
डिजिटल डेस्क, नईदिल्ली। भारत में जहां कई राज्यों में किसान कर्ज और पानी की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र का एक छोटा सा गांव आज पूरी दुनिया के लिए मॉडल बन गया है। इस गांव की तरक्की देखकर अमेरिका, चीन और दुबई तक के लोग हैरान हैं। हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र के अहिल्या नगर जिले में बसे हिवरे बाजार गांव की। यहां के किसान इतने संपन्न हैं कि वे बैंकों को करोड़ों रुपये का कर्ज देने की हैसियत रखते हैं।
खेती और डेयरी के दम पर आज इस गांव की प्रति व्यक्ति सालाना आय 9 लाख रुपये तक पहुंच गई है। इस गांव की कहानी को यूट्यूबर अंश मिश्रा ने अपने यूट्यूब चैनल INDIGO TREKKER पर दिखाया है। उनके वीडियो को अब तक करीब 1 मिलियन व्यूज मिल चुके हैं और लोग इस मॉडल को जमकर सराह रहे हैं।
90 के दशक में हिवरे बाजार की हालत आज से बिल्कुल अलग थी। इसे देश के सबसे सूखाग्रस्त इलाकों में गिना जाता था। पथरीली जमीन, साल में सिर्फ 200 से 300 मिलीमीटर बारिश और पीने के पानी की भारी किल्लत ने गांव को तोड़ दिया था। हालात इतने खराब हो गए थे कि करीब 80 प्रतिशत ग्रामीण गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर चुके थे। गांव में गरीबी, बेरोजगारी, आपसी झगड़े और नशे का बोलबाला था।
तभी 1989 में इस गांव की किस्मत ने करवट ली। युवा पोपटराव पवार गांव के सरपंच बने। उन्होंने 26 जनवरी 1990 को ग्राम सभा बुलाई और पूरे गांव को एकजुट होकर अपनी समस्याएं खुद सुलझाने की शपथ दिलाई। यहीं से बदलाव की असली कहानी शुरू हुई।
हिवरे बाजार ने किसी सरकारी मदद या बाहर के मसीहा का इंतजार नहीं किया। गांव ने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी यानी पानी की कमी को ही अपनी ताकत बना लिया। गांव वालों ने वॉटर बजटिंग यानी पानी का बजट बनाना शुरू किया। पानी को कैसे बचाना है और कैसे सब में बराबर बांटना है, इसकी पूरी योजना तैयार की गई।
इस बदलाव के लिए गांव में सात गोल्डन रूल लागू किए गए। पहला, चराईबंदी - खुले में मवेशी चराने पर रोक। दूसरा, कुल्हाड़बंदी - पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह बैन। तीसरा, नसबंदी और नशाबंदी - नशे पर पूरी तरह प्रतिबंध। चौथा, श्रमदान - हर हफ्ते सभी गांव वाले मिलकर विकास के काम करते हैं। पांचवां, बोरवेलबंदी - गहरे ट्यूबवेल खोदने पर रोक, सिर्फ उथले कुओं का इस्तेमाल। छठा, फसल प्रबंधन - ज्यादा पानी पीने वाली फसलों जैसे गन्ना और केला उगाने पर पाबंदी। सातवां, स्वच्छता अभियान - आज गांव में पान, तंबाकू या सिगरेट की एक भी दुकान नहीं है।
जब पानी रुकने लगा तो बंजर जमीन भी सोना उगलने लगी। आज गांव में 400 से ज्यादा कुएं लबालब भरे हुए हैं। किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ प्याज, संतरा, अमरूद, अंजीर और ड्रैगन फ्रूट जैसी महंगी फसलें उगा रहे हैं।
खेती के साथ डेयरी उद्योग ने गांव की अर्थव्यवस्था को नई उड़ान दी है। गांव में हर दिन करीब 8 हजार से 9 हजार लीटर दूध का उत्पादन होता है, जो सीधे गांव की सहकारी डेयरी में जाता है। खेती में कभी नुकसान भी हो जाए तो डेयरी से होने वाली कमाई किसानों की जेब कभी खाली नहीं होने देती।
आज हिवरे बाजार किसी आधुनिक शहर से कम नहीं लगता। इसे लोग प्यार से 'मिनी कोंकण' भी कहते हैं। गांव में एक भी कच्चा मकान नहीं है। पक्के मकान, चौड़ी सड़कें और आलीशान बंगलों के बाहर खड़ी बड़ी गाड़ियां और ट्रैक्टर यहां की संपन्नता की गवाही देते हैं।
गांव में बेहतरीन सरकारी अस्पताल, खूबसूरत लाइब्रेरी, ओपन जिम और मेहमानों के लिए खास तौर पर बनाए गए सार्वजनिक शौचालय हैं। सबसे खास बात यह है कि बच्चों के लिए 10वीं कक्षा तक मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी है। स्कूल के बच्चे खुद गांव में हुई बारिश के आंकड़े दर्ज करते हैं, जिससे उनमें पर्यावरण के प्रति जागरूकता आती है।
हिवरे बाजार की यह सफलता किसी बड़ी फैक्ट्री या आईटी कंपनी की वजह से नहीं आई है। यह एकजुटता, अनुशासन और पानी के सही प्रबंधन का नतीजा है। साल 1992 में जहां इस गांव की प्रति व्यक्ति आय 800 रुपये से भी कम थी, वहीं आज वह बढ़कर 9 लाख रुपये सालाना तक पहुंच गई है। यह मॉडल साबित करता है कि अगर गांव के लोग ठान लें तो आत्मनिर्भर भारत का सपना गांव से ही सच हो सकता है।