Hyderabad Doctor Murder: हैदराबाद से आज सुबह कुछ ऐसी चौंकाने वाली खबर आई कि देश में खुशियां छा गईं। यहां महिला वेटरनरी डॉक्‍टर से दुष्‍कर्म व हत्‍या के चारों आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया। जैसे ही लोगों को इसका पता चलता गया, सोशल मीडिया पर यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। जैसे ही facebook, twitter , whatsapp और instagram जैसे सोशल मीडिया प्‍लेटफार्म पर लोगों को इसकी सूचना मिलते गई, लोग आनंदित हो उठे। कमेंट्स में खुशी झलक रही है और टिप्‍पणियों में संतुष्टि के भाव हैं।आज Twitter पर #Encounter, #encounter Trend हो रहा है। हालांकि कुछ लोग एनकाउंटर पर भी सवाल उठा रहे हैं लेकिन एक बड़ा तबका इसे जायज ठहरा रहा है। लोग यह कह रहे हैं कि यही असली न्‍याय है। आइये देखें सोशल मीडिया की मिली जुली प्रतिक्रियाएं।

Garima Mishra Katyayan

यदि कढ़ाई के गर्म खौलते हुए तेल की एक बूंद भी छू जाए तो कितनी जलन होती है ना....

जो खाना बनाता है उसने जरूर महसूस किया होगा.....

ज्यादा तैलीय खाने से सीने की जलन भी कितना बैचैन कर देती है ना.....

असफलता की जलन जो रह रह कर रात भर जगाती है..

इश्क़ की तपिश जिसे न कहा जा सकता न छुपाया जा सकता.....

जेठ के महीने में नँगे पैर छत पर खड़े होने की जलन सबने महसूस की होगी.....

अंतिम संस्कार करते हुए पुत्रों ने अपने जनक जननी की जलन को जीवित रहते भोगा होगा.....

दहेज में जली लड़कियों की कहानियों की जलन भी खूब पढ़ी हम सबने

लेकिन जिंदा रहते हुए

"नँगे शरीर बलत्कृत होने के बाद पूरा शरीर अग्नि में जलते हुए कुछ दूरी तक भागने की जलन"

बस डॉ रेड्डी ने ही महसूस की थी।

उस अनुपात में ये दंड कुछ भी नहीं....

ये किसी की असमय मृत्यु का उत्सव नहीं है...मुझे पीड़ा होती है काल अचानक कहीं पहुँच जाता है किंतु ये शब्द "औरत होने के अभिशाप" की प्रतिक्रिया है....आखिर कब तक ?

गरिमा मिश्रा कात्यायन

डा इमरान खान

गैंगरेप के चारों आरोपी पुलिस एनकाउंटर में मारे गए.. जिस दिन वर्दी का इस तरह सुदुपयोग होने लगा उस दिन हर तरह का अपराध बंद हो जायेगा....

मेरी तेलंगाना पुलिस से अपील है कि चारों के शवों की तस्वीर सार्वजनिक करें...जैसे बलात्कार के बाद जली हुई लाशें देख कर लड़कियां सहम जाती हैं....वैसे ही बलात्कारी मानसिकता वाले पुरूष सहमने चाहिये...

राकेश्‍वर वर्मा

जि‍स देश मे हर मुकदमा 10 साल चले वहां एनकाउटर ही ऐक मात्र अच्‍छा वि‍कल्‍प है। इसके बाद तो मॉब लि‍चि‍ग ही बचेगी। उसमे बेगुनाह भी मर सकता है। इसलि‍ए इस तरीके को हम सही मानते है। यदि‍ ये फर्जी एनकाडटर है तो और भी अच्‍छा है। उन्‍नाव केस मे भी कल तक ऐसा ही होना चाहि‍ए।

Dr-Imran Khan

एनकाउंटर फेक था या रियल इस पर बहस वो न करें जो कल तक बलात्कारियों और कातिलों को दरिंदा, अमानुष और तरह तरह के संज्ञा व सर्वनाम से पुकार रहे थे. जो पुलिस को लचर रवैये के लिए कोसते फिरते हैं वही तुरंत एक्शन के लिए कोसने लगें तो फिर कोसने वाले पर ही सवालिया निशान लगता है.

आज की स्थिती यह है कि बलात्कारियों के एनकाउंटर से लगभग पूरा देश खुश है जो खुश नहीं है उन्हें तो 2014 के बाद से खुश होने का मौका ही नहीं मिला. आगे भी नहीं मिलेगा..हालांकि ये एनकाउंटर तेलंगाना पुलिस ने किया है जहां...के.सी.आर की सोकाल्ड सेक्युलर सरकार है..पर इस पर सवाल उठाने वाली वही गैंग है जो..टुकड़े टुकड़े..और थैंक्स इमरान कैंपेन के लिये मशहूर है..

ख़ैर, अब आते हैं एनकाउंटर पर... एनकाउंटर फेक हो या रियल समाज में एक मैसेज गया है..... बलात्कारी मानसिकता के उन जानवरों के मन में मौत के डर का बैठना बहुत जरुरी है... ताकि मनुष्य के खाल में छिपे हुए ये भेड़िये छिपे ही रहें...

रही बात बलात्कारियों की तो जो लोग उन्हें आज बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर रहे थे उस दिन कहां थे जब उन्हें गिरफ्तार किया गया था... वे तब कहां थे जब इन बलात्कारियों ने अपना गुनाह कबूल किया था और घटना की एक एक जानकारी दे रहे थे. कैसे सीसीटीवी फुटेज और बताई गई कहानी एक ही पटरी पर नज़र आ रही है? पुलिस बाकी के सबूतों के लिए और रिक्रिएशन के लिए चारों गुनाहगारो को घटनास्थल पर ले कर पहुंची. वहाँ पत्थरो से हमला कर पुलिस वालों से हथियार छीना गया और फिर फायरिंग भी की गई, फायरिंग में 2 पुलिस वाले घायल भी हुए हैं. मजबूरन पुलिस को उन्हें मारना पड़ा. सोचिए अगर वे वहां से भाग जाते तो क्या आप पुलिस पर सवाल नहीं उठाते?

कहने को तो आप यह भी कह सकते हैं कि शायद सीसीटीवी फुटेज के साथ भी पुलिस ने छेड़खानी कर दी हो.. तो जब आप अपने सुविधानुसार नैरेटिव गढ़ सकते हैं तो दूसरों को भी गढ़ने दीजिए... कम से कम अपराध की प्रवृति पर तो चोट हो रही है. याद रहे गुनहगार कोई मामुली चोर या धोखेबाज़ नहीं थे उन्होंने एक लड़की को प्लानिंग के तहत रेप के बाद क़त्ल कर के बेरहमी से जला दिया था. मुंह दाब कर उसका दम घोंटा था... याद कीजिए.... अगर याद आये तो आप भी पुलिस पर सवालों की नहीं फूलों की बारिश करना चाहेंगे. कम से कम आज की सच्चाई तो यही है...🙏

प्रमोद व्‍यास

रिक्रिएशन बड़ा खतरनाक होता है

जिसकी आंखों में पानी शरीर में रीढ़ की हड्डी हो वह कैसे बर्दाश्त कर सकता था झूठ मूठ का भी आनाचारी दृश्य....

हैदराबाद पुलिस में वह जरूर कोई भावुक इंसानो का समूह रहा होगा .... किसी मां का बेटा ... किसी बेटी का बाप रीक्रिएशन भी बर्दाश्त नहीं हुआ कल्पना भी बर्दाश्त नहीं दहल गया होगा मन .....

बधाई

हैदराबाद पुलिस

अपने कंधे पर रखे हुए शेरो को जिंदा साबित करने के लिए पुलिस की बंदूक नेताओं को सलामी देने के लिए ही नहीं होती बारूद दिवाली पर पटाखे चलाने के लिए नहीं होता कुछ बारूद पर तो बेटियों का भी हक हो कुछ गंगाजल तो बेटियों के हक में भी आए

महामहिम अब वक्त आ गया है आपको और इस देश की सबसे बड़ी पंचायत कोअपनीरीढ़ की हड्डी के गुरिये गिन लेना चाहिए

कृपया इस पोस्ट पर कोई मानवधिकार का ढोल न पीटे..

मौत पर जश्न की रवायत तो नहीं है,

मगर जाने क्यों सुन के बड़ा सुकून मिला..

हैदराबाद रेप केस

तेलंगाना पुलिस एनकाउंटर

Salute to Hyderabad Police

शुरुआत अच्छी है आगे भी सजा ऐसे ही मिलती रहना चाहिये

अभिषेक कुमार

हैदराबाद गैंगरेप-मर्डर केस में चारों आरोपियों के साथ हुए एनकाउंटर पर सवाल उठने लगे हैं. सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा ग्रोवर ने पुलिस पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की. उन्होंने कहा कि पुलिस पर मुकदमा दर्ज किया जानिए और पूरे मामले की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए. महिला के नाम में कोई भी पुलिस एनकाउंटर करना गलत है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा, 'एनकाउंटर हमेशा ठीक नहीं होते हैं. इस मामले में पुलिस के दावे के मुताबिक आरोपी बंदूक छीन कर भाग रहे थे. ऐसे में शायद उनका फैसला ठीक है. हमारी मांग थी कि आरोपियों को फांसी की सजा मिले, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के तहत. हम चाहते थे कि स्पीडी जस्टिस हो. पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही कार्रवाई होनी चाहिए. आज लोग एनकाउंटर से खुश हैं, लेकिन हमारा संविधान है, कानूनी प्रक्रिया है.'

वहीं, बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने कहा, 'धन्यवाद हैदराबाद पुलिस, यह बलात्कारियों से निपटने का तरीका है. आशा है अन्य राज्यों की पुलिस आपसे सीख लेगी.'

Âbhishek Kumar

संसद में जिन सांसदों को कानून बनाने के लिए भेजा जाता वो खुद भीड़ तंत्र या इनकाउंटर के सहारे न्याय को जायज ठहराने लगे तब तो खैर कहने को बचा ही क्या........

इससे बेहतर है कि ये सांसद अपनी सांसदी छोड़कर नुक्कड़ पर खड़े होकर भाषणबाजी करके वाह वाही बटोरे। क्योकि जिस काम के लिए इन्हें भेजा गया वो काम तो ये न कर पा रहे।

वही ज्यादातर ऐसे केसों में लेटलतीफी से जागने वाली पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ये सरकार भी अब जागी और केंद्र सरकार ने देश के हर थाने में महिला हेल्प डेस्क के लिए निर्भया फंड से 100 करोड़ रुपये देने की बात कही तो अपराधियों को जल्द सजा मिल सके इसके लिए 1023 नए फास्टट्रैक कोर्ट खोलने की बात भी कही।

बड़ी बात ये की जब देश मे हर सालों हजारों की संख्या में रेप हो रहे हो और हर दिन ये आकंड़ा 100 की संख्या तक पहुँचता हो तब जब तक हैदराबाद या उन्नाव जैसी दरिंदगी न दिखाई जाए तब तक सरकारों के कानों पर जू क्यो नही रेंगती?

यही काम पहले क्यो नही किया गया?

निर्भया फंड का पूरा पैसा क्यो नही खत्म हो पाता? सिर्फ चंडीगढ़ की बात करे तो वहाँ निर्भया फंड से लगभग साढ़े 7 करोड़ रुपये दिये गए थे जिनमें से लगभग सवा 3 करोड़ रुपये ही खत्म हुई थे। यही हाल बाकी दूसरे राज्यों का भी है।

कारण यही है कि जब तक कोई ऐसी ही घटना जनता में आक्रोश नही भरती तब तक फिर से पूरा सिस्टम गहरी नींद में सो जाता है। बेहतर हो कि एक मोनिटरिंग तंत्र विकसित करके सिस्टम की जवाबदेही तय की जाए और पुलिस व्यवस्था से लेकर कानूनी प्रक्रियाओं में जो सुधार अपेक्षित है उसे जल्द से जल्द लागू किया जाए। वरना फिर ये आंकड़ा ऐसे ही बढ़ता रहेगा। कुछ घटनाएं मीडिया, सोशल मीडिया की सुर्खियां बनेंगी तो कई लड़कियों की आवाज उनके गले मे ही हमेशा के लिए दबकर शांत हो चुकी होगी।

Umesh Dwivedi

क्या लिखें इस एनकाउंटर पर ? कुछ समझ नही आरहा है दिल और दिमाग अलग अलग कह सोच रहा है ...दिल लड़की के परिवार के साथ खड़ा है दिमाग बहुत आगे की सोच रहा है भयावह...आभासी दुनिया मे हर्ष है...कितने भोले है हम ..अपनी पसंद की बात का जल्दी विश्वास कर लेते हैं ..

#Encounter, #encounter

दहल गया था पूरा देश

तेलंगाना के हैदराबाद में बीते शुक्रवार एक महिला वेटरनरी डॉक्‍टर के साथ दरिंदगी की हदें पार की गईं। उनकी स्‍कूटी खराब होने के बाद वे दरिंदों के बीच फंस गईं। उनके साथ सामूहिक दुष्‍कर्म किया गया, उसके बाद उन्‍हें जिंदा जला दिया गया। इस वहशियाना वारदात के बाद देश में नारी सुरक्षा को लेकर फिर से जबर्दस्‍त बहस छिड़ गई थी। आक्रोशित अवाम ने व्‍यवस्‍था पर तीखे सवाल दागे, इसे सड़ांध से भरा बताया और जिम्‍मेदारों से पूछा है कि निर्भया जैसी जघन्‍यतम वारदात के बाद भी देश में कुछ नहीं बदला तो आखिर हम कहां जा रहे हैं। मामला संवेदनशील हो गया और सोशल मीडिया का आक्रोश जनआंदोलन का रूप ले चुका था।

Tejshree Purandare

#एक_आवाज़

आज मैं कल कोई और परसों फिर कोई और

यूं ही चलता रहेगा सिलसिलों का दौर

निर्भया, आ​सिफा, दामिनी, दिशा

केवल नाम बदले सबके साथ वही हुआ

कभी मिनी स्कर्ट तो कभी ब्रा स्ट्रेप पर

हर घटना का इल्जाम लगाया मुझ पर

नेश में होगी या लडके के साथ

इसी घिनौनी सोच ने कभी नहीं छोड़ा आपका साथ

लेकिन अब...अब तो ना नशे में हूं मैं

ना ही किसी लड़के के साथ हूं में

ब्रा का हुक और स्ट्रेप भी अब कसकर ​छुपा लिया है मैंने

स्कर्ट जो घुटनों से उपर तुम्हारे टांगों के बीच जाती थी

अब उसको भी पूरी तरह के कवर कर लिया है मैंने

फिर क्यों ये हर बार होता है

मेरे जिस्म को एक बाज़ार समझा जाता है

सारी हदें फिर की जाती हैं पार

और फिर हैश टेग पर ट्रेंड होता है मेरा नाम

अरे उससे बेहतर किसी पिंजरे में मुझे कैद कर लो

और शराफत का नकाब किसी बेशर्मी के बाज़ार में बेच दो

अपनी मर्दांगी के बडे कायल हो तुम

लेकिन सबसे बड़े कमज़ोर और नामर्द हो तुम

जानती हूं मैं मेरी लाश को कई नाम दिए जाएंगे

दस्तावेज फाइलें पिटीशन खूब दायर किए जाएंगे

जो मेरे लिए सड़क पर उतरेंगे और देंगे धरना

उन्हें ये बेशर्म कहेंगे कानून अपने हाथ में मत लेना

कहां था वो कानून जब मुझे जिंदा गोश्त समझा गया

कहां था वो कानून जब मुझे निर्वस्त्र कर दिया गया

एक नहीं कई बार किया हर बार मेरी आत्मा का कत्ल किया

मैं चीखी, मैं चिल्लाई लेकिन इस कानून के कानों तक मेरी आवाज़ नहीं पहुंच पाई

कभी थोड़ा क्लीवेज दिखने पर टॉप को ठीक करती थी मैं

कभी जीन्स नीचे उतरने पर उसे एडजस्ट करती थी मैं

किसी लड़के को हग करने से पहले थोड़ा सोचती थी मैं

हां अपने आप को लेकर थोड़ी सी प्रोटेक्टिव थी मैं

उस रात जो हुआ वो...

उन गंदे हाथों ने छुआ था मेरे शरीर को

उन हैवानों ने नोंच लिया था सारे बदन को

वहशीपन की हदें कर दी थी पार

मुझे एक जिस्म समझकर कई बार किया बलात्कार

मेरे हर अंग पर राक्षसों की तरह टूट पड़े थे वो

नारी हूं मैं ये शायद भूल चुके थे वो

हर एक पंख को तोड़ा मरोडा और कुचल दिया

मेरे जिस्म को एक खिलौना बना दिया

जिंदा लाश की तरह एक कोने में पडी रही

मेरा सम्मान, मेरी अस्मिता सब दो पल में खत्म हो गईं

ना घाव दर्द दे रहे थे ना आखों से आसूं बह रहे थे

एक लाश थी में जिसके कई हिस्से हो चुके थे

मैं जानती हूं, ये फिर होगा

मेरे साथ नहीं तो किसी और के साथ होगा

लेकिन तुम... तुम केवल सियासत करना

मेरी लाश को हर बार नए नाम देना

ट्विटर पर दुख जताना और इंसाफ की वो पट्टी अपने आंखों पर बांध लेना

उम्मीद... वो तो मैंने कब की छोड़ दी है

उन हैवानों को सज़ा अगले ​जनम में मिलनी है

तुम तैयार रहना मशान लेकर

एक लाश फिर आएगी दिशा नहीं कुछ और बनकर

#unheard_voice

#hangtherapist

#speaking_thoughts

#एक_आवाज़

हैदराबाद की इस वीभत्‍स घटना को लेकर समाज का आक्रोश अब सोशल मीडिया से आगे बढ़कर धरातल पर भी नज़र आ रहा है। हैदराबाद में ही सोमवार शाम को लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया।

Ajit Singh

मेरी बेटी जब 12 साल की थी तो मैंने उसे Boxing शुरू करा दी थी ....... उसकी academy घर से 8 km दूर थी ...... रोज़ाना सुबह शाम cycle से आती जाती थी ....... इस तरह कुल 32 km की तो cycling ही हो जाती थी .......उसके बाद औसतन 4 से 6 घंटे का workout ......हाड़ तोड़ मेहनत .......

दानू पहलवान उससे छोटे हैं 3 -- 4 साल ........वो भी पहलवानी शुरू कर चुके थे और लगभग 90 किलो के भारी भरकम तगड़े पहलवान थे ....... एक दिन दोनों भाई बहन आपस मे मस्ती कर रहे थे ..... हम दोनों तमाशा देख रहे थे ...... बिटिया ने कहा पापा इसको समझा लीजिये नही तो सारी पहलवानी निकाल दूंगी अभी ....... अब दानू पहलवान को भी अपनी पहलवानी का गुमान था ........ वो कहां मानने वाला था ....... सो बात बिगड़ते बिगड़ते बिगड़ गयी ........ और नंदिनी ने एक घुसंड धर दिया पसलियों के नीचे ....... और पहलवान धराशायी ....... पेट पकड़ के रोने लगा ........

ये एकदम सच्ची घटना है ...... हमने नेहा को डांटा ...... इतनी जोर से मारते हैं ??????

वो बोली अभी मारा थोड़े न है .......ये तो बस छुआया है ....... अगर सचमुच मार देती तो पसलियाँ तोड़ देती ....... नाक पे एक पंच पड़ जाए तो 3 दिन खड़ा न हो आदमी .......

हमने यहां सुल्तानपुर लोधी में अपने स्कूल में बाकायदे एक Boxing Coach appoint किया ........ और सभी लड़कियों के लिये Boxing Compulsary कर दी ........ Taekwando तो पिछले 10 साल से चल रही है ...... आज तक मने पिछले 10 साल में सिर्फ 2 या 3 लड़कियों ने Taekwando सीखी कायदे से ....... Boxing किसी ने नही सीखी ........ physical activity में हमने कहा लड़कियों को भी Push Ups लगवाओ ........ Parents ने ही विरोध करना शुरू कर दिया .........

आप लोग ही बताइए ....... इस पोस्ट को 10 -- 20 हज़ार लोग पढ़ेंगे ......आपमे से कितने लोगों की बेटियाँ / बहनें 10 push Up मारी हों कभी ज़िन्दगी में ?????? कभी कोई Physical activity कराई आपने अपनी बेटी को ????? Self defense की कोई game ???????

सिर्फ दो साल एक घंटा रोज़ाना भेज दो Boxing , कराटे , Taekwando , Judo , Wrestling या किसी भी Combat sports में .......

मैं देखता हूँ समाज मे , औरतें लड़कियां छुई मुई , नाजुक , कोमल सी ....... एक रोटी खा / पचा लेने की क्षमता नही ...... फूंक मार दो उड़ जाएं .......

अपनी बेटी को फौलाद बनाओ ........ लड़ने के लिए हाथों में ताकत और मन मे दृढ़ता चाहिए ....... fighting spirit ........ ऐसे खाली पीली प्रवचन देने से नही हो जाता है ...... लड़ने के लिए कलेजा चाहिए ......... किसी को ईंट पत्थर भी उठा के मारना हो तो उसके लिए हाथ में ताकत चाहिए ...... Explosive Strength ..... ऐसे ही नही आ जाती ये strength ....... उसके लिए पसीना बहाना पड़ता है .......

अपनी बेटी को fighter बनाइये ........ जितना समय साज श्रृंगार में लगाती है न , उसका दसवां हिस्सा इस शरीर को मजबूत करने में लगाये ........

Bcoz its a jungle out there .......और वहां कोई नही आएगा बचाने । अपनी रक्षा खुद ही करनी पड़ेगी .......

Anurag Agnihotri

पहले हमें अपनी भूमिका तय करनी होगी......!!

एक बात बताओ, क्या आप आज कुछ नया कर रहे हो? या आज भी आप वही कर रहे हो जो इस तरह की घटनाये घटने पर आप हमेशा से करते आये हो?

वही कर रहे हो न जो कल कर रहे थे? वही नारे लगा रहे हो न जो कल लगा रहे थे? वही हल्ला मचा रहे हो न जो कल मचा रहे थे? राइट.....??

क्यों चिल्ला रहे हो? क्या दिखाना चाहते हो इतना शोर मचा के? यही न कि हम बहुत अच्छे हैं और हमें बड़ी फिक्र है महिलाओं की, राइट...?? ये चीज़ें - ये हालात इस तरह से ठीक होंगे?

दूसरे में क्यों इतना interested रहते हो? दूसरे पर क्यों ज़िम्मेदारी डालना चाहते हो? खुद क्या करोगे तुम? तुम्हारा क्या काम है? We want justice बस यही चिल्लाना तुम्हारा काम है? बस इतनी हीं तुम्हारी काबलियत है?

क्या आप ने कभी अपने आप से पूंछा कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिये -

1. एक पिता होने के नाते मैं क्या भूमिका निभा सकता हूँ?

2. एक माँ होने के नाते मैं क्या भूमिका निभा सकती हूँ?

3. मेरी जो भी और जितनी भी हैसियत है - उस हैसियत से मैं क्या भूमिका निभा सकता हूँ?

4. मैं अपने office में, स्कूल में, कॉलेज में या घर पर, सड़क पर क्या भूमिका निभा सकता हूँ?

5. ऐसा क्या है जो मैं कर सकता हूँ? भले ही वो एक बहुत छोटी कोशिश क्यों न हो - पर क्या कर सकता हूँ, ये सोचा कभी??

अगर आप को वाकई में महिला सुरक्षा की फिक्र है तो इन सवालों के जवाब दीजिये अपने आप को। वरना ये ड्रामा बंद कर दीजिये प्लीज। धन्यवाद......!!

- अनुराग

हिमाँशु महादेव

एक बार बीजिंग शहर के एक मुहल्ले में एक युवती का बलात्कार हुआ।

ये खबर किसी तरह चेयरमैन क्रांतिकारी माओत्से तुंग तक पहुंची। वह खुद पीड़ित लड़की से मिले।

उन्होंने उस लड़की से पूछा "जब तुम्हारे साथ जबरदस्ती किया जा रहा था तो तुम मदद के लिये चिल्लाई थी ?"

लड़की ने हां में सर हिलाया।

चेयरमैन माओ ने उस लड़की के सर पर प्यार से हाथ रखा और नरमी से कहा "मेरी बच्ची! क्या तुम उसी ताक़त के साथ दोबारा चिल्ला सकती हो ?" लड़की ने कहा "जी हां।"

चेयरमैन माओ के आदेश पर कुछ सिपाहियों को आधे किलोमीटर के सर्कल में खड़ा कर दिया गया और उसके बाद लड़की से कहा कि अब तुम उसी ताक़त से चीखो। लड़की ने ऐसा ही किया माओ ने उन सिपाहियों को बुलाया और हर एक से पूछा गया कि लड़की की चीख सुनाई दी या नहीं ? सभी सिपाहियों ने कहा कि लड़की की चीख सुनाई दी गई।

चेयरमैन माओ ने अब सिपाहियों को आदेश दिया कि आधे किलोमीटर के उस इलाक़े के तमाम मर्दों को गिरफ्तार कर लिया जाये और तीस मिनट के अंदर अगर मुजरिम की पहचान न हो सके तो गिरफ्तार मर्दों को गोली मार दिया जाये।

फौरन आदेश का पालन हुआ और दिये गये मुहलत को बमुश्किल अभी दस मिनट ही हुए होंगे कि मुजरिम की पहचान हो गई और अगले बीस मिनट के अंदर-अंदर मुजरिम को पकड़कर चेयरमैन माओ के सामने लाया गया।

लड़की ने शिनाख़्त की, मौक़े पर फैसला हुआ और मुजरिम का भेजा उड़ा दिया गया।

जुर्म से सज़ा तक की अवधि लगभग तीन घंटे की रही होगी। इसे कहते हैं फौरन इंसाफ मिलना जिस कारण आज चीन हर क्षेत्र में प्रगति पर है।

काश कुछ ऐसा ही अपने देश में होता तो शायद बलात्कार की इतनी घटनाएं न होती। पर अपने यहां होता क्या है। अगर पीड़िता ज़िंदा है तो वर्षों तक अदालत का चक्कर और अगर जला दी गई तो उसके नाम पर केवल कैंडल मार्च।

काश, ऐसा फैसला मेरे देश में भी होता...😢😢😢

Ram Janm Pathak

निर्भया कांड के अपराधी भी ट्रांसपोर्ट बिजनेस से थे। ड्राइवर, क्लीनर। हैदराबाद कांड में भी यही लोग हैं। विश्वविद्यालयों में समाज शास्त्र पर डिग्रियां बांटी जाती हैं, लेकिन प्राइवेट ट्रांसपोर्ट यानी ट्रकों, बसों में काम करने वाले लोगों पर कोई अध्ययन नहीं मिलेगा। सिर्फ नागार्जुन ने ट्रक ड्राइवर पर एक अद्भुत कविता लिखी थी, जिसमें ड्राइवर अपनी छोटी बच्ची की चूड़ियां टांगें हुए है। हिंदी में एक मात्र कहानी बिहार के किसी रामा्तार ने लिखी थी "चांदनी रात का जहर"। यह ड्राइवर का क्लीनर के साथ सोडोमी की कहानी है। चौबीसों घंटे का श्रम, गाली-गलौज की जिंदगी। बात ,बात में मारपीट। नशाखोरी। ट्रांसपोर्ट मालिकों से ज्यादा क्रूरता से कोई अपने नौकरों से पेश नहीं आता। यह पूरा बिजनेस ही एक बजबजाती दुनिया जैसा है। हैवानियत का नंगा नाच चलता रहता है। दो मिनट इनके पास खड़े हो जाइए, गालियां सुनकर आपके कान पक जाएंगे। ये समाज से कटे और सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं। पूरा बिजनेस अनैतिकता और असामाजिकता का शिकार है। कोई श्रम कानून नहीं। कोई भविष्य की सुरक्षा नहीं। रातोंदिन पुलिस और आरटीओ की जीहुजूरी, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, यही जीवन है इन लोगों का।

मालिक, सरकारी अफसरों यानी आरटीओ के सताए होते हैं। अफसरों को परिवहन मंत्री को पैसा भेजना होता हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने वाले इंसान नहीं रह जाते। एक क्रूरता, दूसरी क्रूरता को जनम देती है।

Chandrakant P Singh

भारत में बलात्कार: कुछ सवाल

1. क्या बलात्कारियों और बलात्कार-पीड़िताओं का #मजहब, #सम्प्रदाय, #धर्म के आधार पर अध्ययन होना चाहिए ?

2. क्या बलात्कार और मजहब-सम्प्रदाय-धर्म का रिश्ता कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि #आतंकवाद और मजहब-सम्प्रदाय-धर्म का?

3. क्या बलात्कार की बढ़ती घटनाओं और जघन्यता में #मानवाधिकार-समूहों की बड़ी भूमिका हो सकती है?

4. #भारत में बलात्कार का #तरीका पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत ही #क्रूर होता जा रहा है, क्यों?

5. #पश्चिमी_शिक्षा के बावजूद भारत में #बलात्कार_दर यूरोप-अमेरिका से बहुत कम है, क्यों?

6. उपरोक्त सवालों का सबसे अधिक विरोध किस तरह के लोग करेंगे?

#RIPHumanity #QuestionsOnRape #India

Amita Neerav

मैंने पहले भी लिखा था कि बलात्कार कानून और व्यवस्था से उतना नहीं जुड़ता है, जितना हमारे सामाजिक औऱ सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ता है।

इसके बीज जवान होती लड़कियों पर तरह-तरह की पाबंदियों, हिदायतों और नसीहतों से शुरू होकर, पर्दा, बुर्का और दुपट्टों तक जाती है। स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी से लेकर बस-ट्रेन और कार्यस्थल में छेड़छाड़ से लेकर यौन उत्पीड़न तक... घर के छोटे-बड़े फैसलों में उनकी राय की उपेक्षा से लेकर उनके वजूद और उपलब्धियों पर सवाल तक में बहुत गहरे यह बीज ही होता है।

बीज का ही उपचार करना होगा, शाख-फल-फूल-पत्तों को काटने से कुछ नहीं बदलेगा। अपने-अपने घरों में झाँकिए, घर की महिलाओं के लिए आप क्या सोचते हैं यहीं से सब चीजें तय होती है।

स्त्री कोई भी हो अंततः वह मादा ही होती है। बस रिश्तों की मर्यादा से वासना को नियंत्रित करने का उपक्रम किया जाता है। कभी इस बात पर विचार किया है कि क्यों बेटियाँ घूँघट नहीं लेती और बहुएँ लेती हैं?

क्या इसलिए कि वे बहू हैं?

नहीं, इसलिए कि हमारी बेटी हमारी जानकारी के बगैर यदि कहीं और पल रही हो तो वह भी बेटी नहीं मादा हो जाती है, इसी तरह परायी बेटी जो कि आपके घर की बहू है वह भी मादा ही है। तो रिश्तों की मर्यादा बनी रही इसलिए जरूरी है कि वह पर्दे में रहे।

फिर से यह मामला स्त्री-पुरुष का प्रतीक रूप से हैं, यह मूलतः शासक औऱ शासित का मामला है, सत्तावान और सत्ताहीन का मामला है...

घरेलू सहायक से बलात्कार किया जा सकता है, यदि बॉस महिला हो तो नहीं। इसलिए कि घरेलू सहायक पर आप अपनी सत्ता और ताकत सिद्ध कर सकते हैं। बॉस की सत्ता को आप चुनौती नहीं दे सकते हैं। तो घूम-फिर कर मामला फिर वहीं आ पहुँचा है सत्ता...

सत्ता जो समाज ने, संस्कारों ने पुरुषों को सौंपी है। एक पुरुष बिना कुछ किए भी सत्तावान होता है। स्त्री को सत्तावान होना तो दूर खुद को सिद्ध करने के लिए ही न जाने क्या-क्या करना होता है। तब भी समाज मानते हुए यह जरूर कहता है कि स्त्री को सब आसानी से हासिल हो जाता है।

एक स्त्री जानती है कि उसे कुछ भी हासिल करने के लिए कितना संघर्ष करना होता है। पढ़ाई-लिखाई में जीरो भाई को बाईक, जेबखर्च आवारगी करने के लिए पेट्रोल औऱ देर रात तक घर से बाहर रहने की इजाजत... पढ़ती-लिखती बहन के हिस्से घर के काम और पड़ोसी-रिश्तेदारों की पैनी निगाह... कमाऊ बेटे के सब गुनाह माफ और काम करती बहू को परिवार और परिवार की इज्जत से लेकर रहन-सहन तक की हजार हिदायतें.... यहीं से ये भेदभाव शुरू होता है।

पुरुष स्वाभाविक रूप से सत्ता का अधिकारी हो जाता है। वह परंपरा से यही देखता है। यही वह महसूस करता है। स्त्री कमजोर है, सामाजिक-सांस्कृतिक और शारीरिक रूप से पुरुष से कमतर है।

जो कमतर होगा वह शासित होने के योग्य होगा और जो शासित होगा वह हर तरह से भोग्य भी होगा...।

Amita Neerav

आप इसे regressive कह सकते हैं, लेकिन बार-बार लड़कियों पर पाबंदी लगाने वाले सही सिद्ध होते हैं। लड़कियों के माता-पिता उनके शुभचिंतक सही सिद्ध होते हैं।

हर बार स्थापित मान्यताएं सही हो जाती है, बदलाव-क्रांति का विचार झूठ। ये समाज स्त्री की स्वंतत्रता को नहीं सह पायेगा। आने वाले 100 सालों तक नहीं।

क्रांतियां पुरुषों को करने दो लड़कियों।

तुम अपनी जान बचाओ।

तुम्हारी जान की कीमत पर स्वतंत्रता बहुत महँगी है।

सूरज ढलने के बाद सुरक्षित रहो। घर में भी सतर्क रहो।

धरती का कोई कोना आपके लिए सुरक्षित नहीं है।

स्तब्ध हूँ, अवाक भी

Chetan Sharma

मर्द ये तो कहते हैं कि औरत जात महफूज नही!

मगर ये कोई नही बतलाता किसकी वजह से?

छोड़ कर मांगना इंसाफ जहां से अब हमें लड़ना होगा,

ऐ वहशत के दरिंदो अब तुम्हे मरना होगा,

सो रही है सियासत अब हमें ही कुछ करना होगा,

शांति बहोत हो चुकी अब हिंसा के रास्ते से ही गुजरना होगा,

ऐ वहशत के दरिंदो अब तुम्हे मरना होगा,

In my way we should not ask justice for any rape victim, just find those bloody rapist and kill them brutally how they do to those innocent girls.

Pramendra Thakur

वो तस्वीर हमारे देश और सर्वसमाज के लिए शर्म से गडा देने वाली तस्वीर है

क्या बेटियां इस देश में सुरक्षित नहीं है

क्या बेटियों का सडक पर निकलना भी गुनाह हो गया है

क्या बेटियों को सात पर्दो के भीतर रखे हम

बेटी प्रीति (बदला हुआ नाम) हम सब तेरे गुनहगार है

अब देश में ऐसे कानून की जरूरत नहीं है जिसमें इंसाफ होने मे महीनों नहीं लगना चाहिए

बल्कि ऐसे कानून की जरुरत है कि इन्हें तत्काल ऐसी सजा मिले जिससे ऐसे हैवानों की रूह कांपे

बिटिया हम सब शर्मिंदा है क्योंकि तेरे कातिल दरिंदे जिंदा है

Pooja Singh

हम मनोरोगियों के देश में रह रहे हैं। इतनी क्रूरता, ऐसी जघन्यता! गुनहगारों का भी तो घर- परिवार होगा। जैसे निर्भया के दोषियों का था। क्या यह केवल मौके की बात है? क्या उनके आदमी से हैवान बनने के लिए रात और अकेली लड़की ही काफी हैं। इस हैवानियत के बाद वे घर गये होंगे? अपनी बेटियों के माथे हाथ फेरा होगा? अपनी पत्नियों को गले लगाया होगा? अपनी मां से मुस्कुरा के मिले होंगे? या फिर उनको देख कर भी उनके मन में वैसे ही ख्याल आते होंगे?

क्या देर रात सड़क पर खड़ी लड़की को जीने का भी हक नहीं?

Sarang Upadhyay

हमारी सारी सामाजिक चिंताएं और हमारी संवेदनाएं सोशल मीडिया के उस खाली स्टेटस में कैद होकर आभासीय हो गई हैं, जिसमें लिखा होता है- What's on your Mind? और यकीन मानिए, हमारे दिमागों में दिन-रात गूंजता यह आप्त वाक्य हमारी आत्मा में भी धंस गया है और हमारे जवाब इन वहशी, दर्दनाक और विभत्स घटनाओं के रूप में सामने आते हैं।

कितने दर्द सहे होंगे कितनी सबकी प्यारी होगी

क्रूर काल से लड़ते-लड़ते अंतिम क्षण में हारी होगी

सब संस्कार अब व्यर्थ हुए स्थितियां सब दर्शाती हैं

जैसी कितनी बेटी प्रतिदिन मारी जाती हैं।

©️😢अविरल शुक्ला लखीमपुर-खीरी

#HangTheRapist

Syed Kashan Aarzoo

आप इसे regressive कह सकते हैं, लेकिन बार-बार लड़कियों पर पाबंदी लगाने वाले सही सिद्ध होते हैं। लड़कियों के माता-पिता उनके शुभचिंतक सही सिद्ध होते हैं।

हर बार स्थापित मान्यताएं सही हो जाती है, बदलाव-क्रांति का विचार झूठ। ये समाज स्त्री की स्वंतत्रता को नहीं सह पायेगा। आने वाले 100 सालों तक नहीं।

क्रांतियां पुरुषों को करने दो लड़कियों।

तुम अपनी जान बचाओ।

तुम्हारी जान की कीमत पर स्वतंत्रता बहुत महँगी है।

सूरज ढलने के बाद सुरक्षित रहो। घर में भी सतर्क रहो।

धरती का कोई कोना आपके लिए सुरक्षित नहीं है।

स्तब्ध हूँ, अवाक भी

Geeta Yatharth

तुमने जब जब भरोसा किया,

तुम जब जब लूटी गई,

सुनो!

तुम भरोसा मत करना,

मर्दों के इंसान होने का,

तुम भरोसा मत करना,

मदद वाले हाथों का.

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा!

तुम सनकी कहलाओगी,

तुम नेगेटिव कहलाओगे,

तुम्हे जब नहीं फसा पाएंगे वो अपने जाल में

तो तुम बुरी चालाक कहलाओगी,

पर

तुम मत करना भरोसा

राह चलते, इंसानी से दिखने वाले दरिंदो का

शायद

इस तरह तुम किसी दिन किसी की चाल समझ जाओगी,

उस चाल में फसने से पहले,

शायद!!!

हर बार तुम आंखे कान खोलकर रखना,

हर बात को चार बार सोचना,

चार तरीकों से सोचना,

साधारण सी दिखने वाली हर घटना को,

चालाकी तुम किसी की समझना,

क्योंकि कुछ साधारण नहीं है हम औरतों के लिए,

इस तरह शायद!

बच जाओ कभी किसी शिकारी के शिकार से,

शायद!! शायद!!

तय नहीं है तुम्हारे बचने का कोई रास्ता,

फिर भी बच सकने की तुम जुर्रत करना!!

Ruba Ansari

एक 27 साल की पढ़ी लिखी खूबसूरत लड़की का गैंग रेप करके जला दिया गया

जब ऐसी घटनाए पढ़ती हूँ तो कुछ देर के लिए कुछ भी सोच नही पाती... शरीर से जान कुछ देर के लिए निकल सी जाती है... दिमाग कुछ देर के लिए ठहर जाता है... मैं अंदाज़ा लगाने की कोशिश करती हूँ एक लड़की होने के नाते.... कैसी कैफियत रही होगी उसकी... मेरे रोंगटे खड़े होने लग जाते हैं... मेरी कल्पनाएं कहीं अटकने लग जाती है... मेरे हाथ पैर कांपने लगते हैं... मेरे शब्द मेरी ज़ुबान पर आने से मना कर देते हैं

जब चेहरा देखती हूँ बलात्कारियों का.... तो अपने आस पास से गुजरने वाले तमाम चेहरे उसमे मिलते जुलते से प्रतीत होने लगते हैं... एक अनजान सा भय खुद ब खुद जन्म ले लेता है कहीं भीतर... सड़कों पर अल्हड़ मनमौज से चलने वाले कदम, अचानक संभाल कर चलने लगते हैं... दुनिया का नज़ारा करते हुए चलने वाली नज़रे, किसी अनहोनी के डर से अपने आसपास के माहौल पर अटक जाती हैं... ज़हन, खामोश सड़को की बेलौस ठंडी हवा को ठहर कर महसूस करने के बजाए सिमट कर चौकन्ना हो जाता है.... मैं महसूस करने लगती हूँ हादसे से पहले होने वाले डर को... और घर पहुंच कर शुक्र करती हूँ सही सलामत पहुंच जाने का... फिर सोचती हूँ "लेकिन कब तक?...."

#HangTheRapist

जानवरों की डॉक्टर थी वो

लेकिन😎☝🏾

इंसानों के अंदर छुपे जानवर को

नही पहचान पाई👆🏌

😓😓😓

🤘🤬😡😎

Vidhi Vidhatri Bodhdatri

हमारी आर्यवर्त संस्कृति इतनी हल्की,ओछी,मैली,कुचैली, तो कत्तई नही थी कि स्त्री अस्मिता का नृंशसय पतत हुआ हो अपेक्षा पुरूष हुंकार उठे के एवज़ (प्रतिफल) में हम मात्र मोमबत्ती जुलूस तक सीमित रह गए ।

यह कौन गुमराह कर रहा है, "जिस पुरूष को रक्षक बनकर (साम,दाम,दंड,भेद) अपमान का मान रखना था। आज वहीं पुरूष समाज में इतना भीरु कैसे हो गया" ?

नारी सम्मान को लेकर पुरूष नितांत असंवेदनशील कैसे हो गया ?

जिस संस्कृति की परिपाटी में नारी सम्मान में वीर पुरूषों ने दिग्गजों का आकाश पाताल एक कर दिया हो। "रामायण" महाभारत जैसे जीवंत,ज्वलंत,प्रसांगिक युद्ध हो गए ।

उस देश में स्त्री अपनी अस्मिता को ढ़ोती हुई दर-दर भटक रही है ।

धिक्कार है ! न्याय के शीर्ष पर आरूढ़ ,

न्याय की अस्मिता को प्रतिदिन तार तार करने वाले न्यायदाताओं को ।

धिक्कार है ! समाज की खोखली शांतिप्रिय न्यायिक व्यवस्था को ।

धिक्कार है ! भीरु पुरूष होने पर ,

मेरी जैसी प्रत्येक स्त्रियाँ अपना कृष्ण कहाँ ढूढ़े ??

#HangTheRapist

पिन्टू पण्डित

सुनसान सड़क पर एक लड़की की स्कूटी पंक्चर होगी तो ये हश्र होगा उसके साथ ? डरिए कि ऐसे समाज में ऐसे हैवानों के बीच रहते हैं हम जो मुश्किल में फंसी हमारी बहन-बेटियों पर बस मौके की तलाश में घात लगाए बैठे हैं।

हैदराबाद की डॉक्टर की स्कूटी बुधवार रात घर जाते समय शमसाबाद में पंक्चर हो गई, अगले दिन गैंगरेप के बाद उनका जला हुआ शरीर मिला। ना मीडिया को खबर और ना ही सरकार को। हो भी कैसे सब मदमस्त है।

ऐसे अपराधियों को पकड़कर क्या आप न्याय दे पाओगे?

ऐसे दानवों के लिए सज़ा-ए-मौत भी कितनी कम है।

हैदराबाद की इस बहन को न्याय मिलना चाहिए।

Garima Mishra Katyayan

बलात्कार के प्रकारों पर भी चर्चा का समय आ चुका है। लेकिन शुरू कौन करें...आखिर बचा ही कौन है इससे अब...कोई शिकार कोई शिकारी

शारीरिक बलात्कार की तो इंतहा हो चुकी है, शायद ही निकृष्टता की कोई सीमा शेष हो। और अब मानसिक बलात्कार की एक विधि भी आकार ले रही है। ये भविष्य के बलात्कारियों की नर्सरी बन रही है।

एक सिनेरियो है कि लड़के ने लड़की को प्रेम-प्रस्ताव दिया, लड़की ने ठुकरा दिया। तो अब उस लड़के द्वारा जो कृत्य आरंभ होगा, कौन जाने कि कल वो बलात्कार पर ही ख़त्म हो। लड़का उस लड़की को “तुम तो ऐसी ही थीं” कहता है, और फिर धीरे धीरे उस लड़की को “नगरवधु” के स्तर पर जाकर बदनाम करने लगता है।

मने कल तक जो लड़की "सीता" की संज्ञा से विभूषित थी आज "पता है तुम कैसी थी" पर आकर अपनी प्रेम यात्रा पूर्ण करती है।

ऐसे विकसित हो रहे बलात्कारियों से ये समाज कैसे बचेगा?

क्या उनमें किसी को भविष्य के संभावित बलात्कारी नहीं दिखते

ऐसा लगता है कि विपरीत-लिंगियों के आपसी सम्बन्ध बलात्कार के स्कूल होते जा रहे हैं। सर्वप्रथम इन्हें सुधारने की आवश्यकता है।

उसके लिए कितने प्रयास किये गए...

कितनी ही बार ये नहीं कहा गया कि बातचीत इस स्तर तक पहुँची कैसे

कितनी ही बार उस लड़के के आंसुओं को लड़की के चरित्र लिखने की स्याही नहीं बनाया गया।

कितनी ही बार ऐसे बेशर्मों को अपने कृत्यों पर शर्म आयी

यकीन मानिए ...इन्हें कभी नहीं आएगी

"अगर आ गई तो मर्द कैसे"

आखिर हर "मर्द" की किस्मत में "पुरुष" बनने का राजयोग थोड़े न होता है।

गरिमा मिश्रा कात्यायन

Laxman singh dev

चीन के समान अगर जघन्य अपराध करने वालो को स्टेडियम में जनता के सामने ,गोली मार के म्रत्यु दण्ड दिया जाए तो यौन हिंसा के मामलों में भारी गिरावट आएगी।लेकिन भारत सम्भवतः ऐसा होगा नही क्योंकि निर्भया कांड मिसाल है।उसके हत्यारो को अभी तक फांसी नही हुई।


Sunanada Jain Anaa

#रेप

रेप सुन कर ही मन सुन्न हो जाता है न ? पर करने वालों का नहीं होता। ये जो नहीं शब्द है न यहाँ इसी को मारने की ज़रूरत है।मगर होता क्यों है ? ऐसी कौन सी मानसिकता है जो सज़ा का प्रावधान होने के बाद भी अपराधी को डर नहीं लगता ? क़ीमत कौन चुकाता है ? वो समाज जिसमें ये अपराधी पनपते हैं ? या सरकार जो अपराधियो को डराने में असक्षम है ?या फिर मुर्दा लोग ? चुकाते हैं पीड़ित के घरवाले और पीड़ित ख़ुद यदि बच गई तो।

यदि मानसिक तौर पे विष्लेषण करें तो ज़्यादातर अपराधी कमज़ोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं, और उम्र भी कम 16 से 25 के दरमियाँ । आज भारत न तो पिछड़ा है,न ही विकसित। यानी कि बीच में है। वैसे ही कल्चर भी बीच में है। यानी आधा खुला, आधा ढका। और यहीं आधा झांकने को मजबूर करता है। फिर चाहे वो पोर्न हो,पर्दा हो या आधा खुला शरीर। यदि हर जगह यूनिफार्म तरीक़े से हो तो इतना गंद नहीं होगी। पर ऐसा नहीं है। जहाँ लड़के- लड़कियां साथ हैं,तो लड़की को लेकर इतना दिमाग़ बीमार नहीं कि उसकी देह से ऊपर कुछ सोच ही न पाएं। लेकिन जहाँ लड़कियां दोस्त नहीं हैं, वहाँ देह को लेकर एक पागलपन है। ऐसे में एक सॉफ्ट टार्गेट की तलाश मानसिक तौर पर बनी रहती है। और जैसे ही वो सामने दिखी उसे शिकार बना लिया जाता है।

क्यों ज़रूरत होती है हर जगह सही सोच की ? घर में पिताजी का मां के साथ बुरा बर्ताव बेटे को बुरा तो लगता है लेकिन समय के साथ उसे नेचर का हिस्सा मान लिया जाता है। समयांतर के साथ लड़के यहीं बर्ताव अपनी पत्नी के साथ अनजाने में करते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी यही चलता है। यानी कि औरत के साथ बुरा बर्ताव बुरा नहीं ? इसके बाद किस इज्ज़त की बात उससे की जा सकती है? फिर यही समाज दूसरी लड़की को कैसे इज्ज़त देगा ? उसे पशु समझेगा। ( यहाँ बात आपराधिक पृष्ठभूमि के घरों की हो रही है)।

बिना सही मार्गदर्शन के बच्चे बाहर आते ही ग़लत संगत में पड़ जाते हैं। इसके साथ ही मीडिया में अधकचरा जानकारी, आईटम सांग,अश्लील सामग्री, नशा बुद्धि पे पर्दा डाल देते हैं।( उल्लेखनीय है कि कानून की ढीली व्यवस्था हर अपराधी को इस सोच का मौका देती है कि वो पकड़ा नहीं जाएगा। ) रात दिन इसी सोच में लिप्त ऐसे ही लड़के फिर रेप जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देते हैं। और अपराध छुपाने के लिए लड़की की हत्या,उसे जलाना,मुँह कुचलना तक कर गुज़रते हैं।

तो क्या ऐसे ही समाज में जिया जाए या इसपे कोई रोक नहीं लग सकती तो लड़कियों पे ही पाबंदियां लगाई जाएं ..?

#नहीं_रास्ता_दूसरा_भी_है।

कुछ सालों पहले तक एड्स एक भयावह बीमारी फैली थी, इसके चंगुल से मुक्त होने सरकार ने एक मुहिम छेड़ी। जैसे आज शौचालय को लेकर मुहिम छिड़ी है। सैनेट्री पैड्स को लेकर मुहिम। ठीक वैसी ही मुहिम रेप के खिलाफ़ क्यों नहीं छेड़ी जाती ? एक बच्चे से लेकर बड़े होने तक के बीच उसकी मानसिकता को स्वच्छ बनाने कोई अभियान क्यों नहीं चलाया जाता ? शुरू में लगेगा कि क्या बोला जा रहा है ? पर आज सफाई को लेकर जागरूकता आई है न ? ये कहा जा सकता है कि दोनों अलग चीज़ें हैं ? पर दिमाग़ तो एक ही है न उसपे लगातार उकेरी गई पिक्चर कहीं तो असर दिखाएगी ? बिजली,पानी बचाओ अभियान चलाया जाता है तो घर के बच्चे स्विच ऑफ कर देते हैं या सिंक में नल बंद कर देते हैं। तो ये न मानना बेवक़ूफ़ी है कि असर नहीं होता।

रेप को लेकर घर,समाज,सरकार संविधान,सोशल मीडिया तक लचर है। जिस दिन रेप होता है उसके अगले एक दो दिन हो हल्ला होता है और फिर वही सब। रेप को लेकर कोई भी शोर शराबा ठंडा क्यों पड़ जाता है? क्यों अगले रेप तक सारा विरोध,कैम्पेन साइड कर दिया जाता है? प्रहार हो तो तब तक हो जब तक शत्रु मर नहीं जाता।

सुनंदा

Shashi Bhooshan Dwivedi

हम सब मानसिक रूप से क्रिमिनालाइज्ड हो चुके हैं। बड़े बड़े विद्वान, लेखक, कवि सब तात्कालिकता में पगला जाते हैं। रेप और हत्या का मामला सच में गंभीर है लेकिन अब तक ऐसे मामलों में 58 लोगों को फांसी हो चुकी है।लेकिन ये वे मामले थे जिनमें अपराधी कमजोर था। जो ताकतवर थे उन्हें कभी कोई सजा नहीं हुई। ऐसे मामलों में कुछ लोग तो संगसारी की भी माँग कर रहे हैं। सत्ता भी यही चाहती है कि हम वहीं पहुंच जाएं। निठारी कांड क्या था ? बेसिकली किडनी रैकेट जिसमें तमाम बड़े नेता और माफिया शामिल थे। फंसा कौन सुरेंद्र कोली जिसे कई मामलों में फाँसी हो चुकी लेकिन उसे फांसी नहीं हो पा रही। जानते हैं क्यों उसने एक सवाल पूछ लिया कि जिस नाले में हड्डियां बरामद हुईं उसकी सफ़ाई कब से नहीं हुई? सरकार कैसे माने कि सफ़ाई नहीं हुई और अगर सफ़ाई हुई तो जाहिर है कि हड्डियां लाकर डाली गईं। ख़ैर ये क़ानूनी पेंच है। सरकार ने पहले ही कह रखा है कि अपना ख्याल खुद रखें।

Niraj Kumar Shukla

हे ईश्वर ! तू न देना # उसकी आत्मा को शांति...

शीर्षक पढ़ कर चौंकिए नहीं, इसमें कतई गलती नहीं हुई है। यहां वही लिखा है जो मैं दिल से चाहता हूं। जी हां, मैं चाहता हूं कि #डॉक्‍टर की आत्मा को शांति न मिले। उसे तब तक चैन न आए जब तक कि उसका जिस्म नोचने वाले और जिंदा जलाने वाले नरपिशाचों की रूह न कांप जाए। उसकी आत्मा तब तक बेचैन ही रहे जब तक कि इस देश की सर्वोच्च संस्था #संसद ऐसे दरिदों को चौराहे पर गोली मारने या फिर नपुंसक बनाकर जिंदगी भर के लिए अपने आप पर शर्मिंदा होने के लिए छोड़ने जैसा कानून न बना डाले।

#डॉक्‍टर मैं तुम्हारी याद में न मोमबत्ती जलाऊंगा न ही तुम्हारी तस्वीर पर फूलों की माला चढ़ाऊंगा, क्योंकि मुझे ऐसा करने का कोई अधिकार ही नहीं है। मैं तो #महात्मा_गांधी के उन तीनों बंदरों का ही प्रतिरूप हूं जो न तो बुरा होता हुआ देखता है, न ही बुरा सुनता है और न ही बुरा हो जाने पर कुछ कहता है। मैंने बांध ली है अपनी आंखों पर अनदेखी की पट्टी, ठूंस ली है कानों में उंगलियां और सिल लिए हैं अपने ओठ। मेरी आंखें सिर्फ तभी खुलती हैं जब मजहबों की पहचान करनी हो, कान भी तभी सुनते हैं जब #राम और #रहीम में फर्क करना हो और ओंठ भी #महात्मा_गांधी और #नाथूराम_गोडसे को सही अथवा गलत ठहराने के लिए ही हिलते हैं।

#मैं तो #सोशल_मीडिया वीर हूं। मुझे जिसे #वाट्सएप, #फेसबुक, #इंस्टारग्राम और #ट्विटर रूपी रणभूमि पर #पाकिस्तान पर हवाई टैंकों से जुबानी गोले बरसाना भर आता है। मैं #भगवान_श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर बनाने की राह की बाधा दूर करने वाले #सर्वोच्च_न्यायालय के फैसले से तो उत्साहित हूं लेकिन #स्त्री की उस मर्यादा की रक्षा करने में सक्षम नहीं हूं जिसे उसी #सर्वोच्च_न्यायाल ने #स्त्री_का_पवित्र_मंदिर बताया है।

कल दिल्ली में एक #निर्भया हुई थी, आज तुम बन गईं, कल कहीं फिर कोई #निर्भया बनेगी। मैं तो बेशर्मी की चादर ओढ़े ही हूं, एक बार फिर से कह दूंगा- रेप तो होते रहते हैं, इसमें नया क्या है। रेप उन्हीं लड़कियों के साथ होता है जो कपड़े कम पहनती हैं। मैं लाचार हूं, कमजोर हूं, हालत के आगे मजबूर हूं। मैं सिर्फ बातें कर सकता हूं, दूसरों पर हंस सकता हूं और वक्त आने पर अपनों के लिए रो सकता हूं। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना है- #डॉ_ की आत्मा को भटने दो, उसे अपना इंसाफ खुद ही करने दो।

नोट- यहां उपयोग किया गया चित्र आपको विचलित कर सकता है, विचलित होना भी चाहिए। इस चित्र को देखकर कल्पना करिए कि यह आप की बहन या बेटी है। कुछ भी कहिए मत, सिर्फ महसूस कीजिए कि हम क्या थे, क्या हो गए हैं। काश ! पशु चिकित्सक #डॉ इंसान के रूप में उसके सामने आए जानवरों का इलाज कर पाती।

Kumari Vandana

कुछ लोगों को दर्द नहीं होता, खुशी या दुख इस बात की होती है कि घटना उनके एजेंडे के अनुकूल है या नहीं। नहीं है तो किस तरह से झूठ गढ़कर इसे अपने एजेंडे के अनुकूल बनाया जा सके। और कुछ लोग मुँह में दही जमा लेते हैं एजेंडे के अनुकूल न होने पर

Abhishek Kashyap

आज की घटना से बहुत आहत हु, एक बेटी जिसके बहुत अरमान होंगे, कितने नाजो से पली होगी, मेहनत करके यहा तक पहुंची, लेकिन बहशी कमीनो ने सब छीन लिया, पता होते हुए भी की वो खतरे मै है पूरा सिस्टम सोता रहा, अच्छा हो ऐसे लोगो के साथ साथ उनको भी faansi हो जिन्होंने ऐसे कमीने पैदा किये, ये चंद लोगो का काम नही है वरना उसकी जान बच सकती थी, अगर आस पास के लोग और पुलिस मदद करती , इसके दोषी सिर्फ वो सुअर नही है वो सब है जो समय रहते उस masoom बेटी की मदद नही कर पाये साथ मै पूरा सिस्टम, कही न कही ये बहशिपना इनको सिखाया जाता है वरना ऐसा काम करते समय इंसान भी रो दे, ये सिर्फ और सिर्फ दानव है जिनका अंत अब बिना वोट बैंक की चिंता और राजनिति किये बगैर किया जाना चाहिए, बहुत ही दुखद दिन है आज का सभी देश के लिए, जहा महिला को देवी माना जाता है😫😫😫😑

#HangTheRapist

Manisha Kulshreshtha

निर्भया कांड में क्षमा याचिका को खारिज करने का किसी राष्ट्रपति के पास समय नहीं????? बात वहीं अटकी है। हद है न??? इनके पास वी आई पी विज़िट्स का समय है। जहां इनके जाने पर सफाई और मंच और टैंट के नाम पर बस पेड़ कटते हैं।

#HangTheRapist

#HangTheRapist

#HangTheRapist

"जब महिलाएं रात के 12 बजे अकेली बिना डर के घुम सकेंगी तब मुझे यकीन होगा कि हमारा समाज सभ्य बन गया है।"

रामास्वामी पेरियार

स्त्री देह इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है।

स्त्री देह भी एक सामान्य देह है, जैसे पुरुष की| न जाने क्यों स्त्रियों की देह को कुछ अजूबा-सा मान लिया गया| जहां पुरुषों को अपनी जैविक संरचना पर गर्व की अनुभूति हुई, वहीं स्त्री को शर्म की|

पुरुष अपने खुद को स्त्री से उच्च मानने लगा| स्त्रियाँ बचपन से ही अपनी देह को छुपाने का उपक्रम करने लगीं, वहीं पुरुष बेहद धृष्टता से उसे उजागर करने का| स्त्री की शर्म और संकोच पर पुरुष ने अपने गर्व का शिकंजा कसा, उसकी शर्म को तार-तार करना सबसे बड़ा हथियार बना लिया| इसी के चलते स्त्री की अपनी देह उसके लिए पहली मुश्किल बनी| उसकी सारी समस्याएँ उसकी देह को लेकर शुरू हुई| उसके जन्म के साथ ही घरों में उदासी का आलम छाने लगा|

स्त्री को देह के इर्द-गिर्द समेत देना समाज की पहली साज़िश है| पहले उस पर शर्म के, हया के बंधन, फिर शारीरिक अक्षमता का बहाना करके उसकी सुरक्षा का ठेका अपने नाम करने की साजिश|

पिता, भाई, पति, पुत्र सब स्त्रियों के रक्षक बनें| रक्षक भी पुरुष और शिकारी भी पुरुष यानी एक पुरुष दूसरे पुरुष से बचाने के लिए आगे आया, वरना स्त्रियों से तो कोई खतरा था ही नहीं| वह खतरा बाद में पैदा हुआ जिसे पितृसत्ता ने ही पैदा किया,फिर एक पुरुष को जब दूसरे पुरुष से बदला लेना हुआ, आक्रोश व्यक्त करना हुआ तो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनीं वो स्त्रियाँ जो उस पुरुष के अधीन थीं| यहां भी स्त्री देह ही निशाने पर थी|

स्त्री देह तो इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है| ऐसा लगता है कि यह न हो तो कोई दिक्कत ही न हो| सारे फरमान उसकी देह को लेकर जारी किए जाते हैं, सारे नियम उसकी देह के लिए बनते हैं, सारी नैतिकताएं, संस्कृतियाँ, सभ्यताएं वह अपनी देह के भीतर पाल रही है, बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस स्त्री की देह को लेकर इतनी साजिशें चल रही हैं, उसी देह में रहने वाले दिमाग को एकदम नकार दिया गया| उसे पनपने ही नहीं दिया गया| उसका दिमाग चला तो उसे चाँद-तारों की शायरी में उलझाया गया| उसके होंठ, उसकी आँखें, उसकी चाल, उसका रंग, उसके बाल-इन चीजं पर इतना फोकस किया गया कि वह बस पावं में पाजेब और आँखों में काजल लगाने में ही मशगूल रही है।

लड़कियों का अच्छा या बुरा होना उनकी सुंदरता और शालीनता (जिसका एक मात्र अर्थ ख़ामोशी से सब कुछ श लेना होता है) पर ही निर्भर करता था और करता है| कोई नहीं कहता कि उसे समझदार बहू चाहिए, कहीं किसी शादी के विज्ञापन में यह नहीं लिखा होता है कि लड़की का गुणवान होना ज़रूरी है| हर जगह सुंदर, शिक्षित, शालीन लड़की ही चाहिए| शिक्षा के दायरे कुछ ऐसे रचे गए कि शिक्षित स्त्रियाँ भी असल में शिक्षित नहीं हो पाई| आज भी अधिकतर जो सोचती हैं, वह वे सोचना नहीं चाहतीं, वैसा उन्हें सोचने को कहा जाता है यानी हाइजैक्ड थिंकिंग|

यतींद्र आश्रम

Vaishnavi Laxakar

इस बार वो किसी पुरुष मित्र के साथ नहीं थी और न ही रात को फ़िल्म देखकर लौट रही थी.. लेक़िन फ़िर भी उस पढ़ी लिखी सशक्त महिला डॉक्टर की ग़लती एक जाहिल असंवेदनशील मंत्री जी ये कह कर निकाल रहे हैं कि महिला डॉक्‍टर को उस ख़तरे और डर के दौरान फोन अपनी बहन को नहीं बल्कि पुलिस को करना चाहिए था... अपनी नाकामी का ठीकरा तेलंगाना के मंत्री तालासनी श्रीनिवास यादव उस बेगुनाह पीड़िता पर फोड़ने से पहले आपको जान लेना चाहिए था कि अगर कोई आपकी कानून व्यवस्था के बीच किसी डर और आपने साथ हो सकने वाली अनहोनी से आशंकित है तो ये आपका फेल्यर है... अगर ख़ौफ़ज़दा होते हुए भी वो लड़की पुलिस को फोन करने के बजाय अपनी बहन को फोन कर ख़ुद को ज़्यादा महफूज़ महसूस करती है तो ये भी आपका फेल्यर है... और अफ़सोस... बेहद अफ़सोस कि वो डर जिससे वो पहले ही डरी हुयी थी उसकी कल्पना से भी ज़्यादा भयावह तरीके से उससे साथ घट जाता है तो दोष उस पीड़ित लड़की का बताने की बेशर्मी करने वाले मंत्री जी ज़रूरत आपको इस्तीफ़ा देकर घर में मूँह छिपाकर दुबकने की है... क्यूंकि ये सिर्फ़ और सिर्फ़ आपका फेल्यर है... महाफेल्यर है....

#HangTheRapist

साधो,ये मुर्दों का देश।

समाज ,समाज सब बकवास है।

क्या सोच बैठे है आप सबकी लड़किया सुरक्षित है। बहुत बड़ी गलतफहमी में है। चुप रहिए मुर्दा जिस्म के साथ तमाशा देखिये ,आपके बीच मे हैवान है एक दिन नोच लेंगे,आप जानके भी मौन रहिए। क्योंकि बोलके बुरा क्यों बने , ये अच्छा बनने का ढोंग एक दिन कुछ बहुत अच्छा न बता जाए।समाज नामक संस्था अब सिर्फ चुनिंदा ठेकेदारों की जेब मे है,जो अपने हिसाब से चला रहे सारे नियम कानून को ताक पे रख के, उनसे उम्मीद करना भी बईमानी है, सबकी अपनी नेतागिरी अपने चमचे । मुर्दा लोग है जो अब किसीं काम के नही।

ट्विटर पर आज की टॉप ट्रेंडिंग है एक युवा-खूबसूरत ही नहीं कर्मठ पशु चिकित्सक। तेलंगाना की युवती जो रात नौ बजे अपनी ड्यूटी से वापस आ रही है। स्कूटी पंचर देख, अपनी बहन को फोन करके कहती है...स्कूटी खराब है, डर लग रहा है। बहन, उस जगह से हटने और कैब लेने के लिए कहती है। कुछ देर में वह फिर अपनी बहन को फोन करके कहती हैः कुछ लोग मदद के लिए आए हैं। मैं देखती हूं।

छोटी बहन वापस फोन लगाती है...फोन स्विचऑफ....अनर्थ की आशंका और यह शंका-आशंका अब उसकी बहन और उनके परिवार के लिए जीवन भर का झुलसता दर्द है। अब वे रोज उस दर्द की आग को महसूस करेंगे जिसमें उनकी होनहार-काबिल-सुंदर-डॉक्टर बहना-बिटिया का सामूहिक बालात्कार कर जिंदा जला दिया गया। हम हर बार शोक मनाते हैं....मोम्बत्तियां जलाते हैं...ट्विटर पर हैशटेग को टॉप ट्रेंड कराते हैं....सोशल पर रोते हैं...चिल्लाते हैं ....फिर अपने-अपने दायरे में सिमट जाते हैं। इस बार हैशटेग बदल ही जाना चाहिए....हमेशा के लिए...हमें अपने 'समाज को ही रेस्ट इन पीस' लिख देना चाहिए। जाए किसी 'कब्र में दफन' हो जाए।

😠 सोचिए ना, एक पढ़ी-लिखी काबिल युवती सिर्फ स्कूटी पंचर होने से डरने लगती है....क्यों....हम सब समाज में रह रहे हैं।

😠सोचिए ना, कुछ लोगों का समूह मदद के लिए आता है, वह विश्वास में आ जाती है...क्यों...हम सब समाज में रह रहे हैं ना।

😠कुछ लोगों का वह समूह दरिंदगी की हर हद पार करता है....क्यों....फिर वही हम समाज में ही रह रहे हैं ना।

यह समाज, यह समूह किस काम का...क्यों ना इसे दफना दिया जाए। रेस्ट इन पीस कहकर...क्योंकि आज फिर जब हम सब मातम मना रहे हैं....हमारे ही देश में...हमारे ही प्रदेश में...हमारे ही शहर में...हमारे ही समाज में....किसी और काबिल डॉक्‍टर के शरीर पर दुर्दांत रूप से कब्जा कर उसे जिंदा आग के हवाले किए जा रहा होगा....सच #RIP_समाज...कम से कम तुम्हारे होने का भ्रम तो खत्म हो।

( फोटो गूगल से साभार ...जिस फोटो को फेसबुक कवर कर रहा है...वह डॉक्‍टर के साथ गुजरा दुर्दांत सच है...उसके परिवार के हर सदस्य के लिए हर दिन नरक की आग से गुजरने जैसी यातना है....)

#HangTheRapis

किरन राय

लड़कियों के पास 2 हाथ 2 पैर और 32 दांत होते हैं। जिसका प्रयोग लड़की चाहे तो उस समय कर सकती है जब वो किसी अनहोनी की शिकार होने वाली होती है।

लेकिन ये तभी होगा जब लड़की मानसिक रूप से मजबूत होगी।

"बलात्कार के बाद तो वैसे भी मर जाना ही है तो क्यों न मरने से पहले एक दो को मारकर मरूं " जैसी सोच अगर माँ बाप अपनी बेटियों में बचपन से ही भरते तो आज लड़कियां इतनी कमजोर न होतीं की किसी की उठती नजर से ही सहम जातीं।

पुरुषों के शरीर में बेहद सेंसटिव अंग उनका अंडकोश होता है, जो जरा सी चोट लगने से ही दिन में तारे दिखा देता है।

लड़की अगर किसी तरह से उसपर प्रहार कर दे तो एक दो तो वही धराशाई हो सकते हैं।

मेरी बचपन से यही पॉलिसी है

जब मरना ही है तो एक दो को मारकर मरो न कि भैया भैया करके गिड़गिड़ाते हुए।

6 साल की उम्र में 22 साल के पड़ोसी को दांत से काटकर खुद को उस समय बचाई थी जब मुझे पता ही नही था कि मेरे साथ कितनी भयानक घटना घटने वाली थी। इतना जोर से काटी थी कि दांत पर ब्लड के निशान आ गए थे। बन्दे की पकड़ जैसे ही ढीली पड़ी जोर से घर की तरफ भागी और घर के दलान में आते ही डर से बेहोश होकर गिर गई।

उस सिचुएशन से निकलने में वक्त जरूर लगा लेकिन मेरे अंदर की डरी सहमी कमजोर लड़की को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

उसके बाद कभी किसी की नजर उठाकर देखने की भी हिम्मत न हुई।

तब ये भी नही पता था कि लिंग योनि अंडकोश किसलिए होते हैं। अगर पता होता तो उस एकलौते लड़के की हर साल तिथि मनाई जाती।

शायद इसी वजह से हर बलात्कार पीड़ित में मुझे अपना बीता हुआ कल दिखता है और न चाहते हुए भी नफरत की एक ज्वाला आंखों में धधकने लगती है।

ये मेरी लाइफ का वो काला सच है जो मेरे घरवालों के साथ मेरे पति बच्चों सबको पता है , शायद इसीलिए मेरे बच्चों के मन मे बालपन से ही लड़कियों के प्रति सम्मान और इज्जत ज्यादा है क्योंकि उनको हर विक्टिम की जगह उनकी माँ दिखती है।

इस घटना ने मेरे बचपन को तो छीन ही लिया था लेकिन मां का प्यार मेरे अंदर की बच्ची को फिर से जीवनदान दे दिया।

इसे न मैं कभी भूली न ही खुद को भूलने दी , क्योंकि न भूलने की वजह ने ही मुझे समाज में आसपास व्याप्त गन्दगी से लड़ने के लायक बनाया।

आज इस पटल पर खुलकर स्वीकारोक्ति सिर्फ इसलिए कि शायद किसी को हिम्मत मिलें और ये सोच बलवती हो कि " मरना तो है ही फिर क्यों न मारकर मरूं "।

Jatara Wale Anoorag Trivedi

कानून सब कुछ नहीं कर सकता है.... बलात्कारियों का सामाजिक बहिष्कार और तिरस्कार शुरू कीजिए। इनके मां बाप का .. जो अपने भेड़िए बलात्कारी बेटे को बचाने की कोशिश करते हैं ! इनकी बहनों का जो राखियां लेकर जेल के बाहर खड़ी रहती हैं !इनकी पत्नियों का जो इनके लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं !.... और उन तमाम वकीलों का जो चंद रुपयों के लिए इन भेड़ियों का केस लड़ते हैं .. ये भूलकर की उनकी भी बेटी है घर में ।

Âbhishek Kumar

हैदराबाद की घटना पर तेलंगाना के गृहमंत्री मो महमूद अली ने पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि वो पढ़ी लिखी लड़की थी उसे बहन से पहले बात करने के बजाय पुलिस को 100 नम्बर पर कॉल करनी चाहिए था।

1% ये बात मान भी ली लेकिन जब उनके परिवार वालों ने रात 11 बजे पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने गए तो पुलिस उन्हें क्यो टालती रही? अगर पुलिस समय पर कार्यवाही करती तो शायद ये उसकी जान बच सकती थी।

तेलंगाना पुलिस ने राजधानी हैदराबाद में एक महिला सरकारी डॉक्‍टर के साथ कथित रेप, हत्‍या और जला देने के आरोपियों को अरेस्‍ट कर लिया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में लॉरी का ड्राइवर मोहम्‍मद पाशा भी शामिल है। इस बीच पीड़‍िता की मां ने सभी दोषियों को सबके सामने जिंदा जलाने की मांग की है। परिवार वालों ने यह भी कहा है कि अगर साइबराबाद पुलिस उन्‍हें दौड़ाती रही। अगर उसने तत्‍काल कार्रवाई की होती तो पीड़‍िता को जिंदा बचाया जा सकता था।

पीड़‍िता की मां ने कहा, 'मेरी बेटी बहुत मासूम थी। मैं चाहती हूं कि दोषियों को जिंदा जला दिया जाए।' मां ने बताया कि घटना के बाद मेरी छोटी बेटी थाने में शिकायत दर्ज कराने पहुंची लेकिन उसे दूसरे थाने शमशाबाद भेज दिया गया। पुलिस ने कार्रवाई की बजाय कहा कि यह मामला उसके क्षेत्र में नहीं आता है। बाद में पीड़‍िता के परिवार के साथ कई सिपाही लगाए गए और सुबह 4 बजे तक तलाशी अभियान चलाया गया लेकिन उसका पता नहीं चल पाया।

पीड़‍िता की बहन ने कहा, 'एक पुलिस स्‍टेशन से दूसरे पुलिस स्‍टेशन जाने में हमारा काफी समय बर्बाद हो गया। अगर पुलिस ने समय बर्बाद किए बिना कार्रवाई कर दी होती तो मेरी बहन आज जिंदा होती।' इस बीच हैदराबाद पुलिस ने कहा है कि इस हत्‍याकांड में शामिल मोहम्‍मद पाशा समेत अन्‍य आरोपियों को अरेस्‍ट कर लिया गया है। इस बीच राष्‍ट्रीय महिला आयोग ने पूरे मामले की जांच के लिए एक जांच समिति का गठन किया है।

DrRakesh Pathak

तेलंगाना में पशु चिकित्सक की नृशंस हत्या हमारे समाज के माथे पर बदनुमा दाग है। हम सभ्य समाज कहलाने के लायक ही नहीं हैं...

Vikas Singh

in Hyderabad, #in Tamil Nadu or the law student gangraped in Ranchi,we seem to be losing it as a society. It has been 7 yrs to the gut-wrenching case & our moral fabric continues to be in pieces.We need stricter laws.This needs to STOP!

— Akshay Kumar (@akshaykumar) November 29, 2019 YFq2h3I&fref=nf">Ankita Choudhury

To tell you the truth, it scares the hell out of me when I recall that there have been times when it was late in the evening, the uber was late and I was standing alone in an area while there were 5-6 guys eyeing , teasing and catcalling me and coincidentally even I didn't call the police directly(which could have been later listed as my "mistake 101" if anything would have happened to me that particular day).. When I felt uncomfortable, I called my Maa and asked her to keep talking on phone so that I feel safe.. Now, the reason it scares me is because another lady was in an almost similar situation and she was 🅱️aped and burnt alive only because she wasn't lucky enough to escape the situation that day. It's not just me, all the girls out there have been in similar situations and if we are escaping dangers then it is not because the society in our city is decent or something, it is just that we were lucky enough to escape death that one particular day, thus it doesn't guarantee our safety in the near future.

बालिका किशोरी एवं महिला सुरक्षा पर एक ज़रूरी अपील। जानकारी।

लेखिका सुश्री Pallavi Trivedi

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक

म प्र पुलिस, भोपाल

कल निर्भया, आज हज़ारों लड़कियाँ बलात्कार का शिकार हुईं। चुनिंदा केस ही चर्चा में आये बाकी दूर दराज के कस्बों के केस लोकल समाचार पत्रों की एक कॉलम की खबर बन कर रह गए।

लोग व्यथित हुए, दो चार दिन ज़िक्र चला और फिर रोज़मर्रा को ज़िंदगी शुरू हो गयी। लेकिन हर घटना के बाद हमने पेरेंट के रूप में, वयस्क लड़की के रूप में, ज़िम्मेदार पड़ोसी और नागरिक होने के नाते क्या कदम उठाए!

जिससे कि हमारे आसपास की लड़की के साथ यह जघन्य घटना न हो सके? यदि उठाये भी तो ये नाकाफी थे।

इस पोस्ट की मूल लेखिका एक ज़िम्मेदार नागरिक महिला और पुलिस अधिकारी होने के नाते कुछ प्रिवेंटिव एक्शन, ज़रूरी कदम सजेस्ट करना चाहती है, जो हर हालत में हर लड़की और उनके परिजनों तक पहुंचें।

1- नाबालिग लड़कियों के केस में पेरेंट्स स्कूल प्रबंधन की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी होती है। नासमझ बच्ची अपने साथ हुई घटना को न ठीक से समझ सकती है और न बता सकती है। इसलिए हर वक्त उसकी सुरक्षित निगरानी ज़रूरी है।

ख़ासकर पुरुष स्टाफ जैसे ड्राइवर, सर्वेंट, रिश्तेदार, ट्यूशन टीचर वगेरह के साथ अकेला न छोड़ें और न ही उनसे बच्ची के कपड़े बदलने या नहलाने जैसे कार्य कराएं। उसे तीन साल उम्र से ही अच्छे या खराब स्पर्श की ट्रेनिंग दें। इसे मौलिक कर्तव्य की तरह निभाएं।

2- आठ की उम्र में बच्ची को अश्लील हरकतों और रेप का अर्थ समझा दें। बार बार समझाएं जिससे उसे इसकी समझ पैदा हो जाये और अकेले असुरक्षित जाने के खतरों से लगातार आगाह करते रहें।

उसे बताएं कि कोई पुरूष अगर अश्लील इशारे करे,पोर्न वीडियो भेजे या दिखाने की कोशिश करे, उसके सामने अपना लिंग छुए, दिखाए, मास्टरबेट करे तो फौरन आकर पेरेंट्स को बताए। यही हरकतें उसके पोटेंशियल बलात्कारी होने का लक्षण हैं।

वो आपसे ये सब शेयर कर सके इसके लिए उसके दोस्त बनिये। डांट डपट करके उसे ये बातें बताने से हतोत्साहित न करें।

3- किशोर लड़कियों को अकेले निकलने से न रोकें किंतु उसे ज़रूरी सेफ्टी मेजर्स के बारे में बताएं। उसके साथ रेप के केसेस डिस्कस करें और उसके मोबाइल में वन टच इमरजेंसी नम्बर रखें जो आवश्यक रूप से पुलिस का ही हो। उसके बाद वह परिजनों को कॉल कर सकती है।

स्प्रे, चाकू, कैंची, सेफ्टी पिन,मिर्च पाउडर उसके बैग में अनिवार्य रूप से रहे। यह आदत जितनी जल्द विकसित कर दें, उतना बढ़िया। इसका डेमो देकर उसे ट्रेंड करवा दें। रिहर्सल आवश्यक है अन्यथा हथियार होते हुए भी घबराहट में उसका उपयोग नहीं हो पाता।

4- वयस्क लड़कियां भी पर्स में ऊपर बताए हुए हथियार अनिवार्य रूप से रखें व ज़रूरत पड़ने पर बिना घबराए उनके इस्तेमाल में कुशल हो। इन हथियारों के साथ एक तेज़ आवाज़ वाली सीटी रखें।अपराध के वक्त तेज़ शोर से अक्सर अपराधी भाग जाते हैं।

अगर कोई ऐसी डिवाइस हो या बन सकती हो जो एक बटन दबाते ही इतना तेज विशेष आवाज़ का सायरन बजाए जो आसपास के सारे क्षेत्र में गूंज जाए और जिसकी आवाज़ को सिर्फ रेप होने की आशंका के रूप में यूनिवर्सल साउंड माना जाए तो कृपया इसकी जानकारी दें और अगर नहीं है और कोई व्यक्ति या कम्पनी इसे बना सकती है तो इसे सभी नागरिकों की तरफ से मेरा आग्रह मानकर बना दे।यह बेहद प्रभावी सिद्ध होगी।

5-पुलिस कंट्रोल रूम व किसी भी पुलिस अधिकारी का नम्बर हमेशा अपने पास रखें। और सबसे पहले उन्हें डायल करें। पुलिस की छवि आपके मन में जो भी हो पर याद रखें कि महिलाओं के अपराधों में पुलिस बेहद तत्परता से काम करती है व आपकी सबसे निकट का पुलिस वाहन शीघ्र आपके पास पहुंच जाएगा। पुलिस एप अपने मोबाइल में रखें व अपनी लोकेशन भेजें। अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर स्टाफ व अधिकारियों से परिचय करें। पुलिस वाकई आपकी दोस्त है। यह आप महसूस करेंगी।

6-लड़कियों के लिए यह देश और दुनिया इतनी सुरक्षित हो कि वे आधी रात को भी बेखटके सड़कों पर घूम सकें लेकिन यथार्थ इतना सुंदर नहीं है। इसलिए अकेले देर रात सूनी सड़कों पर आवश्यकता होने पर ही निकलें।पुलिस हर कदम पर आपके साथ तैनात नहीं हो सकती ।और अपराधी व दरिंदे लड़कों को रातों रात सुधारा नहीं जा सकता। इसलिए क्लब या पार्टी से देर रात लौटें तो अपनी सुरक्षा का ध्यान पहले रहे। कैब या टैक्सी करने पर तुरंत लाइव लोकेशन घरवालों को दें व उसका फोटो भी भेजें। यह बात उस ड्राइवर को भी मालूम हो।

7- एक महत्वपूर्ण बात यह कि अगर अपराधी अकेला है तो उसे हैंडल किया जा सकता है। अगर वह रेप अटेम्प्ट करता है तो बिना घबराए उसके टेस्टिकल्स हाथों से पकड़कर जितनी मजबूती से हो सके,दबा दें। इससे वह कुछ मिनिटों के लिए अशक्त हो जाएगा और लड़की को बच निकलने का या उस पर आक्रमण करने का वक्त मिल जाएगा। गैंग रेप की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में लड़की ज़रूर बेबस हो सकती है मगर ऐसे में पुलिस को त्वरित सूचना मदद करेगी।

8- मार्शल आर्ट या अन्य कोई सुरक्षात्मक आक्रमण कला सिखाना अपनी बच्चियों के लिए to do लिस्ट में अनिवार्यतः शामिल कर लें ।

9- बच्चों की सही काउंसलिंग और अपराधों से बचाव के उपाय आप न जानते हों तो बेझिझक पुलिस थाने या किसी एन जी ओ की मदद लें। आपके स्कूल,क्लास, कोचिंग, मोहल्ले में आकर आपके लिए काउंसलिंग सेशन आयोजित हो जाएगा।

10- सबसे महत्वपूर्ण बात सबसे अंत में ये कि समाज को स्त्रियों के लिए सुरक्षित बनाएं और इसके लिए अपने घरों के ,मोहल्ले के व समाज के लड़कों को बचपन से ही शिक्षित करें।उनकी विकृत मानसिकता न हो इसके लिए अपने लड़कों की गतिविधियों पर दस बारह साल की उम्र से नज़र रखें। उसके मोबाइल पर,उसके दोस्तों पर ,उसकी आदतों पर लगातार नज़र रखें व उससे लगातार बात करें। हर रेप घटना पर उससे चर्चा करें । उसे संवेदनशील बनाएं और स्त्रियों के प्रति सम्मान करना सिखाएं। यह शिक्षा अमीरी,गरीबी,धर्म, जाति, क्षेत्र के भेद से परे हर माँ बाप को अपने लड़कों को देनी होगी। अगर पेरेंट्स खुद अनपढ़ व जागरूक नहीं हैं तो ज़िम्मेदार नागरिक अपने आसपास के क्षेत्रों में,स्कूलों में लड़कों के लिए समय समय पर ऐसे सेशन आयोजित कर सकते हैं । इसके साथ ही लड़कों में अपराध के दंड के विषय में भी भय जागृत करें। अगर कोई लड़का आपके परिवार अथवा आस पड़ोस में सेक्समेनियक है तो उसे सायकायट्रिस्ट को दिखाएं। उसे वयस्क होने के बाद म्युचुअल कंसेंट से सेक्स के बारे में समझाएं । यदि कोई आवारा ,शराबी लड़के आपकी नज़रों में हों तो ज़रूर पुलिस को खबर करें

यह सब आज करना शुरू करेंगे तो रातों रात कुछ नहीं बदलेगा लेकिन लगातार प्रयासों से असर ज़रूर दिखेगा।क्योंकि कोई परिवार नहीं जानता कि अगली बार किसके घर की स्त्री इस हादसे की शिकार होगी। प्लीज़ इसे बेहद बेहद गम्भीरता से लें। अगर आप ये सब कर रहे हैं तो कृपया अपना फर्ज़ समझकर दूसरों को भी समझाएं।स्त्रियों के लिए एक बेहतर समाज बनाने में हम सब की आहुति लगेगी। प्रदर्शन करें,धरने दें,कड़ी सज़ा की मांग करें, केंडल मार्च करें लेकिन खुद के कर्तव्य नहीं भूलें।

प्लीज़ इसे अधिक से अधिक शेयर करें,कॉपी करें,इसमें कुछ जोड़ना चाहें तो जोड़ दें लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इसे पहुंचाएं। ये बेहद ज़रूरी है। हम यूँ सिर्फ क्षोभ में भरे व्यथित होकर बैठे नहीं रह सकते।मैं इसे बार बार पोस्ट करूंगी । हम प्रिया को भूल नहीं सकते।कभी नहीं।

लेखिका: पल्लवी त्रिवेदी

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक

भोपाल

Pallavi Trivedi

एक ज़रूरी अपील

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कल निर्भया थी, आज प्रिया और निर्भया से प्रिया के बीच हज़ारों लड़कियाँ बलात्कार का शिकार हुईं। चुनिंदा केस ही चर्चा में आये बाकी दूर दराज के कस्बों के केस लोकल समाचार पत्रों की एक कॉलम की खबर बन कर रह गए।लोग व्यथित हुए,दो चार दिन ज़िक्र चला और फिर रोज़मर्रा को ज़िंदगी शुरू हो गयी।

लेकिन हर घटना के बाद हमने पेरेंट के रूप में, वयस्क लड़की के रूप में, ज़िम्मेदार पड़ोसी और नागरिक होने के नाते क्या कदम उठाए जिससे कि हमारे आसपास की लड़की के साथ यह जघन्य घटना न हो सके?

यदि उठाये भी तो ये नाकाफी थे।

आज मैं एक लड़की,एक ज़िम्मेदार नागरिक और एक पुलिस अधिकारी होने के नाते कुछ प्रिवेंटिव एक्शन व ज़रूरी कदम सभी को सजेस्ट करना चाहती हूं ,जो हर हालत में हर लड़की और उनके परिजनों तक पहुंचें।

1- नाबालिग लड़कियों के केस में पेरेंट्स और स्कूल प्रबंधन की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी होती है। नासमझ बच्ची अपने साथ हुई घटना को न ठीक से समझ सकती है और न बता सकती है। इसलिए हर वक्त उसे सुरक्षित निगरानी में रखना बेहद ज़रूरी है। ख़ासकर पुरुष स्टाफ जैसे ड्राइवर, सर्वेंट, रिश्तेदार, ट्यूशन टीचर वगेरह के साथ अकेला न छोड़ें और न ही उनसे बच्ची के कपड़े बदलने या नहलाने जैसे कार्य कराएं।

उसे तीन साल की उम्र से ही अच्छे और खराब स्पर्श की ट्रेनिंग दें। इसे अपने मौलिक कर्तव्य की तरह निभाएं।

2- आठ साल की उम्र में बच्ची को अश्लील हरकतों और रेप का अर्थ समझा दें। बार बार समझाएं जिससे उसे इसकी समझ पैदा हो जाये और अकेले असुरक्षित जाने के खतरों से लगातार आगाह करते रहें। उसे बताएं कि कोई पुरूष अगर अश्लील इशारे करे,पोर्न वीडियो भेजे या दिखाने की कोशिश करे,उसके सामने अपना लिंग छुए या दिखाए या मास्टरबेट करे तो फौरन आकर पेरेंट्स को बताए। यही हरकतें उसके पोटेंशियल बलात्कारी होने का लक्षण हैं।और वो आपसे ये सब शेयर कर सके इसके लिए उसके दोस्त बनिये। डांट डपट करके उसे ये बातें बताने से हतोत्साहित न करें।

3- किशोर लड़कियों को अकेले निकलने से न रोकें किंतु उसे ज़रूरी सेफ्टी मेजर्स के बारे में बताएं। उसके साथ रेप के केसेस डिस्कस करें और उसके मोबाइल में वन टच इमरजेंसी नम्बर रखें जो आवश्यक रूप से पुलिस का ही हो। उसके बाद वह परिजनों को कॉल कर सकती है। स्प्रे,चाकू ,कैंची, सेफ्टी पिन,मिर्च पाउडर उसके बैग में अनिवार्य रूप से रहे। यह आदत जितनी जल्द विकसित कर दें ,उतना बढ़िया। इसका डेमो देकर उसे ट्रेंड करवा दें। रिहर्सल आवश्यक है अन्यथा हथियार होते हुए भी घबराहट में उसका उपयोग नहीं हो पाता।

4- वयस्क लड़कियां भी पर्स में ऊपर बताए हुए हथियार अनिवार्य रूप से रखें व ज़रूरत पड़ने पर बिना घबराए उनके इस्तेमाल में कुशल हो। इन हथियारों के साथ एक तेज़ आवाज़ वाली सीटी रखें।अपराध के वक्त तेज़ शोर से अक्सर अपराधी भाग जाते हैं। अगर कोई ऐसी डिवाइस हो या बन सकती हो जो एक बटन दबाते ही इतना तेज विशेष आवाज़ का सायरन बजाए जो आसपास के सारे क्षेत्र में गूंज जाए और जिसकी आवाज़ को सिर्फ रेप होने की आशंका के रूप में यूनिवर्सल साउंड माना जाए तो कृपया इसकी जानकारी दें और अगर नहीं है और कोई व्यक्ति या कम्पनी इसे बना सकती है तो इसे सभी नागरिकों की तरफ से मेरा आग्रह मानकर बना दे।यह बेहद प्रभावी सिद्ध होगी।

5-पुलिस कंट्रोल रूम व किसी भी पुलिस अधिकारी का नम्बर हमेशा अपने पास रखें। और सबसे पहले उन्हें डायल करें। पुलिस की छवि आपके मन में जो भी हो पर याद रखें कि महिलाओं के अपराधों में पुलिस बेहद तत्परता से काम करती है व आपकी सबसे निकट का पुलिस वाहन शीघ्र आपके पास पहुंच जाएगा। पुलिस एप अपने मोबाइल में रखें व अपनी लोकेशन भेजें। अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर स्टाफ व अधिकारियों से परिचय करें। पुलिस वाकई आपकी दोस्त है। यह आप महसूस करेंगी।

6- मैं चाहती हूँ कि लड़कियों के लिए यह देश और दुनिया इतनी सुरक्षित हो कि वे आधी रात को भी बेखटके सड़कों पर घूम सकें लेकिन यथार्थ इतना सुंदर नहीं है। इसलिए अकेले देर रात सूनी सड़कों पर आवश्यकता होने पर ही निकलें।पुलिस हर कदम पर आपके साथ तैनात नहीं हो सकती ।और अपराधी व दरिंदे लड़कों को रातों रात सुधारा नहीं जा सकता। इसलिए क्लब या पार्टी से देर रात लौटें तो अपनी सुरक्षा का ध्यान पहले रहे। कैब या टैक्सी करने पर तुरंत लाइव लोकेशन घरवालों को दें व उसका फोटो भी भेजें।यह बात उस ड्राइवर को भी मालूम हो।

7- एक महत्वपूर्ण बात यह कि अगर अपराधी अकेला है तो उसे हैंडल किया जा सकता है। अगर वह रेप अटेम्प्ट करता है तो बिना घबराए उसके टेस्टिकल्स हाथों से पकड़कर जितनी मजबूती से हो सके,दबा दें।इससे वह कुछ मिनिटों के लिए अशक्त हो जाएगा और लड़की को बच निकलने का या उस पर आक्रमण करने का वक्त मिल जाएगा। गैंग रेप की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में लड़की ज़रूर बेबस हो सकती है मगर ऐसे में पुलिस को त्वरित सूचना मदद करेगी।

8- मार्शल आर्ट या अन्य कोई सुरक्षात्मक आक्रमण कला सिखाना अपनी बच्चियों के लिए to do लिस्ट में अनिवार्यतः शामिल कर लें ।

9- बच्चों की सही काउंसलिंग और अपराधों से बचाव के उपाय आप न जानते हों तो बेझिझक पुलिस थाने या किसी एन जी ओ की मदद लें। आपके स्कूल,क्लास, कोचिंग, मोहल्ले में आकर आपके लिए काउंसलिंग सेशन आयोजित हो जाएगा।

10- सबसे महत्वपूर्ण बात सबसे अंत में ये कि समाज को स्त्रियों के लिए सुरक्षित बनाएं और इसके लिए अपने घरों के ,मोहल्ले के व समाज के लड़कों को बचपन से ही शिक्षित करें।उनकी विकृत मानसिकता न हो इसके लिए अपने लड़कों की गतिविधियों पर दस बारह साल की उम्र से नज़र रखें। उसके मोबाइल पर,उसके दोस्तों पर ,उसकी आदतों पर लगातार नज़र रखें व उससे लगातार बात करें। हर रेप घटना पर उससे चर्चा करें । उसे संवेदनशील बनाएं और स्त्रियों के प्रति सम्मान करना सिखाएं। यह शिक्षा अमीरी,गरीबी,धर्म, जाति, क्षेत्र के भेद से परे हर माँ बाप को अपने लड़कों को देनी होगी। अगर पेरेंट्स खुद अनपढ़ व जागरूक नहीं हैं तो ज़िम्मेदार नागरिक अपने आसपास के क्षेत्रों में,स्कूलों में लड़कों के लिए समय समय पर ऐसे सेशन आयोजित कर सकते हैं । इसके साथ ही लड़कों में अपराध के दंड के विषय में भी भय जागृत करें। अगर कोई लड़का आपके परिवार अथवा आस पड़ोस में सेक्समेनियक है तो उसे सायकायट्रिस्ट को दिखाएं। उसे वयस्क होने के बाद म्युचुअल कंसेंट से सेक्स के बारे में समझाएं । यदि कोई आवारा ,शराबी लड़के आपकी नज़रों में हों तो ज़रूर पुलिस को खबर करें

यह सब आज करना शुरू करेंगे तो रातों रात कुछ नहीं बदलेगा लेकिन लगातार प्रयासों से असर ज़रूर दिखेगा।क्योंकि कोई परिवार नहीं जानता कि अगली बार किसके घर की स्त्री इस हादसे की शिकार होगी। प्लीज़ इसे बेहद बेहद गम्भीरता से लें। अगर आप ये सब कर रहे हैं तो कृपया अपना फर्ज़ समझकर दूसरों को भी समझाएं।स्त्रियों के लिए एक बेहतर समाज बनाने में हम सब की आहुति लगेगी। प्रदर्शन करें,धरने दें,कड़ी सज़ा की मांग करें, केंडल मार्च करें लेकिन खुद के कर्तव्य नहीं भूलें।

प्लीज़ इसे अधिक से अधिक शेयर करें,कॉपी करें,इसमें कुछ जोड़ना चाहें तो जोड़ दें लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इसे पहुंचाएं।

ये बेहद ज़रूरी है। हम यूँ सिर्फ क्षोभ में भरे व्यथित होकर बैठे नहीं रह सकते।मैं इसे बार बार पोस्ट करूंगी । हम प्रिया को भूल नहीं सकते।कभी नहीं।

Pallavi Trivedi

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक,भोपाल

#HangTheRapist

Geeta Yatharth

ना तो पहले की कोई दुश्मनी थी, ना वो तुम्हारी एक्स गर्ल फ्रेंड थी,

न कोई दुश्मन की बेटी थी.

ना पैसों का लेन देन,

बस रास्ते में बाइक खराब की वजह से एक लड़की मिली,

और वो टूट पड़े जैसे बस शिकार करने के लिए ही घूम रहे थे.

बलात्कार किया, जिंदा जला दिया.

उफ्फ!

कहाँ जाए, कहाँ रहे!

अब गाड़ियां कब बताकर खराब होगी,

रास्ते इतने असुरक्षित है तो चलेंगे कैसे!

हर रास्ते पर लाइट और सीसीटीवी इसलिए ही जरूरी है.

ये सड़के लड़कियों के लिए सुरक्षित करनी होगी.

#MeriRaatMeriSadak केम्पेन का यही पर्पज यही था,

लड़कियां एक या दो नहीं, बल्कि झुंड में दिखाई दे,

ज्यादा लडकियों की मौजूदगी सड़के सुरक्षित करेंगी,

शिकारी सड़कों पर झुंड बनाये घूमते है अकेली लड़की की तलाश में,

वैसे ही कभी एक लड़की ना मिले बल्कि लड़कियों का झुंड मिले

ताकि शिकारी नाकाम हो जाये अपने इरादों में,

लेकिन, प्रोटेस्ट तो होते है और फिर बात पुरानी हो जाती है,

हर रोज प्रोटेस्ट हो वो सम्भव नहीं.

लेकिन, जरूरी है मौजूदगी दर्ज करनी।

हर रास्ते को सुरक्षित करना,

घर से निकल कर काम पर गई बेटियां, घर पर लौट आये,

इसके लिए जरूरी है सड़के सुरक्षित करनी.

Posted By: Navodit Saktawat