प्रीता जैन

आज के समय में सिर्फ भागमभाग और आपाधापी...व्यक्ति की जिंदगी का बस यही पर्याय बनता जा रहा है। स्वयं की ही इच्छाओं-आकांक्षाओं के ताने-बाने में और उनको पूरा करने में व्यक्ति इस कदर फंसता जा रहा है कि सुबह से शाम तक व्यस्त दिनचर्या होने के नाते उसकी सोच का दायरा भी सिमटता जा रहा है। अपनों के लिए कुछ सोचने, कर गुजरने का तो वक्त ही नहीं मिल पाता।

फिर भी बचपन में सीखे अच्छे संस्कार-शिक्षा की वजह से व्यक्ति के दिलोदिमाग में परिवार व अपनों के लिए जो कर्तव्य-जिम्मेदारियां हैं वो याद जरूर आते रहते हैं। किंतु तमाम व्यस्तताओं के बीच ना चाहते हुए भी वह या तो उन्हें जबरदस्ती भुलाने की कोशिश करता है या फिर अपने मन के विचारों को परे ध्ाकेलते हुए उनसे अलग होने की ठान लेता है। लेकिन क्या ऐसा वास्तव में हो पाता है? अपनों से अपने व्यक्तित्व को अलग कर पाता है कोई, शायद नहीं।

माता-पिता अथवा घर के बुजुर्ग भी वही हैं और आप भी वही हो, बस दो पीढ़ियों के बीच उम्र के बढ़ते रहने पर थोड़ा-सा फेरबदल नजरिए तथा सोचने-समझने का होने लगता है। कई बार चाहते हुए भी घर के तमाम सदस्य व्यस्तताओं की वजह से आपस में खुलकर स्पष्ट शब्दों में बातचीत तक नहीं कर पाते। एक-दूसरे के प्रति अपनी भावनाएं संवेदनाएं व्यक्त नहीं कर पाते हैं बस यही स्थिति आपसी दूरियां बढ़ाकर रिश्तों में तनाव व अशांति का माहौल दर्शाने लगती है।

रिश्तों की घनिष्ठता प्रगाढ़ता पर भी इसका असर साफ झलकने लगता है, परिवार का दायरा सीमित होने लगता है। इसलिए अपनों से जुड़े रहिए क्योंकि इनके साथ ही आपकी खुशियां भी जुड़ी हुई हैं और इन्हीं से आपका जहां भी है...। दरअसल, हमारी सारी खुशियां ही अपनों से ही होती हैं, इसलिए अपनों से नाता जुड़े होने की वजह से हम खुद को भी खुश रख पाते हैं। इन छोटी-छोटी बातों को अमल में लाकर आप भी पा सकते हैं खुशियां-

  • माता-पिता कहीं आपसे अलग भी हों तो संभवत: प्रयास कर उनके पास ही रहें। उनके मनमाफिक खानपान व रहन-सहन में थोड़ा बहुत तो सामंजस्य किया ही जा सकता है कि ताकि उनके दिल को ठेस ना पहुंचे, बचपन की तरह आज भी उनका आप पर पूरा-पूरा हक होता है।

  • छोटे भाई-बहनों को भी आपके स्नेह की हमेशा जरूरत रहती है। इसलिए मौका-बेमौका उनके लिए, उनके करियर के लिए कुछ मदद अवश्य करते रहिए।

  • आज की तकनीकी दुनिया में दूर रहकर भी उनके कुछ कामों आप अपने दायरे में काफी हद तक पूरा कर सकते हैं, बस इसके लिए कोशिश जरूरी है।

  • याद करिए! बचपन में माता-पिता आपको कभी किसी बात पर कभी डांटते नहीं थे क्या? कभी कुछ कहा-सुनी भी हो जाती थी तो फिर अब थोड़ी-सी उम्र ज्यादा हो जाने पर आप क्या इतने बड़े हो जाते हैं कि माता-पिता के कहे शब्दों पर ध्यान देकर उनकी बातों का बुरा मान जाते हैं। प्रेम-स्नेह न रखकर दिल को ठेस पहुंचाने वाली बात करने लगते हैं। यदि ऐसा करते हैं तो कदापि ना करें।

  • आप कितनी भी बड़ी उम्र या पढ़-लिखकर कामयाब हो जाएं परंतु आपके बुजुर्ग तो वही रहते हैं आपके प्रति उनकी भावनाएं, विचार नहीं बदलते हैं आप तो हमेशा उनके लिए बच्चे ही बने रहते हैं। इसलिए अपने व्यवहार को सुधारने की कोशिश कीजिए।

  • यह मत भूलिए कि आपकी उन्नाति इन बुजुर्ग माता-पिता के आशीर्वाद और दुआओं का ही असर है। यह हमेशा आपके आसपास ताउम्र एक रक्षा कवच के रूप में रहती हैं। फिर इनसे भला दूरी कैसी और मनमुटाव कैसा?

  • माता-पिता बच्चों से कभी कुछ नहीं चाहते सिवाय प्रेम और स्नेह के। बचपन में भी वे आपकी भलाई ही चाहते ही, इसलिए आप कभी इतने बड़े मत बनिए कि बड़े होकर आप उन्हीं के कामों में कमी निकालने लग जाएं।

  • घर के अन्य बड़े सदस्यों को समय-समय पर याद करते रहिए। मिलने न जाएं तो फोन से ही सही, मगर उनका हालचाल जानते हुए उनसे जुड़े रहना ही अपनों से करीबी बढ़ाता है।

  • खुद के लिए एक निश्चित दायरा तय करना बिल्कुल गलत है क्योंकि आपकी निजता के साथ अपनों का साथ भी जुड़ा होता है, जिसकी वजह से आप हमेशा रिश्तों को समझ सकते हैं और परिवार में खुशियां भी बनी रह सकती हैं। कोशिश करके तो देखिए, आपको अपने हिस्से की खुशियां यूं ही मिल जाएंगी।

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