
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने मनरेगा की तारीफ करते हुए इसे बड़े जनहित वाली योजना बताया है। कहा है कि दुनिया के अन्य किसी देश में असंगठित क्षेत्र के दस लाख लोगों को प्रतिदिन भुगतान करने वाली ऐसी रोजगार योजना नहीं चलती। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (मनरेगा) की केंद्र ने यह तारीफ सुप्रीम कोर्ट में की है। उल्लेखनीय है कि इस योजना की शुरुआत संप्रग सरकार में हुई थी।
जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस एनवी रमण की पीठ के समक्ष सुनवाई में सरकार ने कहा, वह सभी राज्यों को इस रोजगार कार्यक्रम के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराती है। सरकार ने याचिकाकर्ता गैर सरकारी संगठन के उस दावे को गलत बताया कि धन की कमी से कई राज्य लोगों को रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहे हैं। कार्यक्रम के लिए केंद्र राज्यों को पर्याप्त धन नहीं दे रहा।
कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, मनरेगा बड़े जनहित वाला कार्यक्रम है। यह वैसा ही है जैसा कि खाद्य सुरक्षा। बताया जाए कि किस राज्य ने कब मनरेगा के लिए ज्यादा धन की मांग की। इस योजना के अंतर्गत आने वाले सभी राज्यों को आवश्यकतानुसार धनराशि मुहैया कराई जाती है। धन निर्गत करने की प्रक्रिया में कोई बाधा हो सकती है, लेकिन जैसे ही प्रदेश सरकार द्वारा उसकी जानकारी दी जाती है। उस बाधा को दूर किया जाता है। भविष्य में भी इस तरह की व्यावहारिक बातों को दूर करने के प्रयास जारी रहेंगे।
याचिकाकर्ता एनजीओ स्वराज अभियान की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा, कई राज्य कार्यक्रम के लिए अपना बजट बढ़ाए जाने के लिए केंद्र से लगातार मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी नहीं सुनी जा रही। उल्टे राज्यों को परियोजना के लिए धन की मांग को कम करने के लिए दबाव डाला जा रहा है। इसके चलते राज्य जरूरतमंद लोगों को रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहे हैं। प्रशांत भूषण ने कहा, केंद्र सरकार एक परिवार को साल में 100 दिन ही काम मिलने की सीमा निश्चित नहीं कर सकती। केंद्र रोजगार के दिनों की सीमा तय करने का कोई दिशानिर्देश देने से पहले ही इन्कार कर चुकी है। पीठ ने मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख 19 मार्च तय की है।
एनजीओ ने सूखा प्रभावित राज्यों को मनरेगा के तहत पर्याप्त धनराशि न दिए जाने के मामले में याचिका दायर की है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा और छत्तीसगढ़ समेत 12 राज्य हैं।