कराई गई थी, लेकिन उसका अंतिम सिरा नहीं मिला।
खोदाई वाली जगह तालाब जैसी बन गई। मंदिर के सामने मौजूद तालाब को लोग आज भी इसी घटना से जोड़ते हैं। मान्यता है कि मूर्ति पीपल के पेड़ से ज्योति पुंज के रूप में प्रकट हुई थी। पहले यह एक टीले पर थी, बाद में चबूतरा बनवा दिया गया।
मुरादपुर धाम को महाभारतकालीन मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। लोककथा के अनुसार, वनवास के अंतिम वर्ष में पांडव अज्ञातवास के लिए राजा विराट की नगरी की ओर जा रहे थे। रास्ते में भीम का सामना हनुमान जी से हुआ। उनकी पूंछ रास्ते में रखी थी, जिसे हटाने के लिए भीम ने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन पूंछ हिला तक नहीं सके।
तब उन्हें अपने बल का घमंड होने का अहसास हुआ और उन्होंने क्षमा मांगी। इसके बाद हनुमान जी ने उन्हें दर्शन देकर धर्मयुद्ध में सहायता का आशीर्वाद दिया।