क्रिसमस का त्योहार प्रेम व मानवता का संदेश तो देता ही है साथ ही यह भी बताता है कि खुशियां बांटना ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। सांता क्लॉज द्वारा बच्चों को उपहार बांटना इसी बात का प्रतीक है। जब सांता क्लॉज की बात चलती है, तो मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है जो दानशील है, दयालु है और सबके चेहरे पर खुशियां बिखेरने के लिए खासतौर पर नॉर्थ पोल से चलकर आता है। सांता केवल एक धर्म विशेष के नहीं बल्कि पूरी मानवता के जीवंत प्रतीक है। सांता का यह रूप हर किसी में दिखाई दे सकता है, बस जरूरत है उसे पहचानने की। अपने बच्चों व परिवार से ही इन खुशियों को बांटने की कोशिश करें, फिर देखिए खुशियां खुद-ब-खुद आपको ढूंढ लेंगी।

ऐसा ही कुछ किस्सा मेरी बिटिया विधु का है, जो अब 20 साल की हो चुकी है मगर उसका सांता के प्रति अगाध स्नेह आज भी बरकरार है। किस्सागोई की मेरी आदत पुरानी है, सो मैं हमेशा से बिटिया को तमाम ऐतिहासिक, पौराणिक और अन्य धर्मों से जुड़ी कहानियां सुनाती रहती थी। जब वह पांच साल की थी, उस दौरान मैंने उसे सांता क्लॉज की कहानी सुनाई। पूरे मनोयोग से वह सुनती रही फिर पूछा-' मां, सांता किन बच्चों के पास पहुंचते हैं"?

मैंने कहा वैसे तो वे सभी बच्चों के पास पहुंचते हैं, लेकिन जो बच्चे खूब मन लगाकर पढ़ाई करते हैं, बहुत अच्छा रिजल्ट लाते हैं और खाना खाने में मां को परेशान नहीं करते उनके पास वे जरूर ही जाते हैं। यह सुनते ही बिटिया का चेहरा खिल गया। बोली- मां मेरे तो हमेशा अच्छे परसेंट आते हैं फिर मेरे पास अभी तक क्यों नहीं आए सांता? तब मैंने बात घुमाते हुए कहा उनको बुलाने के लिए रात में प्रेयर करना होती है, फिर वे जरूर आते हैं।

शैतानी तो बिटिया करती नहीं थी, बात भी मानती थी, बस खाना खाने में तंग करती थी सो उस दिन के बाद वो भी बंद कर दिया और इंतजार करने लगी 24 दिसम्बर का, जिस दिन उसे सांता से प्रेयर करनी थी। खैर 24 दिसंबर आया, बिटिया ने प्रेयर की, एकदम नए जुराबे (मोजे) आंगन में टांगे और कड़ाके की सर्दी में भी बेडरूम की सारी खिड़कियां खुली रखने की हिदायत दी। उसे चिंता थी कि सारे दरवाजे खिड़कियां बंद होंगे तो सांता आएंगे कहां से? उस रात वाकई सांता आए, बिटिया के सिरहाने गिफ्ट रख गए। मोजों में टॉफिया भर गए। बिटिया की खुशी उस दिन मुझे दुनियाभर की खुशी दे गई।

बाद के दिनों में बिटिया के ही पांच-छह साथी मुझसे पढ़ने लगे। पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है, सो मैं भी उन्हें पढ़ाने लगी। बिटिया के पास सांता के आने की खबर उन्हें भी थी। पूरे साल इन बच्चों ने सांता के नाम पर जमकर पढ़ाई की। सवाल यहां एक छोटे से गिफ्ट का नहीं था बल्कि सांता का प्रिय बनना ज्यादा था। मैंने भी उनके विश्वास की रक्षा करने का इंतजाम कर लिया था। सबके लिए छोटे-छोटे गिफ्ट लाकर पैक किए, टॉफियां खरीदीं और चौबीस दिसंबर की रात उनके पैरेंट्स के हाथों में थमा दीं, पूरे निर्देश सहित। अगले दिन इन बच्चों के चमकते चेहरों में और सांता रूपी अच्छाई पर, इन भोले बच्चों के भरोसे में मुझे मेरा खुदा मिल गया।

वैसे बिटिया के पास सांता के आने का क्रम आज भी बरकरार है जबकि बेटी अब इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रही है। पिछले साल मैंने उसकी वॉर्डन को फोन करके कहा था कि जिन कमरों की खिड़कियों पर आपको सांता के लिए मोजे टंगे मिलें, उनमें टॉफियां जरूर डालें, सांता की तरफ से बच्चियों का विश्वास न टूटे...उनका ये विश्वास बना रहना जरूरी है कि सांता खूब पढ़ने वाले बच्चों के पास जरूर पहुंचते हैं। इसका जितना भी खर्चा आएगा हम देंगे। और वाकई में बच्चियों की इन खुशियों का कोई मोल नहीं है।

- वंदना अवस्थी दुबे

Posted By: