
कहते हैं कि दुनिया में अगर सबसे हसीन कोई अहसास है, तो वो प्यार है। लेकिन जब यही प्यार हवस, बेवफाई और साजिश का लिबास ओढ़ ले, तो समाज की रूह कांप उठती है। मेरठ के चर्चित सौरभ हत्याकांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक पत्नी, जिसने शादी के पवित्र रिश्तों को तार-तार करते हुए अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की बेरहमी से बलि चढ़ा दी।
अदालत ने जब इस खौफनाक गुनाह पर अपना फैसला सुनाया, तो पूरे देश की नजरें इस पर टिक गईं - पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी यानी सजा-ए-मौत दी गई है।
अदालत का यह फैसला आते ही हर तरफ एक ही चर्चा छिड़ गई। चर्चा कि क्या वाकई अब किसी महिला को भारत में फांसी के फंदे पर लटकाया जाएगा? क्या आजाद भारत के इतिहास में किसी महिला को फांसी हुई है? आइए, कानूनी दांव-पेचों से परे, इस पूरी कहानी को परत-दर-परत और सिलसिलेवार ढंग से समझने की कोशिश करते हैं।
अगर आपको लगता है कि भारत में महिलाओं को कभी फांसी की सजा नहीं सुनाई गई, तो आप गलत हैं। हमारी अदालतों ने पहले एक नहीं कई बार खौफनाक अपराध में मुख्य रूप से शामिल महिलाओं को फांसी की सजा सुनाई है। मगर, शायद यह जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि आजादी के बाद से आजतक केवल एक बार किसी महिला को फांसी पर चढ़ाया गया है।
मामला साल 1955 का है, जब नई दिल्ली के एक क्लिनिक में काम करने वाली महिला रतन बाई जैन को तीन मासूम और युवा महिला सहकर्मियों को जहर देकर मारने के लिए दोषी साबित किया गया था। मामला इतना भयावह था कि अदालत ने उसे फांसी की सजा दी। 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में रतन बाई जैन को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
उसके बाद से आज तक, यानी पिछले 71 सालों में भारत की किसी भी जेल में किसी महिला की फांसी की सजा पर अमल नहीं हो सका है।
ऐसा नहीं है कि रतन बाई के बाद महिलाओं ने संगीन जुर्म नहीं किए। देश के अलग-अलग कोनों से ऐसी खौफनाक कहानियां सामने आईं, जिन्होंने सुनने वालों का दिल दहला दिया। लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं की वजह से फांसी नहीं हो सकी। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ सबसे बड़े मामलों के बारे में...

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अप्रैल 2008 की वो काली रात कोई नहीं भूल सकता। उत्तर प्रदेश के अमरोहा की रहने वाली शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के प्यार में अंधी होकर अपने ही परिवार के 7 लोगों को कुल्हाड़ी से काट डाला। उस खौफनाक रात उसने अपने 10 महीने के मासूम भतीजे तक का गला घोंट दिया था।
अब क्या है हाल? सेशन कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने शबनम की फांसी को सही माना। देश के राष्ट्रपति ने भी उसकी दया याचिका खारिज कर दी। मथुरा की महिला जेल में शबनम को फांसी देने की तैयारियां तक कर ली गई थीं। लेकिन आखिरी वक्त में कानूनी अपीलों के पेच फंस गए और शबनम आज भी जेल में अपनी बारी का इंतजार कर रही है।
महाराष्ट्र के कोल्हापुर की रहने वाली दो बहन रेणुका शिंदे और सीमा गावित। इन्होंने अपनी मां के साथ मिलकर 1990 के दशक में 13 से ज्यादा छोटे बच्चों का अपहरण किया और उनमें से कम से कम 5 मासूमों की हत्या कर दी। इनका मकसद सिर्फ इतना था कि चोरी करते वक्त कोई इन पर शक न करे।
अब क्या है हाल? साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें फांसी सुनाई और 2014 में राष्ट्रपति ने इनकी दया याचिका खारिज कर दी। लेकिन दया याचिका खारिज होने के बाद भी सरकार इन्हें 8 सालों तक फांसी पर नहीं लटका सकी। आखिरकार 2022 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि 'फांसी देने में सरकार ने बहुत ज्यादा देरी कर दी, जो कैदी के मानवाधिकार का हनन है।' इस देरी के आधार पर दोनों बहनों की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया गया।
1991 में देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक आत्मघाती धमाके में हत्या कर दी गई थी। इस पूरी साजिश में नलिनी नाम की महिला मुख्य किरदारों में शामिल थी।
अब क्या है हाल? नलिनी को सुप्रीम कोर्ट तक से फांसी की सजा मिली। लेकिन सोनिया गांधी की मानवीय अपील और बाद में राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका स्वीकार किए जाने पर उसकी फांसी को उम्रकैद में बदला गया। लगातार 30 साल जेल में बिताने के बाद 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिहा कर दिया।
हरियाणा में पूर्व विधायक रेलू राम पुनिया की बेटी सोनिया और उसके पति ने साल 2001 में पूरी जायदाद हड़पने के लिए अपने ही माता-पिता, भाई-भाभी और मासूम बच्चों समेत परिवार के 8 सदस्यों को बेरहमी से मार डाला था। इन्हें भी फांसी की सजा मिली, राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज भी की, लेकिन बाद में अदालती प्रक्रिया में हुई देरी के चलते फांसी की सजा उम्रकैद में बदल गई।
पूर्व महाधिवक्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता, झारखंड उच्च न्यायालय व भारत का सर्वोच्च न्यायालय, अजित कुमार सिंह ने इस मामले पर खास बातचीत में बताया भारत के संविधान में राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई है कि वो किसी भी गुनहगार की फांसी की सजा को माफ कर सकते हैं या उसे उम्रकैद में बदल सकते हैं।

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अब लौटते हैं मेरठ के उसी सौरभ हत्याकांड पर, जहां से यह पूरी बात शुरू हुई थी। मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को निचली अदालत ने फांसी की सजा तो सुना दी है, लेकिन कानून का रास्ता अभी बहुत लंबा है...
भारतीय कानून में एक बहुत ही स्पष्ट सिद्धांत है - 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare Cases)। यानी अगर कोई अपराध इतना क्रूर और वीभत्स है कि पूरा समाज सहम जाए, तो वहां अपराधी का लिंग (महिला या पुरुष) नहीं देखा जाता, सिर्फ उसका जुर्म देखा जाता है।
हालांकि, हमारी कानूनी व्यवस्था में महिलाओं को कुछ खास राहत भी मिली हुई है। अगर फांसी की सजा पाने वाली महिला गर्भवती है, तो कानून के तहत उसकी फांसी की सजा अपने आप उम्रकैद में बदल जाती है। इसके अलावा, दया याचिका में सालों-साल की देरी भी अक्सर फांसी को उम्रकैद में बदल देती है।
मेरठ का यह फैसला साबित करता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और वो किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। लेकिन इतिहास गवाह है कि निचली अदालत से फांसी की सजा मिलना एक बात है और वास्तव में फांसी के तख्ते तक पहुंचना दूसरी। अब देखना यह होगा कि मुस्कान और साहिल को फांसी का फंदा मिलता है या कानूनी दांव-पेंच में उलझ कर रह जाती है।
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