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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 28, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

इंटरनेट पर मिली आजादी के मायने

धारा 66-ए के खात्मे से इंटरनेट यूजर्स को आजादी मिली है लेकिन इससे तार्किक बात कहने की उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती है।

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Publish Date: Sat, 28 Mar 2015 04:09:29 PM (IST)Updated Date: Mon, 30 Mar 2015 09:00:29 PM (IST)
इंटरनेट पर मिली आजादी के मायने

पवन दुग्‍गल, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट और सायबर कानून विशेषज्ञ

जब सुप्रीम कोर्ट के आईटी एक्ट की धारा 66- ए को खत्म करने का आदेश आया शबाना आजमी ने ट्वीट किया कि 'धारा 66- ए को हटाकर सुप्रीम कोर्ट ने फिर से आश्वस्त किया है कि वह राज्य की स्वेच्छाचारी शक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत स्वंतत्रता की रक्षा करता रहेगा। लेकिन इसके साथ ही समझबूझ से खुद पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है।'

आईटी एक्ट की धारा 66-ए पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह साफ हो गया है कि भारत में इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी किसी अस्पष्ट कानून द्वारा बाधित नहीं की जा सकेगी। सोशल मीडिया पर उत्साह में भरकर पोस्ट लिखने वाली पीढ़ी के लिए यह एक बड़े डर के खत्म होने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा, 'आईटी एक्ट की धारा 66-ए संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के अंतर्गत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करती है।'


इस ताजा निर्णय को इंटरनेट का उपयोग करने वाली पीढ़ी के लिए आजादी की संज्ञा भी दी जा रही है, लेकिन इसे आजादी से ज्यादा अधिकार की जीत मानना चाहिए और हर अधिकार अपने साथ जिम्मेदारी भी लाता है।

इस निर्णय के बाद इंटरनेट पर अपने संतुलित विचार व्यक्त करते हुए डरने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है क्योंकि अब किसी नेता का अपमान करने के नाम पर या अतार्किक बात का विरोध करने पर कोई गिरफ्तार नहीं करेगा, जैसा कि अब तक हो रहा था। लेकिन इसके साथ ही अब इंटरनेट पर कोई भी ऐसी सामग्री जो धमकी भरी और अपमानजनक हो उसे प्रसारित करना भी आपराधिक मामले की परिधि से बाहर हो गया है।

एकतरफा कानून का खामियाजा

जोश और उत्साह से भरी इस पीढ़ी को मैं सलाह दूंगा कि अभी भी इंटरनेट पर कोई भी सामग्री शेयर करते हुए पूरी तरह सावधानी बरतें। आईटी एक्ट से धारा 66-ए हटाने के बावजूद आईटी एक्ट 2000 में जो अन्य प्रावधान थे वे यथावत हैं। सुनने में यही लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद इंटरनेट पर हर किसी को पूरी आजादी है लेकिन इंटरनेट पर पूरी आजादी जैसा कुछ नहीं है।

आईटी एक्ट 2000 के प्रावधान हैं और आईपीसी की अन्य धाराएं भी इंटरनेट का उपयोग करने वालों पर लागू रहेंगी। लेकिन 66-ए के हटने से सायबर दुनिया में मासूम लोगों को नुकसान भी झेलना पड़ सकता है। अब सायबर बुलीइंग की घटनाएं बढ़ सकती हैं क्योंकि 66-ए की सख्ती को हटा लिया गया है। धारा 66-ए के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही थी कि विशेषज्ञों या प्रभावित होने वालों के पक्ष को सुने बिना ही इसे बनाया गया था।

इसे लागू करते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 का ध्यान भी नहीं रखा गया था जो नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। आईटी कानून में ऐसी बहुत सी कमियां थीं जो इसे कमजोर बनाती हैं और धारा 66-ए इन्हीं में से एक थी। इसकी खामियां ही इस धारा के खात्मे की वजह बनी। बहरहाल इसके खत्म होने से उन जिनके खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 66-ए के अंतर्गत मुकदमे चल रहे थे वे स्वत: समाप्त हो जाएंगे। उन्हें बड़ी राहत मिलेगी।

राहत के साथ आफत भी जहां तक सायबर स्पेस में पीड़ित होने वाले लोगों का सवाल है तो उन्हें 66-ए के तहत जो बचाव मिलता था अब वे इससे वंचित हो जाएंगे।

सायबर स्टाकिंग, सायबर न्यूसेंस, सायबर हैरसमेंट और सायबर डिफेमेशन हमारे देश में बड़े पैमाने पर होते हैं। अब मोबाइल पर तरह-तरह के एप्लीकेशन के कारण सायबर अपराधियों को फलने-फूलने का मौका मिल गया है। वे तरह-तरह के जाल मासूम लोगों को फांसने के लिए बुनते रहते हैं। इस तरह के परिदृश्य में 66-ए के तहत लोगों को कुछ सुरक्षा मिली हुई थी लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद वह नहीं रही। सायबर अपराधियों ने भी इस बात से राहत महसूस की होगी कि उनके सिर पर धारा 66-ए की जो तलवार लटकती रहती थी वह अब नहीं है।

स्पैम मेल को रोकने के लिए भी धारा 66-ए के अंतर्गत नियम थे लेकिन इसके हटने से वे प्रावधान भी जाते रहे। स्पैम मेल हमारी बड़ी समस्या है क्योंकि भारत में बड़े पैमाने पर स्पैम मेल भेजे जाते हैं लेकिन भारत में स्पैम मेल को लेकर कोई कानून नहीं है। इस धारा के हटने के बाद सायबर बुलीइंग की घटनाएं भी बढ़ना तयशुदा हैं।

अभी तक लोगों को यही लग रहा है कि अब उन्हें पूरी आजादी मिल गई है और इससे कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन हर हाल में सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने सरकार को इस बात के लिए आगाह किया है कि वह सायबर कानून पर नए सिरे से विचार करे।

अभी जो कानून है वह 15 वर्ष पहले बना था और उसमें बस 2008 में ही कुछ बदलाव हुए थे। 2015 की जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है और उसे पुराने कानून से नहीं चलाया जा सकता है।

कोई सायबर कानून सौ प्रतिशत उपयुक्त नहीं हो सकता। ऐसे कानून की लगातार समीक्षा जरूरी है ताकि वह समाज और यूजर्स की अपेक्षाओं पर खरा उतर सके। भारतीय सायबर कानून को इस लिहाज से तैयार करना होगा।

निर्णय का है यह आशय

  • इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जाएगी और यहां संवैधानिक तरीके से अनुच्छेद 19 (2) के अंतर्गत ही कोई भी पाबंदी लगाई जा सकती है।

  • सरकार का कोई भी अस्पष्ट और एकपक्षीय कानूनी उपबंध अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित नहीं कर सकता है।

  • कानूनी प्रावधान में किसी भी तरह की अस्पष्टता से अगर उसका दुरुपयोग होने लगे तो उसका समर्थन किसी हाल में नहीं किया जा सकता है।

  • जनता को जानकारी पाने का पूरा अधिकार है और इसे किसी कानून के तहत दबाया नहीं जा सकता।
  • आईटी एक्ट से धारा 66 हटने का मतलब है कि कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियों के लिए सायबर क्राइम के विभिन्न प्रकरणों से निपटने में मुश्किलें पेश आएंगी।

  • यह निर्णय सरकार के लिए एक चेतावनी है कि उसे ऐसा कोई कानून नहीं बनाना चाहिए जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध जाता हो।

  • अब सारी जिम्मेदारी सरकार पर आ जाती है कि वह भारतीय सायबर कानून को टेक्नोलॉजी के मौजूदा समय, परिस्थिति और बदलाव के अनुसार तैयार करे।

  • कानून की धारा 66 -ए के हटने से उन लोगों को राहत मिलेगी जिनके खिलाफ इस धारा के अंतर्गत प्रकरण चल रहा था।

आईटी कानून के अहम पड़ाव

  • भारत में इंटरनेट का व्यावसायिक उपयोग 15 अगस्त 1995 में शुरु हुआ था।

  • अमेरिका के यूटा राज्य ने दुनिया में सबसे पहले सायबर कानून बनाया था।

  • भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए संसद को यह अधिकार दिया कि वह यूनाइटेड नेशंस के कानून के मॉडल पर अपने लिए एक कानून बनाए।

  • 17 मई 2000 को संसद में इतिहास बना जबकि भारत का पहला सायबर कानून पास हुआ इसे नाम मिला था इन्फर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और संक्षिप्त में कहें तो आईटी एक्ट 2000।

  • आईटी एक्ट के तहत किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जिसके कम्प्यूटर सिस्टम या नेटवर्क से अवैधानिक काम हुआ हो आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना तय हुआ।

  • लेकिन यह बहुत सशक्त कानून नहीं था बल्कि इसमें कई बड़ी खामियां थीं। डोमेन नेम्स, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और पेटेंट जैसे मुद्दों का जिक्र भी इस एक्ट में नहीं था।

  • पुलिस के डीएसपी रैंक के अधिकारी को सायबर क्राइम के मामलों में तफ्तीश के लिए गिरफ्तारी जैसे अधिकार दे दिए। बाद में ये अधिकार स्थानीय पुलिस अफसर को मिल गए।

  • सायबर कानून में उन मापदंडों का या प्रक्रिया का कोई उल्लेख नहीं था कि यह कानून लागू कैसे होगा। इस बीच सायबर एक्ट में सुधार की भी कोशिशें हुईं। हमने मुंबई हमला झेला और पाया कि सायबर क्राइम कितनी बड़ी चुनौती है।

  • संसद ताबड़तोड़ हरकत में आई और उन्होंने संशोधित आईटी एक्ट 2008 लागू कर किया।

  • धारा 66-ए को 2009 में हुए संशोधन के बाद ही शामिल किया गया था। लेकिन मुंबई में पल्घर पुलिस द्वारा दो लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद जब बवाल मचा तो सरकार ने राज्यों को दिशानिर्देश जारी किए कि वे 66-ए के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को तब तक गिरफ्तार न करे जब तक कि पुलिस अधीक्षक उस बारे में लिखित आदेश न दे दे। और अब धारा ही रद्द कर दी गई।

धारा 66- ए खत्म लेकिन ये धाराएं हैं

धारा 500: मानहानि के मामले में

जब कोई व्यक्ति किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाए, उसके चरित्र का हनन करे या जाति और व्यवसाय के आधार पर उसकी निंदा करे या शारीरिक रूप से उसे अपशब्द कहे।

सजा- अधिकतम दो वर्ष व जुर्माना भी संभव।

धारा 505 : भय फैलाना

कोई भी ऐसी सामग्री प्रकाशित, प्रसारित करना या ऐसा बयान देना जो जनता को भड़काए या उनमें डर पैदा करे। किसी भी समुदाय या वर्ग को दूसरे समुदाय या वर्ग के प्रति किसी घटना को अंजाम देने के लिए उकसाना।

सजा- अधिकतम 3 वर्ष की जेल और जुर्माना।

धारा 506 : आपराधिक दुष्प्रेरण

किसी व्यक्ति को जान से मारने की या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना।

सजा- अधिकतम 2 वर्ष की जेल और जुर्माना। इसमें किसी महिला के चरित्र हनन के प्रकरण में 7 साल की सजा और जुर्माना।

धारा 509: शील भंग

किसी महिला के शील भंग का प्रयास या उसके व्यक्तिगत जीवन में दखल।

सजा- अधिकतम 1 वर्ष की सजा, जुर्माना।

धारा 124-ए : बलवा

ऐसी कोई भी पोस्ट करना या ब्लॉग लिखना जो भारत सरकार के विरुद्ध लोगों को उकसाती हो या उन्हें भड़काती हो।

सजा- आजीवन कारावास।

धारा 295-ए : सांप्रदायिक विद्वेष

लगातार ऐसे बयान देना जो किसी धर्म की मान्यताओं और विश्वासों को चोट पहुंचाते हैं।

सजा- 2 वर्ष की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। ऐसे प्रकरणों में धारा 298 भी लागू होती है।