
जब से मेरे कस्बे में कम्प्यूटर आया, आते ही मैंने लपक लिया। बचपन में आलू को आधा काटकर चाकू से उल्टा राम लिखकर छापा बनाया करता था। पुराने इंक पेड से कागज और कपड़े पर छापा लगाता तो बड़ा खुश होता। तभी से यह विचार था कि छापखाना खोलूंगा किंतु छापखाने की विशाल मशीन, अक्षरों, मात्राओं को संयोजित करना मेरे बस की चीज नहीं थी। लेकिन फिर आगे चलकर शहर से कम्प्यूटर का कोर्स किया तभी से मैं कम्प्यूटर का और कम्प्यूटर मेरा हो गया था और मेरा भी ऐसा हुआ कि मेरे रोजगार में तब्दील हो गया।
आलू का छापा बनाकर छापने के सपने को कम्प्यूटर ने साकार कर दिया। न भारी-भरकम मशीनें, न अक्षर-मात्राओं का संयोजन। कांच के बंद ऑफिस में बैठकर प्रिंटिंग वर्क की शुरुआत की। विवाह के निमंत्रण-पत्र, ग्रीटिंग कार्ड, शोक पत्रिका, पेम्फलेट, प्रमाण पत्र, अंकसूचियां, प्रश्नपत्र अधिकतर काम तो रेडीमेड तैयार होते हैं केवल तिथि, मिती और दर्शनाभिलाषी, स्वागतातुर और शोकाकुल इत्यादि के नाम तो बदलने हैं, बाकी तो भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण प्रियवर... या फिर मेरी बुआ की शादी में जलूल जलूल आना, बाल मनुहार तो रेडीमेड है बस बदलना तो यह है कि मौसा के पीले चावल कहां से आएंगे या फिर पान की छोटी-मोटी गुमटी को प्रतिष्ठान में बदलकर ग्राहक को खुश करना।
मैं अपनी सारी कल्पनाशीलता विजिटिंग कार्ड बनाने में लगाता हूं अपने प्रिंटिंग वर्क में मैंने स्वयं के एड्रेस कार्ड बनाकर गांव के हर मिलने-जुलने वालों को दिए तथा व्यस्तता के इस युग में इनका महत्व भी समझाया। धीरे-धीरे मेरे इस प्रकाशन संस्थान में मेरे व मेरे कस्बे के आसपास के लोग विजिटिंग कार्ड मुझसे बनवाने लगे।
इनमें दुकानदार, प्रतिष्ठान अधिकारी, लेखक वर्ग के साथ-साथ हलवाई, रसोई बनाने वाले, टेंट वाले, मैकेनिक, बैंड मास्टर, ढोली, ज्योतिषी तो थे ही किन्नरों तक के विजिटिंग कार्ड बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। विजिटिंग कार्ड बनाने-बनाते न केवल उनके एड्रेस का पता चला बल्कि उनके स्टेटस का भी। थोड़े बहुत लोगों को नजदीक से देखने-परखने का मौका मिला।
मेरा एक क्लाइंट है किशन, एक ऑलराउंडर मैकेनिक, बिजली फिटिंग, नल फिटिंग, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण रिपेयर और भी न जाने क्या-क्या। एक जूनी-पुरानी सायकिल पर पतरे का स्वनिर्मित टूल बॉक्स जिस पर रंगरोगन करके अधकचरे पेंट्स से अपने रिपेयरिंग काम का उल्लेख अशुद्ध लिपि में लिख रखा था। किशन घर पहुंच सेवा देता था लेकिन दूसरे मैकेनिकों से अलग था।
मैकेनिक के सस्ते हथकण्डे उसके पास नहीं थे। जब मेरे पास आया तो उसने विजिटिंग कार्ड में उसके द्वारा किए गए कार्यों का ब्यौरा दिया। मैंने उसे समझा बुझाकर ब्यौरे को छोटा कराया। किशन के काम से कस्बे में कौन वाकिफ नहीं। सभी वाकिफ हैं बस उसका नाम और मोबाइल नंबर ही काफी है, न किसी डिग्री की जरूरत है न पहचान की। बस उसका मोबाइल नंबर ही उसके कार्ड का महत्वपूर्ण बिंदु है।
किशन का काम पेटेंट और साख भरा था, पर पैसे जेब से निकलवाने का हुनर उसे याद नहीं था इस कारण वह इस दुनिया की दौड़ में पिछड़ गया। बस जूनी-पुरानी सायकिल से जुनी-पुरानी मोपेड जो उसके मैकेनिज्म से चल रही थी, वहां तक ही पहुंचा। जितनी भी बार उसने मुझसे कार्ड बनवाया, बराबर पैसा दिया। एक-दो बार घर के कुछ उपकरणों की रिपेयरिंग भी की पर बड़ी मुश्किल से उसे पैसा दिया, वह पैसा नहीं लेना चाहता था। मेहनती और ईमानदार लोग मेरे दिल में बसते हैं, मैं हमेशा किशन का सम्मान करता हूं और वो मुझ पर श्रद्धा रखता है। सम्मान का रिश्ता है हमारे बीच।
आइए, मैं अपने एक दूसरे क्लाइन्ट से मिलवाता हूं। ये मेरे कस्बे के नजदीक के गांव के हैं। स्कूली शिक्षा तो जैसे-तैसे पूरी की पर विरासत में मिले वर्ण से इनकी गाड़ी बिना किसी श्रम के चल रही थी। जब ये पहली बार आए थे तो लट्ठे का झरझरा कुर्ता-पायजामा पहनकर आए थे और गले में लाल अंगोछा! कुरते की जेब में तीन तह में फोल्ड किए पंचांग की मूल पूंजी लिए इस कस्बे में आए। मेरी दुकान पर आए और विजिटिंग कार्ड बनाने की बात कही। मैंने अपने बनाए कार्डों की नमूना प्रति सामने रखी तथा कार्ड में लिखवाने हेतु आवश्यक विवरण चाहा।
नाम तो उनका गोविंद पर उन्होंने लिखा ज्योतिषाचार्य गोविंद भूत, भविष्य, वर्तमान, जन्मकुंडली, ग्रह बाधा शांति, प्रेतबाधा, कालसर्प, पितृदोष न जाने क्या-क्या। विवरण का पिटारा जैसे विजिटिंग कार्ड की जगह पेम्फलेट छपवा रहे हों। बड़ी मुश्किल से उनके विवरण को संक्षिप्त किया। विजिटिंग कार्ड बनाना भी गागर में सागर भरने जैसा है पर इस सागर को गागर में भरने में मुझे पसीना आ रहा था। बैकग्राउंड में आयत में आड़ी-तिरछी लाइनों को काटकर बने त्रिभुज में ग्रह, हाथ और हस्त-रेखाएं। उनका बोल्ड अक्षरों में नाम ज्योतिष के कल्पित महाविद्यालयों की डिग्रियां, बड़ी ही कल्पनाशीलता के प्रयोग से मैंने उनका विजिटिंग कार्ड बनाया।
विजिटिंग कार्ड बनने के बाद मैं उनका इंतजार करने लगा। विजिटिंग कार्ड के बाद उपभोक्ता की संतुष्टि का इंतजार मुझे रहता है। वे आए विजिटिंग कार्ड देखा भावविहीन होकर क्योंकि भावपूर्ण होने पर ज्यादा पैसे चुकाना पड़ सकते हैं। विजिटिंग कार्ड के बंडल को अलग रख वे मुझे मेरी दुकान का वास्तुशास्त्र समझाने लगे। मेरी चेयर किस दिशा में हो, कम्प्यूटर किस दिशा में, प्रवेश द्वार पर क्या टोटका करना चाहिए।
ऑफिस में कौन-सा यंत्र लगाना चाहिए। साथ ही उनकी सलाह से जिन-जिन लोगों को लाभ हुआ उसकी फेहरिस्त गिनाने लगे। मैं उनके मंतव्य को समझ चुका था कुल मिलाकर वे इन कार्डों का बिल अदा नहीं करना चाहते थे। उन्होंने सोचा कि शायद वास्तु शास्त्र का जादू चल जाए? मैंने उनकी बात अनसुनी कर बिल थमा दिया। बड़े बेमन से उन्होंने कार्ड के पैसे दिए।
साल-छह महीने के बाद विजिटिंग कार्ड के ग्राहक नए कार्ड बनवाने के लिए आ जाते हैं। इस बहाने जान पहचान रहती ही है। किशन के कार्ड में कोई परिवर्तन नहीं आया, वही पता, वही मोबाइल नंबर और उसकी वही दशा, कोई परिवर्तन नहीं। मेहनत और मजूरी से तो सिर्फ गुजारा हो सकता है।
मेरे दूसरे क्लाइन्ट श्री गोविंद ज्योतिषी जो गोविंदाचार्य बन गए, ज्योतिष की ट्यूरिंग टॉकिज के स्थान पर ज्योतिष कार्यालय तक आ गए। घर और ऑफिस अलग-अलग फोन नंबर, इस बार उनका रंग-ढंग और वाहन सब कुछ बदल गया। महंगी-सी स्कूटर पर अलंकृत कुर्ता-धोती दुपट्टा पहने आए। इस बार उनके कार्ड पर तरह-तरह की मालाएं पहने त्रिपुण्ड लगाए उनके फोटोग्राफ को फिट करना पड़ा।
उनकी ऐसी आर्थिक उन्नति देख मैं भी हतप्रभ था, पर भुगतान के मामले में वे अपनी मूल स्थिति में ही थे। भला समुद्र से नदी, पहाड़ की ओर थोड़े ही जाती है। मैंने पूरे मनोयोग से कार्ड बनाया पर प्रशंसा के शब्द तो उनके शब्दकोश में थे ही नहीं और प्रशंसा का एक अर्थ पूरा भुगतान भी था। खैर ग्राहक तो ग्राहक है।
दूसरी और किशन के घर का पता बदल चुका था उसे सस्ते किराए वाला घर लेना पड़ा। पहले वाले मकान का किराया कुछ ज्यादा ही था। साथ ही समय के साथ-साथ खर्चे भी बढ़ चुके थे। बच्चों की पढ़ाई का खर्चा सीमा के बाहर था। उसने चादर अनुसार पांव नहीं पसारे, बल्कि पैर छोटे कर लिए। वैसे उसकी मेहनत, कौशल और व्यावहारिकता के साथ-साथ विजिटिंग कार्ड से उसके घुमन्तू मैकेनिकल वर्क में बहुत सुधार हुआ पर इस बढ़ती महंगाई में ज्यादा से ज्यादा और क्या होता।
जब किशन विजिटिंग कार्ड लेने आया। बाथरूम के नलों में रिसन की समस्या थी पत्नी ने किशन के आते ही समस्या सामने रख दी। किशन ने अपने तरीके से नल न बदलते हुए वायसर बदला और रिसन बंद कर दी। कोई दूसरा प्लम्बर होता तो नल को बदल दुकानदार से कमीशन पक्का कर लेता। विजिटिंग कार्ड का भुगतान करते समय मैंने उसे इस रिपेयरिंग के पैसे देना चाहे तो उसने इनकार कर दिया, बहुत जोर जबरदस्ती करने के बाद उसने पैसे लिए।
आज बहुत ही लंबे समय के बाद दोनों ही मेरी दुकान पर आए हैं, दोनों के वाहन मेरी दुकान के सामने खड़े हैं। एक की फोर व्हीलर, एक की जूनी-पुरानी मोपेड है। एक भव्य परिधान में विभिन्न प्रकार की मालाएं धारण किए, हाथों की उंगलियों में भिन्न-भिन्न नगों की अंगूठियों से सुसज्जित, चेहरे पर विद्वता का दर्प।
दूसरी ओर समय और संघर्ष से जर्जरित मेहनतकश चेहरा, मामूली कपड़ों में सहमा सिकुडा एक मजदूर मैकेनिक का देह चौला, हाथों में मेहनत की लकीरों के सिवाय कुछ भी नहीं, निस्तेज, निरुपाय, असहाय। यदि पास बैठे भव्य व्यक्तित्व लिए इस ज्योतिषी से इसका भविष्य पूंछू, तो इसे वह पूर्वजन्म का फल बताएगा और अगर यही प्रश्न मैं आपसे, हमारे समाज, हमारी व्यवस्था के सामने रखूं तो बताइए कि आपका क्या जवाब होगा?
सुवासरा में रहते हुए श्री परमार की अपने आसपास के जीवन पर बारीक पकड़ है। जीवन को एक सहज दृष्टि से देखते हुए वे उसी सरलता में उसे कहने का कौशल रखते हैं। प्रस्तुत कहानी इसकी बानगी है।