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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 18, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Bhagat Singh Birth Anniversary: भगत सिंह ने कहा था, पिता ने मेरी पीठ में छुरा भोंक दिया, जानिए क्यों

Bhagat Singh Birth Anniversary: भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने स्पेशल ट्रिब्यूनल में फांसी न देने के लिए निवेदन भेज दिया। इस बात पर Bhagat Singh ...और पढ़ें

By Arvind DubeyEdited By: Arvind Dubey
Publish Date: Tue, 18 Feb 2020 02:14:58 PM (IST)Updated Date: Mon, 28 Sep 2020 07:24:33 AM (IST)
Bhagat Singh Birth Anniversary: भगत  सिंह ने कहा था, पिता ने मेरी पीठ में छुरा भोंक दिया, जानिए क्यों

Bhagat Singh Birth Anniversary: भगत सिंह

को जेल की काल-कोठरी में बिना स्वाध्याय के चैन नहीं था। उन्होंने अनेक पुस्तकों को पढ़ा। जो भी उनसे मिलने आता, उनसे वे पुस्तकों की मांग करते थे। उन्होंने अपने पिता से लोकमान्य तिलक जी रचित 'गीता रहस्य' और 'नेपोलियन बोनापार्ट' की जीवनी भी मंगवाई थी। 30 अक्टूबर 1930 को जब उन्हें और उनके साथियों को फांसी की सजा सुनाई गई, तो देशभर के युवाओं में स्वतंत्रता के लिए जोश और अधिक आंदोलित हो उठा। यही इन क्रांतिकारियों का उद्‌देश्य भी था। एक बार Bhagat Singh के पिता सरदार किशन सिंह ने स्पेशल ट्रिब्यूनल में फांसी न देने के लिए निवेदन भेज दिया। इस बात पर Bhagat Singh ने नाराज होकर कहा था 'मेरे पिता ने मेरी पीठ में छुरा भोंक दिया है।'

लाहौर के कई राष्ट्रवादी वकीलों ने Bhagat Singh से मिलकर उनकी रिहाई के लिए गवर्नर को आवेदन देने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन वे टालते गए और कहते रहे कि कल देखेंगे। एक दिन सरदार Bhagat Singh ने गवर्नर को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने लिखा कि 'आपने हम पर इंग्लैंड के शासक किंग जॉर्ज के विरुद्ध युद्ध के संचालन का आरोप लगाया है। इससे यह प्रतीत होता है कि भारत और इंग्लैंड के बीच युद्ध की स्थिति है और हमने युद्ध में भाग लिया है। अतः हम युद्धबंदी हैं, इसलिए हमारे साथ वैसा ही व्यवहार हो। हमें फांसी न देते हुए सीधे गोली मार दी जाए। हमारी वध प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए आपकी सेना की टुकड़ी भेजने की आज्ञा दें।'


Bhagat Singh ने विस्तार पूर्वक लिखा था- 'हमारा युद्ध तुम्हारे जैसे शोषण और साम्राज्यवाद के विरुद्ध है, और यह तब तक चलेगा, जब तक अंतिम निष्कर्ष प्राप्त नहीं हो जाता।' जब भगत ने इसकी प्रतिलिपि वकीलों को बताई तो वे अवाकऔर चकित रह गए और सजल आंखों से भगत को देखने लगे। दरअसल, क्रांतिवीरों ने अदालतों को अपने विचारों के प्रचार के बड़े मंच की तरह उपयोग किया था। लोगों को जगाने की खातिर वे प्राण त्यागने को भी तैयार थे।

(साभार : अभय मराठे लिखित 'ओ उठो क्रांतिवीरो')