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डिजिटल डेस्क, बिहार। पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहा उपचुनाव (Bankipur Bypoll Elections) अब केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजनीतिक प्रतिष्ठा, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता और बिहार के युवा यानी GenZ मतदाताओं के प्रभाव की भी परीक्षा माना जा रहा है।
हाल ही में हुए छात्र आंदोलन के बाद इस सीट की राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या छात्र आंदोलन का असर मतदान तक पहुंचेगा और चुनावी परिणामों को प्रभावित करेगा।
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र की सबसे बड़ी खासियत यहां की युवा आबादी है। इस क्षेत्र में पटना विश्वविद्यालय, एनआईटी पटना, बीएन कॉलेज, साइंस कॉलेज, एएन कॉलेज, चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी समेत कई प्रमुख शिक्षण संस्थान और बड़े कोचिंग सेंटर मौजूद हैं। हर वर्ष हजारों छात्र यहां पढ़ाई के लिए आते हैं।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 3.79 लाख मतदाता हैं। इनमें करीब 1.20 लाख से 1.35 लाख मतदाता 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के हैं। यानी कुल मतदाताओं का लगभग एक-तिहाई हिस्सा युवा वर्ग का है। यही वजह है कि इस बार चुनाव में GenZ वोटरों को निर्णायक माना जा रहा है।
हाल ही में हुए छात्र आंदोलन ने युवाओं को राजनीतिक रूप से पहले की तुलना में अधिक सक्रिय किया है। रोजगार, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतरे। आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज, पानी की बौछार और बैरिकेडिंग की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं।
इसके बाद शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे बिहार की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए। माना जा रहा है कि इन विषयों का असर चुनाव प्रचार और मतदाताओं की सोच दोनों पर पड़ सकता है।
बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। कई चुनावों से इस सीट पर पार्टी का लगातार कब्जा रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार यहां से विधायक चुने जाते रहे। उनके भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई, जिसके चलते उपचुनाव की स्थिति बनी।
भाजपा ने इस सीट पर नीरज सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है। वहीं दूसरी ओर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद चुनाव मैदान में उतरकर भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में चुनौती दे रहे हैं। यही कारण है कि यह मुकाबला पूरे बिहार की राजनीति का केंद्र बन गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वर्तमान माहौल का लाभ उठाने की कोशिश सभी राजनीतिक दल करेंगे। प्रशांत किशोर लगातार शिक्षा, रोजगार, पलायन और सरकारी व्यवस्था जैसे मुद्दों को अपनी चुनावी रणनीति का केंद्र बनाए हुए हैं।
दूसरी ओर भाजपा विकास कार्यों, मजबूत संगठन और अपने पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे चुनावी मैदान में उतरी है। दोनों पक्षों की रणनीति अलग-अलग है, लेकिन दोनों की नजर युवा मतदाताओं पर टिकी हुई है।
देखा जाए तो केवल किसी आंदोलन का होना चुनावी परिणाम तय नहीं करता। बिहार के चुनावी इतिहास में कई बड़े आंदोलन हुए हैं, लेकिन हर आंदोलन का सीधा असर मतदान पर नहीं दिखा। बड़ी संख्या में छात्र आंदोलनों में भाग लेते हैं, लेकिन मतदान के दिन कई छात्र अपने गृह जिलों में लौट जाते हैं या मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि आंदोलन के दौरान दिखी भीड़ क्या मतदान के दिन भी उतनी ही सक्रिय दिखाई देगी।
यही कारण है कि बांकीपुर उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति, युवा मतदाताओं की भूमिका और छात्र आंदोलन के संभावित राजनीतिक प्रभाव की भी महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है।