
प्रिया प्रसाद
आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र अरविंद केजरीवाल की दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत के कुछ ही दिनों बाद इसी संस्थान में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के थर्ड ईयर के स्टूडेंट आशुतोष अग्रवाल ने राजनीति में आने की इच्छा जाहिर की।
आशुतोष कहते हैं, 'आईआईटी से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद मेरे सामने राजनीति में करियर बनाने का विकल्प निश्चित रूप से होगा। अरविंद केजरीवाल ने यह साबित किया है कि आईआईटी और इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आने वाले छात्र भी राजनीति में सफल हो सकते हैं।'
आशुतोष जैसे कई युवा जो कभी राजनीति पर बात करना भी पसंद नहीं करते थे लेकिन अब उसमें गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं। वे सोशल मीडिया के जरिए देश की राजनीति के प्रति अपनी राय जाहिर कर रहे हैं। देश के राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर टिप्पणियां कर रहे हैं और पिछड़ी सोच रखने वाले बड़बोले राजनेताओं को सोच समझकर बोलने पर भी मजबूर कर रहे हैं।
युवाओं की राजनीति में गहराती दिलचस्पी ने लोकतंत्र का चेहरा अधिक उजला किया है और राजनीति में जिस ईमानदारी की मांग लंबे समय से की जा रही थी उसके लिए जगह बनाने का काम भी किया है। ये युवा जो अलग-अलग तरह के कैम्पेन चला रहे हैं और लोगों की मुश्किलों और उनसे जुड़े मुद्दों को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं वे बदलाव का नया चेहरा है।
अब राजनीति से परहेज नहीं
सबसे अच्छी बात है कि भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले युवाओं की संख्या कुछ मुट्ठीभर युवाओं तक ही सिमटी नहीं है बल्कि उसका विस्तार तेजी से हो रहा है। आईआईटी, आईआईएम और देश के विभिन्न हिस्सों में अच्छे संस्थान से शिक्षा पा रहे ऐसे कई युवा हैं जो राजनीति में प्रवेश के लिए इच्छुक दिखाई दे रहे हैं।
लोकेश देशमुख ऐसे ही एक अन्य छात्र हैं। वे जिओफिजिक्स में सेकंड ईयर के स्टूडेंट हैं और पढ़ाई के साथ पिछले दिल्ली विधानसभा चुनावों में 'आप' के लिए ऑनलाइन और फोन पर कैम्पेनिंग कर चुके हैं। उनके कई दोस्त हैं जो उनकी तरह ही सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।
वे कहते हैं, 'मेरे अधिकतर दोस्तों का मानना है कि अगर हमारे आसपास समस्याएं हैं और देश कठिनाइयों से जूझ रहा है तो हम उनसे लंबे समय तक बच नहीं सकते हैं। तो क्यों न आज ही शुरुआत की जाए।' इन युवाओं का मानना है कि अगर वे देश से जुड़ाव रखते हैं तो उन्हें राजनीति से परहेज नहीं करना चाहिए बल्कि उसके प्रति अपडेट रहना चाहिए। यही वजह है कि वे सोशल मीडिया पर दमदार तरीके से मौजूद हैं।
चुनाव की कमान युवा हाथों में
दुर्गेश पाठक, 27 वर्ष, सिविल सर्विस की तैयारियों के सिलसिले में दिल्ली में थे और जून 2011 में वे अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़े। उन्होंने बतौर वॉलिन्टियर शुरुआत की और तेजी से दिल्ली की नब्ज भांपते चले गए। हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में वे 'आप' के वॉलिन्टियर इंचार्ज थे और उनके पास करीब 35 विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी थी। वे कहते हैं, 'मैं बदलाव का हिस्सा बनना चाहता था। देश को बेहतरी की तरफ ले जाने के लिए अपना योगदान करना चाहता था और इसलिए मैं इस आंदोलन से जुड़ गया।'
दुर्गेश की तरह कई युवा ऐसे हैं और दिलीप पांडे भी उन्हीं में से एक हैं। इन्हें आपने टेलीविजन पर होने वाली बहस में विपक्षियों के साथ तर्क करते देखा होगा। उनके पास 'आप' के आउटडोर कैम्पेन, रेडियो विज्ञापन और फेसबुक पर चलाए जाने वाले कैम्पेन की कमान थी। दिलीप आईटी एक्सपर्ट थे और हॉन्गकॉन्ग में नौकरी कर रहे थे लेकिन उसे छोड़कर वे 'आप' के साथ जुड़े क्योंकि वे राजनीति के जरिए बदलाव की इच्छा रखते थे।
भारत युवाओं की राजनीति में दिलचस्पी के जिस अध्याय पर खड़ा है उसकी शुरुआत 2007 से मानी जा सकती है जबकि आईआईएम अहमदाबाद के चेपूरी कृष्णा ने किसी राजनीतिक पार्टी के साथ इंटर्नशिप करने का विकल्प चुना था। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के साथ रिसर्च का काम किया था। वे ऐसे युवा थे जिसने राजनीति को अपने अध्ययन का विषय बनाया।
जवां कंधों पर सवार राजनीति
चेपूरी के बाद राजनीति में इंटर्नशिप करने को इच्छुक युवाओं की लहर अण्णा के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद देखने को मिली जबकि करीब 2000 युवाओं ने 'आम आदमी पार्टी' के फेसबुक पेज पर रिक्वेस्ट भेजकर पार्टी के साथ जुड़ने की इच्छा जाहिर की थी। लेकिन ये कुछ शुरुआती कदम और नाम थे और इनके अलावा ऐसे कई युवा हैं जो छोटे-छोटे कामों की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। इस समय दिल्ली इसके केंद्र के तौर पर देखा जा सकता है जहां कि युवाओं की सक्रियता राजनीति में बेहतर तरीके से देखने को मिलती है।
शहरों में अधिक सक्रियता
भारत में युवाओं की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी पिछले तीन-चार वर्षों में सभी चुनाव विश्लेषकों और राजनीतिक पर बारीक नजर रखने वालों के लिए आकर्षण का विषय रही है। वर्ष 2013 में सेंटर फोर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) ने एक सर्वे में भी इस तरफ इशारा किया था कि अब राजनीति के प्रति युवाओं का रूझान स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। तब सीएसडीएस ने सर्वे और डेटा के जरिए यह भी बताया कि दिल्ली में हुए गैंगरेप के बाद प्रदर्शन के लिए युवा किस तरह सड़कों पर उतर आए थे और सामाजिक बुराइयों के प्रति उनका गुस्सा अभिव्यक्त होने लगा था।
सर्वे ने माना, 2011 एक निर्णायक वर्ष था जबकि युवाओं ने राजनीति में गहरी दिलचस्पी दिखाना शुरू किया था। सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक 2009 में जहां 45 प्रतिशत युवाओं ने राजनीति में रुचि दिखाई थी तो 2011 में यह आंकडा बढ़कर 71 प्रतिशत हो गया था। यह लगभग दुगुनी बढ़त थी। इन्हीं नतीजों के बाद सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार ने कहा भी था कि अब शहरी युवा में राजनीति रूप से ज्यादा चेतना और सक्रियता दिखाई दे रही है।
मुद्दों की राजनीति का समय
युवाओं का राजनीति में आना इस लिहाज से महत्वपूर्ण था कि उन्होंने राजनीति के परंपरागत मुहावरे को प्रभावित किया। उन्होंने जता दिया कि जो भी अच्छा काम करेगा वे उसी के साथ रहेंगे। राजनीति में युवा भागीदारी पर नजर रखने वाले रवीश कुमार कहते हैं, युवाओं ने राजनीति को बदल दिया है। इन युवाओं की निष्ठा स्थायी रूप से किसी पार्टी के लिए नहीं है। पार्टियों को भले लगता हो कि वे युवाओं को अपनी तरफ खींच लेंगी तो वह उसकी तरफ आ जाएगा, जरूर उसकी तरफ आ जाएगा लेकिन कोई और उसे अच्छा विकल्प देगा तो वह उसकी तरफ भी चला जाएगा। यह वह 1970 वाली जनरेशन नहीं है जो एक-दो हीरो को ही पसंद करती थी।
यहां एक आदमी पांच लोगों को पसंद करता है। कभी वह तेंडुलकर से इंस्पायर होता है तो कभी किसी न्यूज एंकर से। कभी किसी साधारण लीडर से इंस्पायर हो जाता है तो कभी बैठे-बैठे ओबामा से। उसकी प्रेरणा के स्रोत बहुत तात्कालिक हैं और इसीलिए उस जमीन पर टिकना पुराने राजनीतिक दलों के लिए बहुत मुश्किल हो गया है। आज का युवा राजनीतिक दलों को एक प्लेटफॉर्म की तरह देखता है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि अगर आप अच्छा काम करते हैं, अच्छे मुद्दे लेकर आते हैं तो वह साथ है और अगर नहीं तो वह किसी ओर की तरफ भी जा सकता है।
यह युवा जुड़ाव अभूतपूर्व है
भारत में युवाओं पर सभी का ध्यान इसलिए भी है क्योंकि भारत एक युवा देश है। आम आदमी पार्टी के नेता और कभी चुनाव विश्लेषक रहे योगेंद्र यादव कहते हैं, हमारे समाज में किसी भी दूसरे समाज से युवा वर्ग का अनुपात ज्यादा है। आज भी युवा वर्ग की छवि कहीं न कहीं महानगरों में बसने वाले अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं से बनती है। हम अक्सर उन्हें ही युवा वर्ग का प्रतीक मान लेते हैं जबकि हकीकत में वे हमारे युवा वर्ग का एक बहुत छोटा हिस्सा हैं। आज युवा वर्ग राजनीति में हिस्सेदारी के लिहाज से बुजुर्गों या अन्य किसी पीढ़ी से बहुत अलग नहीं है। लेकिन हाल ही में जिस तरह का अभूतपूर्व जुड़ाव दिखा है वह गौर करने लायक है और निश्चित रूप से उसने महत्वपूर्ण असर भी डाला है।
लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि युवाओं को सीधे सत्ता में भागीदारी के बजाय समाज सेवा से शुरुआत करना चाहिए तभी वे मुद्दों से सीधा जुड़ाव बना पाएंगे। सिविल सोसायटी को ऐसे युवाओं को सिखाना चाहिए कि वे कैसे धीरे-धीरे कदम बढ़ा सकते हैं। रोटरी क्लब और अन्य संस्थाएं स्कूल और कॉलेजों में इसकी शुरुआत कर सकती हैं। जागरूक युवा ही देश परंपरागत राजनीति को नया रंग दे सकते हैं।
बदलाव जो चाहते हैं युवा
पिछले चुनावों में दिखी युवा ताकत