
नई दिल्ली, ब्यूरो। किसानों के मुद्दे पर रैली के जरिए कांग्रेस ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को भले ही निशाना बनाया हो, लेकिन यह लड़ाई विपक्ष में वजूद बचाने की भी थी। जनता परिवार के विलय और माकपा में हुए बदलाव के बीच कांग्रेस के लिए यह जरूरी है कि वह गरीब और किसानों के बीच पकड़ और मजबूत करे। यही कारण था कांग्रेस नेतृत्व की ओर से जहां सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा गया। वहीं यह भरोसा भी दिलाया गया कि कांग्रेस किसानों के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
संसद में कांग्रेस मुख्य विपक्ष की शक्ति भले ही रखती हो, लेकिन पिछले महीनों में यह साफ दिखता रहा कि कभी तृणमूल कांग्रेस तो कभी वाम और कभी दूसरे छोटे दल नेतृत्व करते रहे। अब जबकि जनता परिवार एकजुट हो चुका है और माकपा में सीताराम येचुरी जैसे सक्रिय सांसद को पार्टी महासचिव जैसे पद की नई जिम्मेदारी मिली है तो यह गुट और प्रभावी हो सकता है।
कांग्रेस चाहती है अन्य विपक्षी दलों को अपनी छतरी में लाना
ध्यान रहे कि जनता परिवार में बड़े चेहरे भी हैं और चुनाव की दृष्टि से अहम राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश में ताकत भी। जबकि राज्यसभा में येचुरी ने ही नेतृत्व लेकर राष्ट्रपति के अभिभाषण में संशोधन पारित करवाकर सरकार को असहज कर दिया था। दोनों ही सदनों में कांग्र्रेस माकपा और जनता परिवार से ज्यादा बड़ी संख्या में है लेकिन ये ज्यादा मुखर और प्रभावी दिखते रहे हैं। ऐसे में कांग्र्रेस के लिए बड़ी चुनौती है कि वह विपक्ष में अपना वजूद भी बचाए और दूसरे दलों को अपनी ही छतरी में रहने के लिए बाध्य भी करे।
मंच पर हल उठाने से क्या मिलेगा हल?
कुछ दिनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया था। अब दिल्ली में किसानों की रैली की पहल कर कांग्रेस ने खुद को सबसे आगे खड़ा कर लिया है। किसान रैली के मंच पर राहुल और सोनिया गांधी ने हल भी उठाया। लेकिन क्या इस हल से किसान राजनीति का लक्ष्य हासिल होगा। प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा निशाना साधना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। संभव है कि संसद सत्र में खुद राहुल गांधी भी ज्यादा सक्रिय दिखें।