
विलियम डेलरिम्पल ने बंटवारे के दर्द की परतों को अपनी किताब 'द ग्रेट डिवाइड : द वायोलेंट लिगेसी ऑफ इंडियन पार्टिशन' में नए सिरे से खोला है। अंग्रेजी वेबसाइट द न्यूयॉर्कर ने इसके अंश प्रकाशित किए हैं। जानिए क्या नया है इस नई किताब में...
ख्यात ब्रिटिश लेखक और इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल न केवल भारत और यहां की कला-संस्कृति में रुचि रखते हैं, बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मध्य एशिया से जुड़े मसलों के साथ ही हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन तथा ईसाई धर्मों की परंपराओं के भी जानकार कहे जाते हैं। अपनी पुस्तकों के लिए कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके डेलरिम्पल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सहआयोजक हैं।
1. नहीं था हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा : भारत पर मुगलों ने पहला हमला सन् 1021 में किया था। तब लाहौर निशाना बना था। 1192 में दिल्ली ,1323 में मदुराई और फिर गुजरात तथा बंगाल भी हथिया लिए गए। इसके बाद की दो सदियां ऐसी रहीं, जब यहां के बाशिंदों ने हमलावरों की संस्कृति को अपनाना शुरू कर दिया। मसलन – इस्लाम का प्रचार करने वाले सूफी हिंदू शास्त्रों को देवताओं से प्रेरित मानते थे। हिंदू साधुओं की तरह वे शरीर पर भस्म लगाते, या शीर्षासन की मुद्रा में प्रार्थना करते थे।
यह वह दौर था जब दोनों धर्म एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। दोनों धर्मों के अनुयायी एक-दूसरे के धर्मस्थलों पर जाते थे। पंजाब और बंगाल में सूफी बहुतायत में थे और सदियों बाद,विभाजन के समय इन्हीं दो प्रदेशों में सबसे ज्यादा हिंसा भड़की।
2. दिल्ली के सुल्तान विष्णु के अवतार : समूचे उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक मिलन हो रहा था। दक्षिण भारत की मध्यकालीन हिंदू पुस्तकों में कहीं-कहीं दिल्ली के सुल्तान को भगवान विष्णु का अवतार करार दिया गया। 17वीं सदी में शाही मुगल परिवार के दारा शिकोह ने भगवत् गीता का पारसी में अनुवाद करवाया था। आखिरी मुगल सम्राट ने भी हिंदू धर्म और इस्लाम को समान भाव वाला बताया था।
3. धर्म पर नहीं होते थे विवाद : 19वीं सदी के भारत में भी विभिन्न धर्मों का यही परंपरावादी, भाषाई और सांस्कृतिक मिलन जारी रहा। उस दौर में लोग खुद को अपने धर्म या धार्मिक आस्था जरिए परिभाषित नहीं करते थे। एलेक्स वोन तंजेलमन ने अपनी किताब 'इंडियन समर' में लिखा है - इसके बाद अंग्रेज आए और उन्होंने भारतीयों को धर्म के आधार पर बांटना शुरू कर दिया।
4. टाला जा सकता था बंटवारा : अंग्रेजों की नीति 'बांटों और राज करो' की रही। ऐसे में बंटवारा होना कोई आश्चर्य नहीं, लेकिन जो कुछ हुआ वो आकस्मिक था।1940 के आखिरी तक भारत का बंटवारा टाला जा सकता था। ब्रिटिश इतिहासकार पेट्रिक फ्रेंच ने 'लिबर्टी ऑर डेथ' में बताया है कि तब के नेताओं का आपसी टकराव कितना बढ़ गया था। खासतौर पर मुहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू में।

(फोटो - विलियम डेलरिम्पल)
5. ऐसे जिन्ना ने बनाया पाक : जिन्ना की जिद से इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान जरूर बना, लेकिन उनके व्यक्तित्व से जुड़ी कई बातें आश्चर्यजनक थीं। मसलन - वे कट्टर धर्मनिरपेक्ष सोच के थे, लेकिन व्हिस्की पीते थे, कभी-कभार ही मस्जिद जाते थे, कभी दाढ़ी नहीं रखी, हमेशा क्लीनशेव और स्टाइलिश रहे, एक गैर-मुस्लिम महिला से निकाह रचाया। उनकी बीवी एक परसी व्यापारी की सुंदर बेटी थी। वो अंगप्रदर्शन करने वाली साड़ियां पहनती थीं।
6. ब्रिटेन ने क्यों की इतनी जल्दबाजी : मार्च 1947 में लॉर्ड लुईस माउंटबेटन को इस मकसद के साथ भारत भेजा गया कि सत्ता का हस्तांतरण कर ब्रिटेन जल्द से जल्द भारत से रवाना हो जाए। माउंटबेटन ने जिन्ना और नेहरू के बीच कई दौर की बातचीत कराई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। वक्त निकलता जा रहा था। आखिरी में बंटवारा एक मात्र हल रह गया।
आखिरी में उन्होंने 15 अगस्त 1947 की तारीख तय कर दी, जोकि उम्मीद से दस माह जल्दी थी। ब्रिटेन ने इतनी जल्दबाजी क्यों की, यह अब भी बहस का विषय है। ब्रिटिश जज क्रिल रेडक्लिफ को दोनों देशों की सीमाएं तय करने को कहा गया,हालांकि उन्हें महज 40 दिन का वक्त मिला।

(फोटो - महात्मा गांधी और जिन्ना)
7. क्या कराची, क्या दिल्ली : अगले कुछ माह में दक्षिण एशिया का नक्शा ही बदल गया। 1941 में कराची, जिसे पाकिस्तान की पहली राजधानी घोषित किया गया, में 47.6 फीसदी आबादी हिंदू थी। इसी तरह दिल्ली भारत की राजधानी बनी, जहां एक तिहाई मुसलमान रह रहे थे। लेकिन दशक के अंत में कराची से सारे हिंदुओं को भागना पड़ा और दिल्ली के मुसलमानों के साथ ही यही हुआ।
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8. बर्फ से ठंडा उस नपुंसक दुष्कर्मी का हाथ : बॉम्बे के लेखक सआदत हसन मंटो ने अपनी कहानियों में अपने पात्रों के माध्यम से हालात बयां किए हैं। लघु कथा 'कोल्डर देन आइस' ईश्वर सिंह की कहानी है। वह बैडरूम में अपनी प्रेमिका कुलवंत कौर के साथ बैठा है। पूर्व में एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने के बाद वह नपुंसक हो गया है। वह उस लड़की की कहानी कुलवंत को सुनाता है।
कहता है, 'मैं उसके घर में घुसा। उसके परिवार को मार डाला। मैं उसका भी गला काट सकता था, लेकिन नहीं...मुझे लगा कि वह बेहोश है। मैं उसे कंधे पर उठाकर उस नहर में चला जो शहर से बाहर जाती है...फिर मैंने उसे घास पर लेटाया...झाड़ियों के पीछे...पहले सोचा उसे थोड़ा हिलाऊं...लेकिन'। '....लेकिन क्या', कुलवंत ने पूछा। ईश्वर सिंह बोला '...लेकिन वह मर चुकी थी। मैं एक मुर्दा शरीर को लेकर घुम रहा था जानी।..मुझे अपना हाथ दो।' कुलवंत ने हाथ थामा तो वह बर्फ से भी ठंडा था।
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9. मानव इतिहास का सबसे बड़ा माइग्रेशन: भारत के बंटवारे के बाद दुनिया ने मानव इतिहास का सबसे बड़ा माइग्रेशन (देशांतर गमन) देखा। हिंसा भड़क गई। सीमावर्ती पंजाब और बंगाल में सबसे ज्यादा रक्तपात हुआ। करीब 75,000महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ और उनके शरीर क्षति-विक्षत कर दिए गए। निशिद हजारी ने 'मिडनाइट्स फ्यूरिज़' में लिखा है - नाजीवाद के दौरान हिंसा और कत्लेआम के गवाह रहे ब्रिटिश सैनिकों तथा पत्रकारों का कहना था कि विभाजन के बाद भड़की यह हिंसा कहीं अधिक भयावह थी।
10. अभी खत्म नहीं हुआ 1947 : हजारी ने अपनी किताब में निष्कर्ष निकाला है और उससे इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होने लिखा है, नेहरू और जिन्ना के उत्तराधिकारी 1947 के आवेश को कब का शांत कर चुके, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां उत्साहवर्धक नहीं हैं। भारत सरकार ने पाक के साथ बातचीत बंद कर दी है। दोनों देशों में धार्मिक कट्टरपंथ का खतरा बढ़ गया है। एक तरह से 1947 अभी खत्म नहीं हुआ है।
(प्रस्तुतिः अरविंद दुबे)