
पुणे। देश में असहिष्णुता पर चल रही बहस के बीच लेखक अरुंधति रॉय ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। एक विवादित बयान देते हुए उन्होंने कहा कि जिस डर में भारत में अल्पसंख्यक जी रहे हैं उसे असहिष्णुता नहीं कहा जा सकता। लोगों को मारना, जिंदा जलाना और दूसरी घटनाओं को असहिष्णुता कहना काफी नहीं है। हमें एक नया शब्द निकालना होगा जो इन सब घटनाओं को परिभाषित करे।
उन्होंने इसके साथ ही केंद्र सरकार पर देश में हिन्दू राष्ट्रवाद के अंतर्गत ब्राह्मणवाद फैलाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के सामाजिक सुधारों को महान हिन्दू विचार के रूप में महिमामंडन करने की कोशिश कर रही है।
इसके अलावा रॉय ने यह भी कहा कि सरकार फिर से इतिहास लिखने की कोशिश कर रही है। वो देश के विभिन्न संस्थानों के नाम अपने लोगों के नाम पर रख दिए हैं और इस तरह वो देश में दलित, पिछड़ों, मुस्लिमों और ईसाइयों को बांटने की कोशिश कर रही है।
55 वर्षीय बुकर प्राइज विजेता अरुंधति रॉय यहां पर महत्मा फुले समता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में महत्मा ज्योतिबा फुले अवॉर्ड लेने पहुंची थी। इस कार्यक्रम का दक्षिण पंथियों ने जमकर विरोध किया है और लेखिका को राष्ट्र विरोधी करार दे दिया।