पहली बार गांधीजी 28 मार्च 1918 को इंदौर आए थे और यह मध्यप्रदेश की उनकी पहली यात्रा थी। इंदौर आने से पूर्व चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में गांधीजी के आंदोलनों को बेहद लोकप्रियता मिली थी। इंदौर यात्रा के बाद ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में 'गांधी युग' का सूत्रपात हुआ जो 1919 के बाद का काल माना जाता है। गांधी जब इंदौर आए तब दक्षिण अफ्रीका में उनका कार्य पूर्ण हो चुका था। वे 21 वर्षों तक अफ्रीका में रहकर लौटे थे। इंदौर यात्रा के साथ और उसके बाद ही उनके मन में यह बात जम चुकी थी कि अब भारत में रहकर ही भारत की आजादी के लिए संघर्ष करना है। दूसरा इंदौर यात्रा तक वे पूरे देश में 'महात्मा' के रूप में स्वीकार किए जा चुके थे। उनकी असाधारण और विलक्षण अहिंसक शक्ति के बारे में पूरा देश आश्वस्त हो चुका था। तीसरी बात यह कि बापू

के इंदौर आने से पूर्व ही प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था और इसलिए लोग हिंसा मुक्त समाज चाहते थे। ये तीन संदर्भ इंदौर यात्रा से जुड़े हैं।

महात्मा गांधी इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति के रूप में पधारे थे। इंदौर में उनकी तीन दिवसीय यात्रा थी। महात्मा गांधी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में जिन मुद्दों को उठाया था वे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने व दक्षिण में, विशेष रूप से तमिलभाषियों में हिंदी के प्रचार-प्रसार से संबंंधित थे। जब गांधीजी 28 मार्च को इंदौर पहुंचे थे तो जनता पलक-पावड़े बिछाकर उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। हजारों की संख्या में स्वयंसेवक व दर्शनार्थी गांधीजी की प्रतीक्षा में थे। गांधीजी हमेशा रेल के तीसरे दर्जे के डिब्बे में यात्रा करते थे। उनका यह मानना था कि यदि भारत को

पहचानना हो तो तृतीय श्रेणी में ही यात्रा करना चाहिए। जब गांधीजी स्टेशन पर उतरे तो लोग उनकी सादगी को देखकर हतप्रभ रह गए। इंदौर आगमन की एक और खूबी यह थी कि लोगों ने गांधीजी के मना करने के बावजूद उनकी बग्गी के घोड़ों को अलग कर दिया और खुद उनकी बग्गी खींची।

कंडैल सत्याग्रह से हुए प्रभावित

गांधीजी की दूसरी मप्र यात्रा 20 व 21 दिसंबर 1920 को हुई थी। इस यात्रा के दौरान गांधीजी रायपुर, धमतरी, कंडैल व कुरूद अंचल में पंधारे थे। गांधीजी की छत्तीसगढ़ की यात्रा पर आने का मकसद ही सत्याग्रह के प्रति वहां की जनता की निष्ठा थी।विशाल स्तर पर कंडैल नहर सत्याग्रह, प्रदेश में आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कंडैल मध्यप्रदेश का संभवतः पहला ऐसा गांव था जहां गांधीजी ने सत्याग्रहियों को आशीर्वाद दिया।

गांधीजी और मध्यप्रदेश की यात्राएं जो अब इतिहास में दर्ज हैं

- पहली यात्रा- 28 मार्च 1918 इंदौर की

- दूसरी यात्रा- 20-21 दिसंबर रायपुर, धमतरी, कंडैल की।

- तीसरी यात्रा- छिंदवाड़ा में 6 जनवरी 1921

- चौथी यात्रा सिवनी-जबलपुर में- 20 व 21 मार्च 1921

- पांचवी यात्रा खंडवा मेंमई 1921 में

- छठी यात्रा भोपाल और सांची -सितंबर 1929

- सातवीं यात्रा - 22 नवंबर से 8 दिसंबर 1933 में मप्र के कई शहरों की।

- आठवीं यात्रा- 20 अप्रैल 1935 को इंदौर की।

- नवीं यात्रा- जबलपुर व भेड़ाघाट की- फरवरी 1941 में

- दसवीं यात्रा- जबलपुर की 27 अप्रैल1942 को।

Posted By: