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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 17, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

पत्थरों से पानी निकालते रितेश

डॉ. आर्य पत्थरों के प्रेम में गिरफ्त हैं, और पत्थर भी उनके इशारों पर पानी उगलते हैं।

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Publish Date: Sat, 17 Oct 2015 07:25:44 PM (IST)Updated Date: Sun, 18 Oct 2015 07:00:56 AM (IST)
पत्थरों से पानी निकालते रितेश

पार्थो बर्मन

डॉ. आर्य पत्थरों के प्रेम में गिरफ्त हैं, और पत्थर भी उनके इशारों पर पानी उगलते हैं। आइस हॉकी रिंक से लेकर लद्दाख के गोल्फ के हरे मैदानों तक, ध्यान के लिए प्रसिद्ध महाबोधि संस्थान से लेकर सीमा क्षेत्र में बसे सेना के बेस तक, हजारों घरों से लकर कृषि भूमि तक आर्य के पानी से आबदार हैं।

करीब 47 साल के जियो-साइंटिस्ट डॉ. रितेश आर्य ने अपने प्रयासों से पत्थरों को पानी उगलने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी ऐसी जगहों से पानी निकालने के लिए छोड़ी है, जहां से पहले कभी पानी निकाला न जा सका हो।


सियाचिन और कारगिल पर स्थित खरदुंग-ला पर जहां सैनिक शहादत और जीत दोनों से ही एक ही तरह से मिलते हैं, वहां इंसान की सबसे मूलभूत जरूरत पानी को ढूंढने का काम किया है डॉ. आर्य ने। यहां पानी सबसे बहुमूल्य वस्तु है। डॉ. आर्य कहते हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा। कई विशेषज्ञ यह भविष्यवाणी कर चुके हैं। पीने का पानी दुनिया भर से लगातार कम होता जा रहा है और पानी का उपभोग और आवश्यकता बढ़ती जा रही है।

पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता एक बड़ा सवाल है। लेह-लद्दाख के हिस्से में अभी तक पीने योग्य पानी की उपलब्धता बहुत ही कम है। सिंधु नदी में गर्मी में गाद जम जाती है, वहीं सर्दियों में इसका पानी जम जाता है। दोनों ही स्थितियों में पीने का पानी ऐतिहासिक स्तर पर एक समस्या बन जाता है।

1996 से पहले लेह, लद्दाख, एगलिंग चौशुल, कारगिल और सियाचिन क्षेत्र के नागरिक और यहां पदस्थ सैनिक अपनी प्यास बुझाने के लिए बर्फ पिघलाया करते थे। या फिर उन्हें 4 से 6 किमी दूर से पीने का पानी लाना पड़ता था। ये भी न करें तो उन्हें अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी के टैंकर का इंतजार करना होता था। फिर वो हुआ जिसे हम चमत्कार भी कह सकते हैं, लेकिन ये विज्ञान और ज्ञान के संयोजन से किया गया चमत्कार था। ये चमत्कार कर दिखाया छोटे कद के डॉक्टर रितेश आर्य ने। उन्होंने इतनी ऊंचाई पर स्थित रेगिस्तान में पारंपरिक तकनीक से कुएं खोदे और वहां पानी मिला।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि यहां पानी के इतिहास को दो भागों में बांटा जा सकता है - एक डॉ. आर्य से पहले दूसरा डॉ. आर्य के बाद। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड का काम लद्दाख में ग्राउंड वाटर के उपयोग का रहा है। ये कभी भी सिंधु नदी के क्षेत्र से बाहर नहीं गया। रिमोट सेंसिंग कभी भी यहां सफल नहीं रहा है और यह माना जाता है कि पथरीले पहाड़ी रेगिस्तान में ग्राउंड वाटर नहीं पाया जाता है। किंतु डॉ. आर्य और उनकी ड्रीलिंग कंपनी ने इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ा दी है।

डॉ. आर्य ने इस कंपनी की शुरुआत 1996 में 'पानी नहीं तो पैसा नहीं', के वादे के साथ शुरू की थी। इस तरह की स्पष्ट ग्यारंटी स्पष्ट विश्वास से ही आती है और डॉ. आर्य ने इस तरह की प्रतिष्ठा यहां इसलिए अर्जित की है क्योंकि उन्हें मिट्टी के नीचे की प्राकृतिक संरचना और गहराई का बेहतर ज्ञान हासिल किया। कसौली के रहने वाले रितेश जेनेटिक इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन किसी जिंदा प्राणी के डायसेक्शन की कल्पना ही उनके लिए डराने वाली थी और इसलिए उन्होंने चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से जियोलॉजी की पढ़ाई की।

महान जियोलॉजिस्ट मेडलीकॉट से बहुत ही ज्यादा प्रभावित रितेश ने उनकी साइट पर 1987 से 1990 के बीच के समय की रिसर्च की। मेडलीकॉट के बाद 1864 से कसौली फॉर्मेशन पर किसी का भी ध्यान नहीं गया था, लेकिन रितेश ने वहां निजी तौर पर भारत का सबसे बड़ा फॉसिल कलेक्शन तैयार किया। अपने एमएससी के बाद रितेश ने हिमाचल प्रदेश के सिंचाई और लोक स्वास्थ्य विभाग को हाइड्रो-जियोलॉजिस्ट के तौर पर ज्वाइन किया।

हमीरपुर (भोटा) में रितेश ने ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज की खोज और विकास का काम शुरू किया। उन्होंने भोटा बस स्टैंड के पास ही ड्रिलिंग करने का निर्णय लिया। इस बीच उन्होंने वहां से करीब 1 हजार मीटर दूर एक 4 सौ साल पुराना किला ढूंढ निकाला, जिस पर भारतीय सेना का कब्जा था। वहां जाकर रितेश ने खोज की तो वहां उन्हें दो पुराने कुएं मिले जिनमें तब भी पानी था। लेकिन वहां 300 फीट बोरिंग करने के बाद भी उन्हें वहां पानी के कोई निशान नहीं मिले। उन्होंने किले का मुआयना किया और ये देखकर हैरान रह गए कि वहां दो पुराने कुएं अब भी पानी दे रहे हैं। उत्सुकता उन्हें पानी निकालने की परंपरागत तकनीक की जानकारी की तरफ ले गई। उन्होंने उपकरण की विधा को त्यागकर सहज विज्ञान की तरफ रुख किया और उनके काम करने की दिशा बदल गई। लेकिन भारतीय और विदेशी सभी संशयवादियों ने इसे नापसंद कर दिया।

वे बताते हैं कि उन्होंने एक प्रेक्टिकल मॉडल तैयार किया जिसमें उन्होंने हिमालय और ऑल्प्स पर पानी का मानचित्र खींचा। यह मानचित्र तीन तत्वों पर निर्भर था 1. पत्थर की प्रकृति 2. जियोमॉर्फोलॉजी और 3. रिचार्ज। उन्होंने बताया कि यह पुराना, किंतु विश्वसनीय विज्ञान था। उनके सिद्धांतों को राजनीतिज्ञों ने नकार दिया। और लगभग छ महीने तक वे कुछ भी नहीं कर पाएं।

हर नया ट्रांसफर ऑर्डर उनके समक्ष अपने सिद्धांत के परीक्षण के लिए नया अवसर ला रहा था। 1996 तक आते-आते उन्होंने हिमाचल प्रदेश के सारे 6 जोन समझ लिए थे। इसी दौरान वे चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर एडवांस स्टडी इन जियोलॉजी से क्लायमेट, टेक्टोनिक्स, इवॉल्यूशन एंड एनवॉर्यनमेंट ऑफ हिमालय पर पीएच.डी. पर भी काम करते रहे। और इसी साल उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

1997 और 1999 के बीच एक ब्रिटिश एनजीओ ने लेह के आसपास एक ड्रिंकिंग वॉटर प्रोजेक्ट की फंडिंग की। दुनिया की सबसे ऊंची वैध्ाशाला को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स चला रही थी और उन्होंने डॉ. रितेश आर्य से संपर्क किया।

उन्हें वहां पानी मिला। 2002 तक वहां लगभग 25 बोर वेल खोदे गए। अब इस बर्फीले रेगिस्तानी पहाड़ों की पूरी आबादी को हर वक्त पानी उपलब्ध्ा होता है। इसके बाद का सारा परिदृश्य की बदल गया। 1999 से 2000 तक उन्होंने लेह और थोइस के आर्मी और एयर बेस को पीने का पानी उपलब्ध्ा करवाया। डॉ. आर्य ने 2002 में तीन कुएं खोदे। तब से लेह एयरपोर्ट पर पर्याप्त पानी उपलब्ध्ा हो रहा है। आश्चर्य तो यह है कि आर्य ड्रिलर्स के प्रयासों से कारगिल के बैटलग्राउंड में जहां कि आमतौर पर श्योक नदी जमी ही रहती है, वह जगह अब खेती की जमीन में तब्दील हो गई है।

डॉ. आर्य कहते हैं कि पानी के मामले में उनका ज्ञान एकदम स्पष्ट है। वे जानते हैं कि सबसे ऊंचे लेह क्षेत्र में एक्जेक्टली कहां पानी के लिए खुदाई करना चाहिए। उनका कहना है कि इसमें बहुत स्पेशल कुछ नहीं है, वे बस प्राचीन स्वदेशी हाइड्रो-जियोलॉजी तकनीक का उपयोग करते हैं।