राममिलन पटेल
मीता और मोहन दोनों ने प्रेम विवाह किया और विवाह के कुछ समय बाद दोनों में तलाक हो गया। रीता और रमेश दोनों का विवाह माता-पिता ने अपनी पसंद से किया लेकिन उनमें भी नहीं बनी और उनका भी तलाक हो गया। अब प्रश्न उठता है कि वर-वधू का चुनाव किस तरह किया जाए कि उनका वैवाहिक जीवन सफल व खुशियों से भरा-पूरा हो।
आधुनिक युग में जिस तेजी से तलाक की घटनाएं बढ़ रही हैं, उन्हें देखते हुए चाहे प्रेम विवाह हो अथवा माता-पिता की सहमति से वर-वधू एक-दूसरे को पसंद कर शादी करें पर इस बात की कोई ग्यारंटी नहीं कि दोनों का वैवाहिक जीवन सफल ही हो।
माता-पिता द्वारा वर-वधू को पसंद कर की गई शादी तो अब दूर की बात हो गई है। अब न तो माता-पिता के भरोसे वर-वधू का चुनाव छोड़ा जाए और न ही पूर्णत: लड़के-लड़कियों के भरोसे।
वर्तमान समय में ये दोनों ही व्यवस्थाएं अपने आप में अपूर्ण हैं। वैवाहिक जीवन की गाड़ी लड़के-लड़की द्वारा ही चलेगी, माता-पिता द्वारा नहीं। इसलिए यह जरूरी है कि मध्य मार्ग का अनुसरण करते हुए वर और वधू को शादी से पहले एक-दूसरे के विचार, पसंद, नापसंद, भावनाएं, रुचियां, शिक्षा-दीक्षा और संस्कार आदि को भली प्रकार जानने-समझने की आवश्यकता होती है।
इस समस्या को हल करने के लिए कोई बीच का रास्ता अपनाया जाए। लड़के-लड़कियों को एक-दूसरे को जानने, समझने का मौका दिया जाए, एक-दूसरे की रूचियों, स्वभाव, संस्कार आदि सभी बातों को अच्छी तरह समझ लिया जाए पर यह स्वतंत्र रूप से नहीं वरन माता-पिता की सहमति से ही होना चाहिए।
इस संबंध में एक उदाहरण ध्यान देने योग्य है-
देवदास गांधी (महात्मा गांधी के पुत्र) और राजगोपालाचारी की पुत्री, दोनों के निकट संपर्क होने के कारण प्रेम हो गया और दोनों ने शादी की इच्छा जतलाई। गांधीजी और राजगोपालाचारीजी ने इस समस्या पर विचार कर यह निर्णय दिया कि यदि आगे पांच साल तक दोनों का प्रेम स्थायी रहा तो विवाह कर देंगे। दोनों ने पांच साल तक प्रतीक्षा की और पवित्र जीवन बिताया। इस परीक्षा के बाद जब दोनों का प्रेम स्थायी रहा तो विवाह कर दिया गया।
इस तरह हम देखते हैं कि जब तक प्रेम की परीक्षा न हो जाए, वह आंतरिक और शुद्ध न हो तब तक प्रेम विवाह को टालना ही हितकारी है। भावावेश में लिया गया निर्णय कभी वास्तविक प्रेम नहीं हो सकता।
अनुभवहीन लड़के-
लड़कियां, बिना जाने-समझे आस-पड़ोस या कहीं निकट संपर्क में आने पर इस तथाकथित प्रेम के चक्कर में फंसकर प्रेम-विवाह कर लेते हैं तो आगे चलकर कुछ समय बाद उनका वैवाहिक जीवन प्राय: कष्टकारी ही बीतता है।
वर-वधू का चुनाव करते समय एक महत्वपूर्ण बात यह ध्यान में रखने योग्य है कि इसमें धन को विशेष महत्व न दिया जाए। इस दृष्टि से विवाह करना कि वर पक्ष अधिक धन-संपत्ति वाला है या वधू पक्ष से अधिक दहेज मिलेगा, यह बहुत बड़ी भूल है। अधिकांश लोग धन के लालच में पड़कर वर या वधू के न तो गुण, कर्म, स्वभाव, स्वास्थ्य या योग्यता को महत्व देते हैं और न ही उनके चरित्र, संस्कार व आदर्शों को।
परिणामस्वरूप ऐसा वैवाहिक जीवन प्राय: कष्टकारी, नारकीय अथवा असफल जैसा ही हो जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वर-वधू का चुनाव करते समय देखने वाली महत्वपूर्ण बाते ये हैं कि दोनों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य उत्तम हो। दोनों के आचार-विचार मिलते हों, जरूरी समझ और पैनी दृष्टि हो। इसके अतिरिक्त शिक्षा-दीक्षा, उत्तम संस्कारों का मेल एवं सूझबूझ वर-वधू के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।