डिजिटल डेस्क। जासूसी की दुनिया में नाम कमाए नहीं जाते, छुपाए जाते हैं। यहां न कोई कवर स्टोरी होती है, न तालियां। जो सबसे असरदार होते हैं, वे अक्सर सबसे कम दिखते हैं। इसी दुनिया की परछाइयों से दो नाम उभरते हैं, एम.के. नारायणन जिनका दिमाग फौलाद की तरह ठंडा था, और अजीत डोभाल जिनका एक्शन बिजली की तरह तेज।
इन दोनों को दुनिया ने नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसियों FBI और चीन की MSS ने नोटिस किया। और इनकी कहानी हमें मिलती है उस शख्स की कलम से, जिसने इन्हें बहुत नजदीक से देखा। और वो हैं RAW के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत।
उत्तर ब्लॉक का वह कमरा
अमरजीत सिंह दुलत युवा एनालिस्ट थे। उत्तर ब्लॉक में एक कमरा और उसी कमरे में एक शांत, गंभीर व्यक्ति एम. के. नारायणन। नारायणन बोलते कम थे, सोचते बहुत थे। जब कोई फाइल उनके पास आती, तो वह जल्दबाजी नहीं करते। घंटों, दिनों, कभी-कभी महीनों तक एक ही फाइल देखते रहते थे। जानकारी चाहे कितनी भी ज्यादा हो, निष्कर्ष हमेशा नपा-तुला होता। गलती की गुंजाइश लगभग शून्य।
खुफिया दुनिया में सबक साफ था
इंटेलिजेंस एक्शन का नहीं, इंतजार का खेल है। और इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी नारायणन थे। कहा जाता था, अगर नारायणन किसी को पसंद कर लें, तो वह ऊंचाइयों तक जाएगा। और अगर नापसंद कर लें…तो मुसीबतें उसका पीछा नहीं छोड़ेंगी।
एशिया का सर्वश्रेष्ठ जासूस
उनकी नजर ऐसी थी कि कमरे से निकलते वक्त भी वे हर चेहरा, हर हलचल स्कैन कर लेते थे। इतनी पैनी कि पंडित नेहरू के दौर के IB चीफ बी. एन. मलिक ने उन्हें लिखा, एशिया का सबसे बेहतरीन इंटेलिजेंस ऑफिसर। राजीव गांधी कोई बड़ा फैसला लेते तो पहले नारायणन की राय लेते। दिल्ली की सत्ता की गलियों में उनसे बेहतर चलना किसी को नहीं आता था।
और फिर आया एक फील्डमैन
जहां नारायणन सोच का समंदर थे, वहीं एक और अफसर उभर रहा था..खामोश, साहसी और पूरी तरह अलग। नाम था अजीत डोभाल। 70 के दशक में मिजोरम विद्रोह, जंगल, अंडरग्राउंड संगठन। डोभाल वहां अफसर बनकर नहीं, इंसान बनकर गए। एक दिन उन्होंने मिजो विद्रोहियों को अपने घर खाने पर बुलाया। हथियारों से लैस विद्रोही और घर में उनकी पत्नी द्वारा बनाया गया सूअर का मांस। यह कोई रणनीति नहीं थी। यह उनका खुद पर भरोसा था।
रिक्शा वाला जासूस
1988 अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर खालिस्तानी आतंकियों का कब्जा। एक रिक्शा रोज मंदिर आता-जाता था। आतंकियों को लगता यह ISI का आदमी है। असलियत में वह रिक्शा वाला अजीत डोभाल थे। दो दिन भीतर रहे और जानकारी लेकर बाहर आए।
41 आतंकी, बिना खून-खराबे के पकड़े गए। न मंदिर को नुकसान, न श्रद्धालुओं को। जासूसी की दुनिया में डोभाल का नाम गूंज उठा।
कंधार: फैसला या तबाही
1999 भारतीय विमान हाईजैक, कंधार। जब बात करने कोई चाहिए था, तो मैदान में उतरे डोभाल। सैटेलाइट फोन पर हर पल की जानकारी ली। उनका संदेश साफ था। जल्दी फैसला कराइए, देर खतरनाक है। वह आतंकियों की रिहाई के ख़िलाफ थे, लेकिन देरी हो चुकी थी। फिर भी, सरकार और एजेंसियों ने माना कि इस मिशन के लिए डोभाल से बेहतर कोई नहीं था।
डंडा और नरमी
नारायणन मजाक में कहा करते थे, नरमी चाहिए तो दुलत और डंडा चाहिए तो डोभाल। 2004 में कांग्रेस सरकार के दौर में भी डोभाल को IB प्रमुख बनाया गया। और 2014 में जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो राष्ट्रीय सुरक्षा की चाबी अजीत डोभाल को सौंपी गई।
वे आज भी वहीं हैं। सबसे लंबे समय तक रहने वाले NSA। यह कहानी न किसी हीरो की है, न किसी फिल्म की। यह उन लोगों की कहानी है जो परछाइयों में रहकर देश की दिशा तय करते हैं। एक जो सोचता था, दूसरा जो करता था। एम. के. नारायणन और अजीत डोभाल जासूसी दुनिया का दिमाग और एक्शन।
Source:
पूर्व रॉ प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत की आत्मकथा 'अ लाइफ इन द शैडोज़: ए मेमॉयर'।
पूर्व IB चीफ बी. एन मलिक की किताब 'माई इयर्स विथ नेहरू:द चाइनीज बिट्रैअल'।
जागरण अर्काइव