
मल्टीमीडिया टीम। लोकसभा चुनाव जीतकर सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया से लगातार दूरी बनाकर रखी है। उनकी यह दूरी दूरदर्शन और आकाशवाणी पर लागू नहीं होती है।
मौजूदा केंद्र सरकार निजी समाचार माध्यमों के बजाय सरकारी पर ज्यादा भरोसा कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रसार भारती के मातहत आने वाले इन दोनों माध्यमों के प्रतिनिधि सरकार से कोई भी ऐसा प्रश्न नहीं पूछते हैं, जिससे किसी भी प्रकार की फजीहत हो।
यही वजह है कि सरकारी रेडियो और टीवी चैनल की पूछ-परख बढ़ गई है। आलोचकों का मानना है कि विपक्षियों को कमजोर करना, मंत्रियों पर नजर रखना तथा पीएमओ में समस्त शक्तियों को निहित रखना ही नरेंद्र मोदी के कामकाज का तरीका है।
हालांकि, सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर इसका खंडन करते हुए कहते हैं कि दूरदर्शन तथा आकाशवाणी के माध्यम से अपनी बात रखने का यह अर्थ नहं है कि प्रधानमंत्री मोदी सूचनाओं को छिपाना चाहते हैं। बल्कि सभी को उनके इस तरीके का स्वागत इसलिए करना चाहिए, क्योंकि सभी को एक समान सूचना मिलती है। किसी पर भी कोई रोकटोक नहीं है और सारे आयोजनों का प्रसारण सजीव होता है। जावड़ेकर ने कहा कि इस सरकार में मीडिया को पूरी आजादी मिली हुई है। इसलिए किसी को कोई समस्या नहीं होना चाहिए।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने मीडिया से कभी कोई कॉन्फ्रेंस नहीं की है। लेकिन वो फेसबुक तथा ट्विटर पर अपने 70 लाख फॉलोअर्स से लगातार जुड़े रहते हैं। हालांकि देश का मीडिया उनके इस तरीके को संवाद की कमी मानता है।
यह पहली बार है जब देश का प्रधानमंत्री हर मतदाता से सोशल मीडिया के माध्यम से हर समय जुड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि पिछले महीने सितंबर में ही दूरदर्शन ने प्रधानमंत्री निवास में एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो स्थापित किया है। इसी स्टूडियो में मोदी ने 2 अक्टूबर को 'मन की बात' रिकॉर्ड की थी, जिसका प्रसारण आकाशवाणी से किया गया था।
केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों से कहा है कि दूरदर्शन तथा आकाशवाणी के माध्यम से ही अधिकाशं खबरें जारी की जाएं। मोदी ने अपनी हाल की अमेरिका यात्रा के दौरान केवल 9 पत्रकारों को ही अपने साथ लिया था। विदेश मंत्रालय के अनुसार इन पत्रकारों में शासन द्वारा वित्तपोषित संस्थानों के पत्रकारों की संख्या सबसे ज्यादा थी।