
निर्मला भुराडि़या
दूल्हा-दुलहन स्टेज पर हैं, रिसेप्शन चल रहा है। दूल्हा और दुल्हन के दाएं-बाएं उनके-उनके पक्ष के लोग खड़े हैं। दुल्हन की बहन का परिचय अपने लोगों से दूल्हा कुछ यूं करवाता है-'ये है मेरी साली, आधी घरवाली।' निश्चित ही दुल्हन को बुरा लगता है। मगर वह पुराने जमानों की तरह इस अपमान और अश्लीलता पर सिर झुका कर या खून का घूंट पीकर नहीं रह जाती। वह देवर की ओर ईशारा करते हुए कहती है, 'ये हैं मेरे देवर, आधे पति परमेश्वर।'
जब दूल्हे ने साली को आधी घर वाली कहा था तब तो सब हंस रहे थे मगर ज्यूं ही दुल्हन ने देवर को आधा पति परमेश्वर कहा तो सबको सांप सूंघ गया। सन्नाटा पसर गया, सब के सब बगले झांकने लगे। यही तो है हमारी मानसिकता जो बात दूल्हे के मुंह से मसखरी लगी वही बात दुल्हन के मुंह से निकलते ही नाजायज बात हो गई?
काश कि हम दूल्हों के मुंह से भी ऐसी नाजायज बातों के निकलने को तवज्जो न देते आए होते तो दुल्हन को भी भाई समान देवर के लिए ऐसा न कहना पड़ता। मगर कभी-कभी ईंट का जवाब पत्थर से ही देना पड़ता है। और आजकल बहुतेरी दुल्हनें यह कर रही हैं। वे अकड में फूले दूल्हा-पक्ष को आईना दिखा रही हैं।
फेरे हो रहे थे। दूल्हे मियां शराब में टुन्न थे। इतने कि वे लड़खड़ा रहे थे। आधे फेरे होते न होते टपकने को हुए कि दुल्हन ने शादी से ही इंकार कर दिया। ठीक भी है, 'जब तक पूरे न हो फेरे सात, दुल्हन नहीं दुलहा की।' इसी तरह एक शादी में दूल्हे के पिए हुए दोस्त दुल्हन पक्ष की महिलाओं के साथ बेहूदा मजाक कर रहे थे। जब उनकी मजाक अश्लीलता की हद तक पहुंच गई फिर भी दूल्हे ने हस्तक्षेप नहीं किया, अपने दोस्तों को मना नहीं किया तो इस दुल्हन ने भी बीच फेरे के डोर काट दी।
उल्लेखनीय बात यह है कि यह गुना जिले के बिजानीपुरा गांव की आदिवासी लड़की है। इसी तरह एक दूल्हे ने अपनी शिक्षा के बारे में झूठ बोला था। शादी के समय एक मौके पर साध्ाारण से गणित में वह ऐसा गड़बड़ाया कि उसकी पोल खुल गई और दुल्हन ने शादी से इंकार कर दिया। फेरे पर बैठकर दहेज में वस्तुओं की मांग करने वाले दूल्हों को दुल्हन द्वारा लौटाने की घटनाए भी पिछले कुछ सालों में हुई हैं।
सवाल यह है कि दूल्हे शादी के मंडप में बैठकर ही दहेज की मांग क्यों करते आए हैं? वजह यह कि अब तक लड़कियों के घरवाले इस बात से डरते आए हैं कि बारात लौट गई तो लड़की 'लग्नभ्रष्ट' हो जाएगी, फिर उससे शादी कौन करेगा? दूल्हे, दूल्हे के घरवालों और बारातियों का अहंकार तो हमारे समाज में ऐसा रहा है कि किसी बाराती की कोई मांग पूरी न हो या तथाकथित रूप से अपमान हो जाए तो दुल्हन को रोता छोड़ बारातें लौट जाती रही हैं।
दूल्हे के पांवों में दुल्हन के पिता द्वारा अपनी टोपी या पगड़ी रख देना, कर्ज लेकर वरपक्ष की मनचाही सामग्री जुटाना, दूल्हे के घर वालों की मिन्नातें करना कि कहीं बारात न लौट जाए, यह लड़की के बाप की नियति रही है। क्योंकि पहले लग्नभ्रष्ट हो जाने पर दुल्हन की कहीं शादी नहीं होती थी और दूल्हे को तो फिर कोई रिश्ता मिल जाता था। समाज की मानसिकता ऐसी थी कि कलंक सिर्फ दुल्हन को ही लगता था। बगैर पढ़ी-लिखी, परनिर्भर लड़कियों के हाथ में था भी क्या? लेकिन अब जमाने ने करवट ली है।
लड़कियां अब करारा जवाब देती हैं तो समाज में भी ऐसे बहुत से लोग निकल आते हैं जो लड़कियों को उद्दण्ड या लाजरहित बताने के बजाए उनके साहस की प्रशंसा करते हैं। मीडिया में भी ऐसे साहस की चर्चा होती है। अधिक से अधिक लड़कियां भी अब अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।
ग्रामीण इलाकों तक ये जाग्रति पहुंची है कि जिस ससुराल में टॉयलेट न हो वहां जाने से दुल्हन इंकार कर दे। और एक दुल्हन इंकार करे तो उसकी खबर प्रेरणा बनकर अन्य युवतियों तक पहुंचे और एक सिलसिला बन जाए। ऐसा सकारात्मक साहस अधिक से अधिक युवतियों में होना चाहिए कि वे गलत बात बर्दाश्त न करें और समाज को उनका साथ देना चाहिए।